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वाह रे अतुल्य भारत : 25 रुपए में रोटी, शिक्षा और स्वास्थ्य!

नई दिल्ली. अच्छा खाना,उचित स्वास्थ्य सेवा और ढंग की शिक्षा- इस महंगाई के समय में एक शख्स के लिए ये सब पाने के लिए 25 रुपए ही काफी हैं। आपको यह अविश्वसनीय लग सकता है, लेकिन योजना आयोग को ऐसा नहीं लगता।
मंगलवार को आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया है। इसके मुताबिक, गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) का दर्जा पाने के लिए एकमात्र शर्त यह है कि एक परिवार की न्यूनतम आय 125 रुपए रोजाना हो। आमतौर पर एक परिवार में औसतन पांच लोग माने जाते हैं। इस तरह प्रति व्यक्ति रोजाना आय मात्र 25 रुपए।

गौरतलब है कि अधिकतर सरकारी योजनाओं का लाभ केवल गरीबी रेखा से नीचे के लोग ही उठा सकते हैं। आयोग ने यह हलफनामा अदालत के कई बार कहने के बाद दायर किया है। आयोग के मुताबिक, प्रधानमंत्री कार्यालय भी इस हलफनामे पर विचार कर चुका है। हलफनामा सुरेश तेंडुलकर समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। इसमें कहा गया है, ‘प्रस्तावित गरीबी रेखा भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च के वास्तविक आकलन पर जीवनयापन के न्यूनतम संभव स्तर पर आधारित है।’

यूपीए ने ‘आमआदमी’ के प्रति अपनी चिंता कई बार जाहिर की है और 2004 व 2009 में इसे अपना चुनावी एजेंडा भी बनाया था। लेकिन इस हलफनामे से साफ है कि देश में गरीबी रेखा केवल अत्यंत गरीबों और पिछड़ों के लिए ही रह जाएगी। इस समय जब सब्जी की कीमतें आसमान पर हैं, तेल कंपनियां आए दिन पेट्रो उत्पाद महंगे कर रही हैं और एलपीजी सिलेंडर से सब्सिडी खत्म करने की बात चल रही है, तब यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सरकार बीपीएल दर्जा पाने के लिए लोगों को भूखे मरते हुए ही देखना चाहती है।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त खाद्य आयुक्त एनसी सक्सेना ने इस हलफनामे पर कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा कि यह असंवेदनशील है। उन्होंने कहा कि यह पैमाना तो उन परिवारों के लिए सही है जो भुखमरी के कगार पर हैं, न कि गरीबी के। उन्होंने कहा कि अगर आयोग का बस चले तो देश के अधिकतर गरीबों की कई सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से हाथ धोना पड़ेगा।

उन्होंने कहा,‘ देश में 80 फीसदी से ज्यादा लोग 80 रुपए रोजाना से कम पर जीते हैं। आयोग ने इस बात को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है। नतीजतन हमारे पास एक खराब तरीके से लिखा गया हलफनामा है।’

सक्सेना के सहकर्मी बृज पटनायक ने भी इस हलफनामे पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा, ‘यह सरकार और आयोग का नैतिक दिवालियापन दिखाता है। वे गरीबों के बारे में नहीं सोचते, यह बेहद असंवेदनशील है।’ उन्होंने कहा,‘सांसदों के लिए कैंटीन में सब्सिडी वाला भोजन है लेकिन जब गरीबों की बात आती है तो सरकार न्यूनतम सुविधाएं भी कम से कम लोगों तक सीमित रखना चाहती है।’


सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना की है। उनके मुताबिक, उचित स्वास्थ्य सेवा तो भूल जाइए आजकल तो एक रुपए में एस्प्रिन की गोली तक नहीं मिलती।

हलफनामे की प्रमुख बातें

>हर महीने शहरी इलाके में 965 रुपए और ग्रामीण इलाके में 781 रुपए खर्च करनेवाला गरीब नहीं। शहरों में रोज 32 रुपए और गांव में रोज 26 रुपए से ज्यादा खर्च करने वाला केंद्र और राज्य सरकार की गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के लिए कल्याण योजनाओं का लाभ नहीं उठा सकता।
>हर रोज अनाज पर 5.5 रुपए का खर्च व्यक्ति को सेहतमंद रखने के लिए काफी। इस तरह रोज दाल पर 1.02 रुपए, दूध पर 2.33 रुपए, सब्जियों पर 1.95 रुपए और खाद्य तेल पर 1.55 रुपए का खर्च करने वाला गरीबी रेखा के नीचे नहीं।

>दवाओं और स्वास्थ्य पर हर महीने 39.70 रुपए का खर्च काफी। शिक्षा पर 99 पैसा रोज यानी 29.60 रुपए प्रति माह (शहरों में) खर्च करने वाला गरीब नहीं।


साफ है कि सरकार इस आकलन से गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या अवास्तविक रूप से कम करना चाहती है, ताकि गरीबों पर सरकारी खर्च कम किया जा सके।


अरुणा राय,सदस्य्र,राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (दैनिक भास्कर से साभार )

इंटरनेट पर फैल रहा है हिंदी का संसार

अंतरजाल से हिंदी मिला रही है कदमताल। अंतरजाल यानी इंटरनेट जिसे आमतौर पर 'नेट के नाम से जाना जाता है, उसने हिंदीभाषियों को एक बेहतरीन तोहफा भेंट किया है। इंटरनेट ने दुनिया भर की कई भाषाओं को समृद्घ किया है और हिंदी भी इसी प्लेटफॉर्म पर सवार होकर विकास की नई रफ्तार पकड़ रही है। जो लोग गला-फाड़ अंदाज में हिंदी के खात्मे की बात करते हैं, इंटरनेट पर हिंदी के प्रसार ने उनकी जुबान बंद करने में मदद की है।

एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक हिंदी बहुत जल्द इंटरनेट पर अंग्रेजी और चीनी (मंदारिन) भाषा के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा बन जाएगी। इसके तेज विकास का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक यह इंटरनेट पर इस्तेमाल की जाने वाली शीर्ष 10 भाषाओं में भी नहीं है। ङ्क्षहदी ने इस नए माध्यम पर कई प्रतिमान स्थापित किए हैं। इंटरनेट पर हिंदी की लोकप्रियता बढ़ाने में ब्लॉगिंग का अहम योगदान रहा है। वर्ष 2003 में जहां ङ्क्षहदी भाषा का पहला ब्लॉग आलोक कुमार नाम के एक तकनीकी विशेषज्ञ ने '9-2-11 नाम से बनाया। आज इनकी संख्या एक लाख से ऊपर निकल चुकी है। इन ब्लॉगों में से 15-20 हजार को सक्रिय और 5 से 6 हजार को अतिसक्रिय की श्रेणी में रखा जा सकता है। ब्लॉगों ने व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के माध्यम से कहीं आगे बढ़कर कई मकसदों के लिए सामाजिक मंच बनने तक की दूरी तय कर ली है। मौजूदा दौर में हिंदी में सामुदायिक ब्लॉगों के अलावा साहित्य, संस्कृति और सिनेमा जैसे विषयों पर कई ब्लॉग सक्रिय हैं। इन ब्लॉगों पर सामाजिक मुद्दों की भी खूब धूम रहती है।


माइक्रोसॉफ्ट मोस्ट वैल्युएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके वरिष्ठï चिठ्ठाकार रविशंकर श्रीवास्तव के मुताबिक दुनिया भर में बड़ी संख्या में हिंदी भाषियों और हिंदी सेवियों की मौजूदगी को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इंटरनेट पर हिंदी का भविष्य उज्जवल है। श्रीवास्तव इंटरनेट पर हिंदी के प्रसार के काम में लगे हैं। यह हिंदी की ताकत ही है जिसने तमाम अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को अपने तमाम अंकों को इंटरनेट पर जारी करने के लिए मजबूर कर दिया है। 'हंस, 'कथादेश, 'तद्भव नया ज्ञानोदय समेत तमाम प्रकाशित होने वाली गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं के ई संस्करणों के अलावा 'अभिव्यक्ति, 'अनुभूति 'रचनाकर, 'हिंदीनेस्ट, 'कविता कोश सहित हिंदी ब्लॉग और वेबसाइटों पर तमाम स्तरीय देशी विदेशी साहित्य महज एक क्लिक की दूरी पर उपलब्घ है।

आमतौर पर वेब पत्रिकाओं में पहले से छपी हुई सामग्री ही पढऩे को मिलती है। इस मिथक को तोड़ते हुए ज्ञानपीठ युवालेखन पुरस्कार से सम्मानित युवा कथाकार चंदन पांडेय ने अपनी नई कहानी 'रिवॉल्वर एक वेब पत्रिका 'सबद पर जारी कर एक नई पहल की।

सोशल नेटवर्किंग और मोबाइल- ऑर्कुट, फेसबुक के अलावा तमाम नेटवर्किंग वेबसाइट पर हिंदी का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।मोबाइल में हिंदी सॉफ्टवेयर की उपलब्धता ने लोगों का काम और अधिक आसान कर दिया है। सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज) ने भी इंटरनेट पर हिंदी के शुरुआती विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। सीएसडीएस के भाषायी विकास कार्यक्रम से जुड़े इतिहासकार रविकांत शर्मा के मुताबिक शुरुआत में इंटरनेट पर हिंदी देखने के लिए जहां किसी भी फॉन्ट की इमेज (पीडीएफ) ही इस्तेमाल की जा सकती थी।

जिस समय इंटरनेट पर हिंदी के लिए काम कर रहे सरकारी संस्थान टीआईडीएल (टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फॉर इंडियन लैंग्वेज) और सी-डैक जैसे सरकारी विभाग तमाम अव्यावहारिक कोशिशें कर रहे थे, उस दौरान सीएसडीएस ने हिंदी के इस्तेमाल से संबंधित तमाम सॉफ्टवेयर बनाकर उनका मुफ्त वितरण शुरू कर दिया था।

सिर्फ आरक्षण से क्या होगा?

मृत्युंजय कुमार झा
संसदीय गरिमा को तार- तार कर राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पास हो गया है। बिल पास होने पर एक दुसरे की धुर विरोधी बीजेपी नेता सुषमा स्वराज और सीपीम नेता वृंदा करात ने गले मिलकर खूब जश्न का इजहार किया। ऐसे और भी कई नजारे संसद के गलियारों में देखे गए। बिल के समर्थक राजनीतिक पार्टी से लेकर मीडिया तक ने इस बिल को ऐतहासिक करार दिया। हालांकि इसे लोकसभा और 15 विधानसभाओं में पास होना अभी बाकी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर ये बिल पूरी तरह से पास हो भी जाता है तो क्या आम महिलाएओं के लिए जश्न मनाने वाली बात होगी? इस बिल की पृष्ठभूमि में कई ऐसे अनुत्तरित सवाल हैं जिसका जबाव देने की हिम्मत किसी भी राजनीतिक पार्टी में नहीं है।
कल्पना या फिर कामना कीजिए की ये बिल पास हो जाए। तब क्या इस बात की पूरी गारंटी होगी कि संसद में भगवतिया देवी जैसे चेहरे बहुत दिखेंगे, जिनका कोई राजनितिक पृष्ठभूमि नहीं है? शायद नहीं। तब भी वहीं चेहरे दिखेंगे जो अभी दिख रहे हैं। हां उसका रूप जरूर बदल जाएगा। लालू यादव नहीं तो राबड़ी देवी दिखेंगी, मुलायम सिंह नहीं तो उनकी बहु दिखेंगी, शरद पवार नहीं तो उनकी बेटी दिखेंगी। तो फिर सावाल है कि ऐसे में इस कानून का क्या मतलब रह जाएगा।
अब जरा मौजूदा स्थिति को समझिए। बिल के सबसे बड़े हिमायती कांग्रेस पार्टी ने पिछले लोक सभा चुनाव में देश के सबसे ज़्यादा लोकसभा सीटों वाले(80 सीटें) वाले राज्य उत्तर प्रदेश में महज 6 महिला उम्मीदवार को टिकट दिया। और ये हाल तब है जब कि पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष दोनों महिला हैं। इनमें किसी भी ऐसी महिला को टिकट नहीं मिला जिनका कोई पोलिटिकल कनेक्शन न हो। मसलन रामपुर से बेगम नूर बानो को टिकट मिला जिनके पति नवाब जुल्फिकार अली खुद सांसद थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश सिंह की पुत्री राजकुमारी रत्ना सिंह को टिकट मिला और व जितकर संसद पहुंचीं। पूर्वांचल के जाने माने नेता कल्पनाथ राय की पत्नी सुधा राय को मऊ से टिकट दिया गया। लखनऊ से रीता बहुगुणा जोशी को उम्मीदवार बनाया गया जो दिग्गज कांग्रेसी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी हैं। ये तो चंद उदाहरण हैं। बाकी पार्टियों का भी कमोबेश यही हाल है। तो क्या ऐसे में ये उम्मीद की जा सकती है कि महिला आरक्षण बिल पास होने पर ये तस्वीर बदल जाएगी।

अब जरा बिल पर हाय तौबा मचाने वाले पार्टी की मानसिकता देखिए। बिल के विरोध में हंगामा बरपाने वाले यादव तिकड़ी, लालू, मुलायम, और शरद 35 साल से ज़्यादा से राजनीति में सक्रिय हैं। और करीब 20-25 साल से अपनी पार्टी के सारे मामलों में फैसला करने की स्थिति में भी हैं। क्या पिछले 20-25 सालों में लालू यादव को किसी ने रोका कि व अपनी पार्टी से ज़्यादा से ज़्यादा गरीब पिछड़ी महिला को टिकट न दें। किसने रोका कि राबड़ी देवी की जगह किसी दूसरी महिला को मुख्यमंत्री नहीं बनाइए। मुलायम सिंह को किसने रोका कि डिंपल यादव की जगह किसी दूसरी यादव महिला को टिकट न दें। फिर इसकी क्या गारंटी है कि ‘कोटा के अंदर कोटा’ की इनकी मांग मान ली जाए तो यादव तिकड़ी के कुनबे के अलावा बाकी पिछड़ी महिलाओं का भी सशक्तीकरण होगा। दरअसल ये ‘कोटा के अंदर कोटा’ की मांग इसलिए कर रहे हैं ताकि इनकी राजनीतिक ज़मीन नहीं खिसके।

ऐसे में जरुरत इस बात कि है कि सिर्फ राजनीतिक रोटी सेंकने लिए आरक्षण का हल्ला न मचाया जाए, इसे हर पार्टी अपने व्यवहार में भी लागू करे। सिर्फ महिला राष्टपति या महिला लोकसभा अध्यक्ष का नाम गिना देने भर से महिलाओं का सशक्तीकरण नहीं हो जाएगा। किसी राज्य में अगर दलित महिला मुख्यमंत्री है तो वहां की दलित महिला चांदी की थाली में नहीं खाने लगी है। इसलिए महिला आरक्षण सही मायनों में तभी ऐतिहासिक होगा जब उसका दरवाजा सबके लिए खुलेगा।

(बिहार के अररिया जिले में जन्मे मृत्युंजय कुमार झा फिलहाल ज़ी बिज़नेस न्यूज चैनल में एंकरिंग और रिपोर्टिंग करते हैं।)