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प्रेम के लिए दो मिनट का मौन






कल वैलेंटाइन डे है। कुछ साल पहले जब मैं भोपाल में था तब वहां इसका ताजा-ताजा विरोध शुरू हुआ था। उन दिनों मैंने यह कविता लिखी थी। एक बार ब्लाग पर डाल चुका हूं आज दोबारा पोस्ट कर रहा हूं।




फागुन के पागल महीने में
हम चाह ही रहे थे गाना बसन्ती गीतकी आ गया
नए सांस्कृतिक रथ पर सवार वैलेंटाइन डे

अकेले नही आया है
प्रेम का ये त्यौहार
इसके ऑफर पैक में मिले हैं
रोज डे ,फ्रेंडशिप डे और जाने क्या क्या ??

अब तो लगता है
की जैसे इसके आने से पहले
बिना प्रेम के रह लिए हम हजारों साल
वसंतोत्सव ?
जैसे वैलेंटाइन डे का कोई उपनिवेश
पीले वस्त्रों में लिपटा सौंदर्य
मानुस प्रेम
सरसों के खेत
जैसे बीते युग की कोई बात

इन्हे तो भुलाना ही था हमें
क्यूंकि वसंतोत्सव को
सेलिब्रेट नही कर सकते
कोक और पिज्जा के साथ
ठीक नही लगता ना

सुना तुमने
वैलेंटाइन डे आ रहा है
टीवी चॅनल पढेंगे
उसकी शान में कसीदे
और कहेंगे
देश के लोगों खरीदो
मंहगे उपहार
क्यूंकि वही होंगे तुम्हारे प्रेम के यकीन
भावनाएं तो शुरुआत भर होती हैं
ओछी और सारहीन

१४ फरवरी को अचानक याद आयेगा प्रेम
और हम नोच डालेंगे बगिया के सारे फूल
घूमेंगे सडकों, बाजारों, परिसरों में
जहाँ भी दिखें प्रेमिकाएँ
जो थीं १३ तारिख तक महज लडकियां

मुर्दा संगठनों में नयी जान फून्केगा
वैलेंटाइन डे
निकल पड़ेंगे सडकों पर उनके लोग
लाठी डंडों और राखियों से लैस
जब उन्हें दिखाई देंगे
अपने ही भाई -बहन
दूसरों की गाड़ियों पर चिपके हुए
तो वे निपोरेंगे खीस
और दिल ही दिल में स्वीकारेंगे
परिवर्तन की बात
सोचता हूँ की अगर ये है प्रेम का प्रतीक
तो क्यों लाता है आँगन में बाजार
जीना सिखाता है सामानों के साथ

डरता हूँ
इस अंधी दौड़ में बसंतोत्सव
की तरह
हम मांग ना लायें होली और दीवाली के भी विकल्प

इस कठिन समय में जब प्रेम
आत्महंता तेजी से उतर रहा है
भावना से शरीर पर

आइये करें थोडी सी प्रार्थना
ताकि प्रेम बचा रहे
हमारे भीतर की गहराइयों में
ताकि हमें रखना न पड़े
प्रेम के लिए दो मिनट का
मौन

जानलेवा खेल

रात एक बजे
जाने किस मूड में भेजे गए उस इमेल को
सुबह संभलने के बाद उसने ख़ारिज कर दिया है

ये जिन्दगी है
लव आज कल नहीं
वह कहती है
मैं कहना चाहता हूँ की जिन्दगी
राजश्री बैनर का सिनेमा भी तो नहीं

प्यार चाहे मुख़्तसर सा हो या लम्बा
उससे अपरिचित हो पाना बस का नहीं
चाहे वो शाहिद करीना हों या मैं और वो

तुम शादी कर लो
उसने प्रक्टिकल सलाह दी थी
उंहू...
पहले तुम मैंने कहा था

हमारा क्या होगा
ये सवाल हमारे प्यार करने की ताकत छीन रहा था
हमने अपनी आंखों में आशंकाओं के कांटे उगा लिए थे
आकाश में उड़ती चील की तरह कोई हम पर निगाहें गडाए था
मेरे लिए अब उसे प्यार करने से ज्यादा जरूरी
उस चील के पंख नोच देना हो गया था
लेकिन मैं कुछ भी साबित नहीं करना चाहता था
न अपने लिए न उसके लिए

मुझे अब इंतज़ार था
शायद किसी दिन वो वह सब कह देगी
मैं शीशे के सामने खड़ा होकर अभिनय करता
की कैसे चौकना होगा उस क्षण
ताकि उसे ये न लगे की
अप्रत्याशित नहीं ये सब मेरे लिए

हर रोज जब वो मुझसे मिलती
मेरी आँखों में एक उम्मीद होती
लेकिन वह चुप रही
जैसे की उसे पता चल गया था सारा खेल

ये जानलेवा खेल
बर्दाश्त के बाहर हो रहा है
उम्मीद भी अँधा कर सकती है
ये जान लेने के बाद मेरी घबराहट बढ़ गयी है...
(अधूरी...)

नया साल आ गया

एक और नया साल आ गया
मैं खुश हूं
जी लिया एक और बरस
बिना किसी खास परेशानी के
और शायद...
बिना किसी मकसद के भी

कितना अच्छा गुजरा बीता साल
न तो मैं किसी दुर्घटना का शिकार हुआ
न फंसा किसी झंझट में बेवजह
किसी ने नहीं देखा मुझे घूस लेते हुए
और ना ही छेड़ा किसी ने जवान होती बेटी को

ओ मेरे भगवान
आने वाले साल में भी बरकरार रखना मेरी ये खुशियां
मैं जिंदगी से बहुत ज्यादा कुछ नहीं चाहता

अंतिम इच्छा

यह कविता मैंने ३० दिसंबर २००६ को लिखी थी जिस दिन सद्दाम हुसैन को फांसी दी गयी थी

टीवी पर खबर है
की सद्दाम हुसैन को
फांसी पर लटका दिया गया

ठीक उस वक्त
जब सद्दाम को
फांसी दी जा रही थी
शांति का मसीहा जार्ज बुश
खर्राटे भर रहा था अपनी आरामगाह में
सारी दुनिया में
अमन और चैन
सुनिश्चित करने के बाद

वो डूबा हुआ था
हसीं सपनों में
जहाँ मौजूद होंगी
दजला और फरात
जलक्रीडा के अनेक साधनों में
उसकी नवीनतम पहुँच

या की वो खुद बग़दाद के बाजारों में
अपने हथियारों के साथ

संसार के सबसे शक्तिशाली
लोकतान्त्रिक राजा की ओर से
शेष विश्व को ये था
बकरीद और नववर्ष का तोहफा ...
उसकी वैश्विक चिंताओं और करुना का नमूना

जोर्ज डब्लू बुश
इस धरती का सबसे नया भगवान्
पूछ रहा है ...
हमारी अंतिम इच्छा

मुझे पता था तुम्हारा जवाब


उन दिनों

जब मैं तुम्हें टूटकर प्यार करना चाहता था

लिखता रहा प्रेम कविताएं

ऐसे में चूंकि मुझे पता था तुम्हारा जवाब,

मुझे कवितायेँ तुमसे संवाद का बेहतर जरिया लगीं

मैं बेहद खुश होता तुम्हारे जवाबों से

वह मेरी आजाद दुनिया थी

जहां किसी का दखल नहीं था

किसी का भी नहीं

मेरा दिल एक कमरा था

उस कमरे में एक ही खिड़की थी

खिड़की के बाहर तुम थीं

यूं तो कमरे में हमेशा दो लोगों के लिए पर्याप्त जगह मौजूद थी

लेकिन तुमने खिड़की पर खड़े होकर

उस पार से बतियाना ही ठीक समझा

किसी का होकर भी उसका न हो पाना

ये दर्द कोई मुझसे पूछे

ठीक अभी अभी इस उदास रात में

आसमान में कोई तारा चमका है

शायद तुम खिड़की के बाहर खिलखिलाकर हंसी हो

एक अजनबी शहर में मर जाने का ख्याल

एक नए शहर में
जिससे अभी आप की जान पहचान भी ठीक से ना हुई हो
मर जाने का ख्याल बहुत अजीब लगता है
ये मौत किसी भी तरह हो सकती है
शायद ऐ बी रोड पर किसी गाडी के नीचे आकर
या फिर अपने कमरे में ही करेंट से
ऐसा भी हो सकता है की बीमारी से लड़ता हुआ चल बसे कोई
हो सकता है संयोग ऐसा हो की अगले कुछ दिनों तक कोई संपर्क भी ना करे
माँ के मोबाइल में बैलेंस ना हो और वो करती रहे फ़ोन का इंतज़ार
दूर देश में बैठी प्रेमिका / पत्नी मशरूफ हो किसी जरूरी काम में
या फिर वो फ़ोन और मेसेज करे और उसे जवाब ही ना मिले
दफ्तर में अचानक लोगों को ख़याल आयेगा की उनके बीच
एक आदमी कम है इन दिनों
ऐसा भी हो सकता है की लोग आपको ढूंढना चाहें
लेकिन उनके पास आपका पता ही ना हो ....

तुम्हारा होना...


तुम नहीं हो


तुम्हारी सीट खाली है


दराज में रखा तुम्हारा कप


सोच रहा है कि तुम आओगी


वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है


तुम्हारी सीट पर कोई और बैठेगा


तो कप को बहुत खराब लगेगा


शायद वो मना भी करे


या फिर गिरकर टूट ही जाए


अगर कप टूट गया


तो यहां और भी बहुत कुछ टूटेगा...

असफलताएं



असफलताएं सिर्फ़ तोड़ती नही हैं

बल्कि वो देती हैं


बहुत कुछ जोड़े रखने का साहस


हर बार हम असफल प्रेम से सीख पाते हैं


की गहन दुःख के क्षणों में मुस्कराया कैसे जाता है

इसी तरह हमारे भीतर का अवसाद

निकल कर बिखर जाता है अचानक

जब हम बीच सड़क पर फिसल जाते हैं

अनायास


ठीक ऐसे ही हम कह सकते हैं की


सबसे गहरे और अभिन्न मित्रों के बीच


सबसे मजबूत सेतु की तरह होती हैं


उनकी एक सी असफलताएं

सुनो साथियों

ये जो आदमी नाम का जीव है न मेरे भाई
सचमुच बड़ा अनोखा है
और चूंकि उसे पहचानना मेरा पेशा है
तो मैंने कोशिश की है और नतीजे आप को सुनाता हूँ..............
तो मुलाहिजा हो साहिबान
यहाँ कुछ लोग दुष्यंत कुमार के चेले हैं,
पूरी जवानी अपनी गुंडई और हरामीपने को
दुष्यंत की कविताओं की आड़ देने वाले ये लोग
साए में धूप को छाती से चिपकाये हुए
सुविधाओं से लैस जीवन के बीच कभी -कभी दौरा पड़ने पे
व्यवस्था के ख़िलाफ़ वमन करते हैं और सो जाते हैं
कुछ extreemist मार्क्स के चेले हैं
उन्होंने खोल रखे हैं एनजीओ
सरकारी दफ्तर में ग्रांट के लिए बाबू को तेल लगाने के बाद जो
उर्जा बच जाती हैउसका उपयोग वे रात में बिस्तर पर
स्वयमसेविकाओं के साथ क्रांति करने में करते हैं
ये क्रांतिकारी लिखते हैं प्रेम की कवितायें
जिनमें होता है अफ़सोस अतृप्त कामनाओं पर
उनमें के एक दारु पीकर बड़ी मासूम सी कसम खाता है
की उसने अपनी प्रेमिका के साथ
(जो अब किसी और की ब्याहता है) कभी सम्भोग नही
किया बगल में रहता है एक समाजवादी
जो साम्यवाद और समाजवाद पर रिसर्च कर रहा है
वो बहुत तार्किक है और चीजों के प्रति निरपेक्ष नजरिया रखता है
उसकी प्रेमिका ने दहेज़ के चलते उसके सबसे करीबी दोस्त के विवाह कर लिया है
इसे वह चयन की स्वतन्त्रता का मामला बताता है
और भविष्य को लेकर बहुत आशान्वित है
एक धडा कट्टरपंथियों का है जिनको गान्ही से समस्या है
गान्ही बाबा ने उनको पचास साल पीछे धकेल दिया
एसा उनका आरोप है बहरहाल शहर में बाकी सब ठीकठाक है .........

विचारधाराओं का टकराव...

उसने कहा, हमारे बीच विचारधाराओं का टकराव है
मैंने कहा, लेकिन मेरे पास तो विचार है ही नही
उसने कहा, झूठ बोलते शर्म नही आती
मैंने कहा, मैं सच कह रहा हूँ
उसने कहा, तुम तो बड़े विचारक बनते हो. तो क्या वो सब ढोंग है
मैंने कहा हाँ लेकिन हमारी दोस्ती तो ढोंग नही है न ?
उसने कहा नही ये कैसे होगा हमारी दोस्ती तो मिसाल है औरों के लिए...
उसके होठों पे मुस्कराहट थी
उसने मुझे गले लगा लिया और धीरे से कान में कहा
तुम कुछ भी कहो यार हिंदू आतंकवादी नही हो सकते...

प्रेम के लिए दो मिनट का मौन

फागुन के पागल महीने में
हम चाह ही रहे थे गाना बसन्ती गीतकी आ गया
नए सांस्कृतिक रथ पर सवार वैलेंटाइन डे

अकेले नही आया है
प्रेम का ये त्यौहार
इसके ऑफर पैक में मिले हैं
रोज डे ,फ्रेंडशिप डे और जाने क्या क्या ??

अब तो लगता है
की जैसे इसके आने से पहले
बिना प्रेम के रह लिए हम हजारों साल
वसंतोत्सव ?
जैसे वैलेंटाइन डे कोई उपनिवेश
पीले वस्त्रों में लिपटा सौंदर्य
मानुस प्रेम
सरसों के खेत
जैसे बीते युग की कोई बात

इन्हे तो भुलाना ही था हमें
क्यूंकि वसंतोत्सव को
सेलिब्रेट नही कर सकते
कोक और पिज्जा के साथ
ठीक नही लगता ना

सुना तुमने
वैलेंटाइन डे आ रहा है
टीवी चॅनल पढेंगे
उसकी शान में कसीदे
और कहेंगे
देश के लोगों खरीदो
मंहगे उपहार
क्यूंकि वही होंगे तुम्हारे प्रेम के यकीन
भावनाएं तो शुरुआत भर होती हैं
ओछी और सारहीन

१४ फरवरी को अचानक याद आयेगा प्रेम
और हम नोच डालेंगे बगिया के सारे फूल
घूमेंगे सडकों, बाजारों, परिसरों में
जहाँ भी दिखें प्रेमिकाएँ
जो थीं १३ तारिख तक महज लडकियां

मुर्दा संगठनों में नयी जान फून्केगा
वैलेंटाइन डे
निकल पड़ेंगे सडकों पर उनके लोग
लाठी डंडों और राखियों से लैस
जब उन्हें दिखाई देंगे
अपने ही भाई -बहन
दूसरों की गाड़ियों पर चिपके हुए
तो वे निपोरेंगे खीस
और दिल ही दिल में स्वीकारेंगे
परिवर्तन की बात
सोचता हूँ की अगर ये है प्रेम का प्रतीक
तो क्यों लाता है आँगन में बाजार
जीना सिखाता है सामानों के साथ

डरता हूँ
इस अंधी दौड़ में बसंतोत्सव
की तरह
हम मांग ना लायें होली और दीवाली के भी विकल्प

इस कठिन समय में जब प्रेम
आत्महंता तेजी से उतर रहा है
भावना से शरीर पर

आइये करें थोडी सी प्रार्थना
ताकि प्रेम बचा रहे
हमारे भीतर की गहराइयों में
ताकि हमें रखना न पड़े
प्रेम के लिए दो मिनट का मौन