किसका जूता, किसका सर...


पहली बार नहीं हुआ है और हर बार नजरअंदाज किया गया हैं फर्क सिर्फ यह है कि इस मर्तबा ‘इस बार बार की गलती’ के साथ ऐसी शख्सियत का नाम जुड़ा है जिसे हम गुलजार के नाम से जानते हैं और जो हमारी नजरों में पाकीजा एहसास की तरह दर्ज रहा है। बिल्कुल उनके लिखे गीत की मानिंद हमने उन आंखों की महकती खुशबू देखी है हम उससे मुतासिर भी हुए र्हैं। बहरहाल इस दफा उस खुशबू में संदेह की परत चढ़ गई है। यह शक इतना पुख्ता जान पड़ता है कि उसने यकीन की शक्ल अख्तियार कर ली है। यकीन जो एक शख्सियत के लिए हमारी सिलसिलेवार मुहब्बत को छलनी कर रहा है।

अब आप लाख दिलासा दें कि आपके गुलजार यकीनन हिंदी सिनेमा के अकेले चश्मो-चिराग हैं जिसकी रोशनी में हमने अपने गमों की चादर को धोया है लेकिन आज वह रोशनी ध्ब्बे में तब्दील हो गई है। हमारे गमों से ज्यादा उस रोशनी का सच तकलीफदेह लग रहा है। भले ही बहस के दो दालान में बिछी चारपाई कुछ समय बाद दो पैरों पर खड़ी कर दी जाने वाली है मगर यह जिद्दी सवाल तो तब भी जस का तस रहेगा कि एक आलातरीन अदीब ऐसा कैसे कर सकता है।

अगर इलाहाबाद के कुछ जागरुक अदीबों ने यह मसला न उठाया होता तो साहित्य के ताबूत में एक कील और ठुक जाती। मार्क ट्वेन ने सच कहा है कि जब सच अपने जूते के तश्मे बांध रहा होता है तब तक झूठ के कदम कई मील दूर जाकर ठहर चुके होते हैं। लेकिन झूठ ने इस बार इब्नेबतूता के जूते पहने थे और जूते खुद अपना राज खोल गए।
इब्नेबतूता हैं... उनका जूता है... सर्वेश्वररदयाल सक्सेना हैं और गुलजार हैं। सबकुछ तो धुले आसमान की तरह साफ है। कविता का जो इंद्रधनुष साठ - सत्तर के दशक में रचा गया उसमें रंगों का हेरफेर करके आप मालिकाना हक कैसे जता सकते हैं। गुलजार ने तो सफाई देने की जहमत तक नहीं उठाई वह अपने कद्दावर बुत के भरोसे समूचे आसमान को निगलने की फिराक में थे।

गुलजार ने पहले भी गालिब का मतला उठाया था और तब गालिब तो इस कदर लाल-पीले नहीं हुए। जनाब! तब बाकायदा गुलजार ने इस उठाइगीरी की सूचना जाहिर की थी और कौन जाने उन्हें गालिब की लोकप्रियता का इल्म न होता तो शायद ऐसा न करते वे ।

सर्वेश्वरदयाल जैसे हिंदी के कवि के बारे में गलतफहमी उन्हें भारी पड़ गई। वह अरसा पहले लिखी इस कविता को शिनाख्त से कमतर मानकर चल रहे थे। यदि उन्होंन गीत के बाजार में आने के साथ ही मूल रचनाकार को याद कर लिया होता तो कोई बात ही नहीं थी। गुलजार इतने संजीदा शख्स हैं कि उनसे कोई सफाई देते भी नहीं बन रही। इस संजीदगी को रचना की आत्मा के साथ हेराफेरी के वक्त भी कायम रखा जाना चाहिए थे।

इब्नेबतूता आम नाम नहीं है। इस नाम में एक लय है एक ताल है। ग्लैमर की दुनिया इसकी कीमत देती है। गुलजार इसे अपनी आत्मा बेचकर हासिल करना चाहते थे। उन्होंने जो किया उसे आप साहित्यिक बाल टेंपरिंग कह सकते हैं.

(प्रभात किरण के इंदौर संस्करण के ६ फरवरी के सम्पादकीय पेज से साभार. लेखक - राहुल ब्रजमोहन )
नोट- मूल लेख को संपादित किया गया है.

7 comments:

अशोक मधुप ने कहा…

आम तोर पर बडे लेखक कलाकार एेसा ही कर रहे हैं। आैर वह इसे गलत नही मानतें।

Jyotsna ने कहा…

"इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफ़ान में" - ये सक्सेना जी की बाल कविता का मुखड़ा है.

"इब्नबतूता बगल में जूता पहने तो करता है चुर्र्र" - ये गुलज़ार के गीत का मुखड़ा है.

इसमें कोई मेल नहीं है. न तो शब्द के बल पर और न ही तर्ज़ के बल पर.

इब्नबतूता कोई ट्रेडमार्क या कॉपीराईट नहीं है. और इसकी तुक जूता से बनती है. एक घुमंतू गाने में गुलज़ार ने इनको मिला दिया, बस.

मामला साफ़ है, गुलज़ार पर चोरी का इलज़ाम लगाना हास्यास्पद है.

Jyotsna ने कहा…

और कोई भी पूरे कविता और गीत की तुलना नहीं कर रहा है. इब्नबतूता और जूता शब्द को छोड़ दो तो कहीं कोई मेल नहीं है.

सैंकड़ों हिंदी गीत हैं जिनमें यह पंक्ति आती है "मुझे तुमसे मोहब्बत है", क्या तब भी गीतकारों पर चोरी का केस बनेगा?

सैंकड़ों गीत हैं जिनमें ये पंक्ति आती है "भारत देश हमारा है", क्या तब भी गीतकारों पर चोरी का केस बनेगा?

कैसे पत्रकार हो तुम भाई?

संदीप पाण्डेय ने कहा…

ज्योत्सना जी लेखक ने महज अपनी राय व्यक्त की है। इतने में आप उनकी पत्रकारिता पर सवाल क्यों उठा रही हैं। यहां बात मोहब्बत और देशप्रेम जैसे स्पेसिफिक सब्जेक्ट्स की नहीं हो रही है। यहां बात एक जनकवि के बालगीत के मुख्यअंश का बगैर आभार प्रकट किए इस्तेमाल किए जाने की हो रही है।
गुलजार को सामने आकर इस बात का जवाब देना चाहिए क्या सार्वजनिक छवि वाले इस लोकप्रिय व्यक्तित्व से इतनी अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए। गीत सर्वेश्वरदयालजी के गीत से प्रेरित नहीं है यह कहना नासमझी होगी। कड़े शब्दों में यह साहित्यिक चोरी का मामला है। आप अपनी सहानुभूति गुलजार के साथ रखें लेकिन इस मुद्दे पर वो गलत हैं तो क्या किया जाए।

डॉ .अनुराग ने कहा…

संदीप जी गुलज़ार ने अपनी बात कह दी है .....तीन दिन पहले के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ....बरसो पहले एक गीत आया था ."दिल ढूंढता है फिर बही "...ग़ालिब से प्रेरित होकर ......उसके बाद "राह पर रहते है "नमकीन फिल्म का गाना ....वो भी प्रेरित था ..यानि मुखड़ा उठा कर .....अभी गुलाल का फेमस गीत ये दुनिया गर मिल भी जाए तो क्या है .....साहिर को नए तरीके से देखना था ...बात नीयत की है जैसे विशाल ने अपनी फिल्मो में शेक्सपियर हा हवाला दिया है ....ओर विधु ने कहा के अधिकार खरीद लिए तो कही भी डाले ....सक्सेना जी की पोएम हमने भी पढ़ी है ओर याद है .....इब्नेबतुता एक एतेहासिक चरित्र है......

Ek ziddi dhun ने कहा…

GulZar is fake.......yh barson pahle padha tha Kaifi ke munh se, tab samajh nahi ayaa tha, phir aane laga, ab apki samajh men bhi aa gaya

सागर ने कहा…

फिल्म और गीतों की दुनिया में ये चलता रहता है... गुलज़ार ने दिल में भी ग़ालिब का शेर लाया था... इश्क पर जोर नहीं... इससे मिलती जुलती पोस्ट किसी और ब्लॉग पर भी पढ़ी थी... शायद "एक शाम मेरे नाम पर" जिसमें सर्वेश्वर जी का जिक्र था... पर गुलज़ार पर कुछ कहना... एक हिमाकत जैसा लगता है... मामला जैसा भी हो अगर साफ़ नियत से किया गया हो तो अच्छा रहेगा...