बरसात के बहाने कुछ और



अजीत कुमार

बरसात पर इतना ठहराने के बारे में मैं यही कहूँगा की सृजन भी एक यात्रा ही तो है जिसका प्रस्थान विंदु किसी कलाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व की एक बानगी दे ही जाता है। बतौर गीतकार बरसात भी शैलेंद्र की पहली फिल्म थी इसलिए बात से बात निकलकर आ रही है। अगर आज आप जाकर बरसात फिल्म देखेंगे तो शायद आप यह भी कह सकते हैं कि यह तो महज एक घिसी पिटी नाटकीय प्रेमकथा है। गीत को लेकर भी शायद कुछ ऐसा ही सुनने को मिल सकता है। लेकिन जिस समय फिल्म प्रदर्शित हुई, उस समय उसे घिसा पिटा नहीं कहा जा सकता था। ठीक इसी तरह फिल्म के गीतों में भी पटकथा के अनुरूप ही घिसे पिटे मुहावरों से अलग एक नयेपन का अहसास था।
फिल्म बरसात से पहले देश में ज्यादातर माइथोलोजिकल और ऐतिहासिक फिल्मों का ही प्रचलन था। हालांकि सोहराब मोदी, विजय भट्ट और कुछेक निर्माता निर्देशक इस तरह की फ़िल्में 60 की दहाईं में भी बनाते रहे। बरसात से पहले महबूब खान की औरत, व्ही शांताराम की पडोसी और डाक्टर कोटनिस की अमर कहानी के अलावे कोई भी ऐसी फिल्म नहीं थी जो पारसी थियेटर की लीक से हटकर हो। हालांकि इन फिल्मों के गीत और संगीत पर भी कमोबेश पारसी थियेटर का ही रंग हावी था। कहें तो 40 और 50 की दहाईं की अधिकतर फिल्मों मे मैलोड्रामा के सिवा कुछ भी नहीं था।
हालांकि राजकपूर की फिल्म बरसात भी पूरी तरह से मैलोड्रामैटिक थी लेकिन पारसी थियेटर के मैलोड्रामैटिक रंग से दूर युवा प्रेम को लकर यह एक अलग तरह के मैलोड्रामा की शुरुआत थी। पटकथा, गीत संगीत, संवाद और तकनीक को लेकर भी फिल्म बरसात में एक नयापन था। मेरे हिसाब से प्रेम के प्लैटोनिक फॉर्म को लकर राजकपूर की यह फिल्म अपने आप में एक विलक्षण प्रयोग था। युवा मन की अभिलाषा और अनुभूतियों की बेरोकटोक अभिव्यक्ति , प्लेटोनिक प्रेम और सुखांतिकी का आख्यान थी बरसात। अल्हडपन, सादगी और और आत्महंती प्रेम के सुखद अहसास को रचने में फ़िल्मी पर्दे पर राजकपूर और नरगिस की कैमिस्ट्री भी बडी कारगर रही। बाद में इसी लीक पर आधरित कई और भी फ़िल्में आई। प्रेम के इसी आख्यान को एक नए रंग में राजकपूर बोबी के रूप में 1971 में लेकर आए। जिस साल बरसात प्रदर्शित हुई उसी साल महबूब खान की फिल्म अंदाज भी प्रदर्शित हुई थी। कथानक को लेकर इस फिल्मों में भी प्रयोग थे। लेकिन यह फिल्म भी अंततः एक दुखांतिकी बनकर ही रह जाता
है। हालांकि कुछेक मायनो में यह फिल्म प्रस्थान विंदु साबित हुई। प्रेम को लेकर पारंपरिक आस्था और विश्वास के साथ साथ जीवन शैली और मूल्यों के द्वंद्व को बडी ही बारीकी से पिफल्म के कथानक में बुना गया है। हालांकि कथानक अपने द्वंद्व को लेकर सुखांतिकी के बजाए दुखांतिकी को अपनाते हुए बदलते जीवन शैली की त्रासद गाथा बनकर रह गई है। मैं कहूं तो सामाजिकी, आदर्श और परंपरा की राह से अलग प्रेम की स्वच्छंदता को कलात्मक अभिव्यक्ति हिंदी फिल्मों के इतिहास में पहली बार फिल्म अंदाज में ही मिली। भले स्वच्छंदता की राह को क्यूं न घनघोर त्रासदी की तरपफ मोड दिया गया हो। स्वतंत्रता प्राप्ति से ठीक पहले और बाद के दौर में आदर्श और परंपरा को लेकर आस्था समकालीन कला के तमाम आयामों पर हावी थी। लेकिन वैश्विक मंच पर राजनीति के साथ -साथ कला के क्षेत्र में हो रहे महत्वपूर्ण बदलावों और आंदोलनों से भारतीय कला आखिर कबतक अछूती रह सकती थी। वैयक्तिक स्वतंत्राता को लेकर आदर्श के साथ टकराव की गाथा भी वैश्विक सिनेमा खासकर इटली की सिनेमा में नवयथार्थवादी आंदोलन के तौर पर दस्तक दे चुका था। अपने यहां के सिनेकारों की भी इटली के सिने आंदोलन पर नजर थी। बाद में यानी कहें तो 50 और 60 के दशक में राजकपूर, गुरूदत्त और कमोबेश विमल राय व्यवस्था, आदर्श और रूढ परंपरा के प्रति विरोध् को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे। यहां पर एक और बात का जिक्र जरूरी है। हिंदी सिनेमा में सामजिक मूल्यों और व्यवस्था विरोध् की जो गूंज 1945 से 1960 के बीच की सिनेमा में देखने को मिला वह सिपर्फ वैश्विक सिनेमा का प्रभाव मात्रा भर नहीं था। सिनेमा की तकनीक को लेकर भले ही प्रयोगों को अपनाने की कोशिश की गई हो लेकिन कथानक को लेकर प्रयोग आखिर 1857 से 1947 तक चले स्वतंत्राता संग्राम के दौरान ही जन्मे उन व्यापक आंदोलनों और विचारधराओं का ही प्रतिपफलन था जो समाज, राजनीति, पंरपरा और आदर्श को लेकर उफपजे अंतर्विरोध् के परिणामस्वरूप उभरे थे। लेकिन हिंदी सिनेमा अपने शुरूआती दिनों खासकर चालीस और पचास के दशक में इन आंदोलनों से महरूम था। वैसे तो प्रगतिशील लेखक संघ; प्रलेसद्ध और इंडियन पीपुल्स थियेटर ; इप्टाद्ध के माघ्यम से लेखक और रंगकर्मी यर्थाथवादी और समाजवादी मूल्यों के प्रचार प्रसार में लगे हुए थे। लेकिन एक बात और मैं बेलागी से कह ही दूं कि साहित्य और रंगकर्म के क्षेत्रा में उभरे इन दोनों आंदोलनों की परिणति चरम राजनीतिक प्रतिबद्वता और विचारधरा को लेकर घनघोर रूमानियत में हुई। बावजूद इन आंदोलन को लेकर लेखन और रंगकर्म यर्थाथ और प्रगतिशील मूल्यों से दो चार हुआ, कला के इन दो आयामों के अंतः करण के आयतन का जनवादी मूल्यों को लेकर पफैलाव हुआ। चालीस और पचास के दशक में भारतीय समाज भी सामंतवाद के दौर से निकलकर किसी नए व्यवस्था या कहें तो एक नई आधुनिक को अपनाने की कोशिश में था। लेकिन हजारों बरसों से चली आ रही व्यवस्था क्या यकबारगी बदल जाती है। जबाव आएगा नहीं। एक लंबी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और नैतिक प्रक्रिया के बाद ही परिवर्तन आकार लेता है और स्थायित्व को प्राप्त करता है। वर्चस्वादी मूल्यों के पोषकों और उसके विरूद्व आवाज उठाने वालों की टकराहट ही बदलाव की प्रक्रिया के दौरान विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक आंदोलनों को जन्म देती है।
स्वतंत्राता प्राप्ति के ठीक बाद के दौर में सामंतवादी व वर्चस्ववादी मूल्यों को लकर देश के अध्कितर क्षेत्रों में समाज की सोच में कोई ज्यादा बदलाव नही आया था। समाज में जाति, धर्म और भाषा को लेकर विभेद जस के तस थे। जातिप्रथा और छूआछूत सामजिक समरसता और समानता की राह में रोडे बनकर आ रहे थे। कहने का मतलब साफ कि भले ही स्वतंत्र भारत ने प्रजातंत्रा को अपना लिया था संविधन में देश के प्रत्येक नागरिकों को वैयक्तिक स्वतंत्राता देने की बात कह दी गई थी। आखिर सामंतवादी मूल्यों के रहते समतामूलक समाज की कल्पना कैसे संभव हो सकती है। और यही अंतर्विरोध् सिनेमा के पर्दे पर राजकपूर, गुरूदत्त और बिमल राय के हाथों अपनी उपस्थिति को अमरत्व प्रदान कर गए। तभी तो कहते हैं कि एक कलाकार सही मायने में समय के अंतर्विरोध् को अमरत्व प्रदान करता है।

अंतिम इच्छा

यह कविता मैंने ३० दिसंबर २००६ को लिखी थी जिस दिन सद्दाम हुसैन को फांसी दी गयी थी

टीवी पर खबर है
की सद्दाम हुसैन को
फांसी पर लटका दिया गया

ठीक उस वक्त
जब सद्दाम को
फांसी दी जा रही थी
शांति का मसीहा जार्ज बुश
खर्राटे भर रहा था अपनी आरामगाह में
सारी दुनिया में
अमन और चैन
सुनिश्चित करने के बाद

वो डूबा हुआ था
हसीं सपनों में
जहाँ मौजूद होंगी
दजला और फरात
जलक्रीडा के अनेक साधनों में
उसकी नवीनतम पहुँच

या की वो खुद बग़दाद के बाजारों में
अपने हथियारों के साथ

संसार के सबसे शक्तिशाली
लोकतान्त्रिक राजा की ओर से
शेष विश्व को ये था
बकरीद और नववर्ष का तोहफा ...
उसकी वैश्विक चिंताओं और करुना का नमूना

जोर्ज डब्लू बुश
इस धरती का सबसे नया भगवान्
पूछ रहा है ...
हमारी अंतिम इच्छा

फिल्म समीक्षा : थ्री इडियट्स


यह समीक्षा मेरे ब्लॉग के लिए साथी मिथिलेश ने लिखी है. वो भास्कर इंदौर में स्पोर्ट्स डेस्क पर हैं.मैंने अभी तक फिल्म देखी नहीं है जल्द ही देखूंगा.

आमिर खान और राजकुमार हीरानी की चर्चित फिल्म थ्री इडियट्स कई मायनों में लीक से हट कर है. फिल्म के केंद्र में रांचो यानी रण छोड़ दास श्यामल दास चांडड (आमिर) और उसके दो दोस्त फरहान (माधवन) व् राजू रस्तोगी (शर्मन जोशी) हैं. ये तीनों कॉलेज के दिनों के रूम पार्टनर हैं. फरहान फोटोग्राफर बनाना चाहता है जबकि उसके पिता उसे इंजिनियर बनाने पर तुले हैं. राजू के घर की माली हालत ठीक नहीं है और वो अपने पूरे परिवार की उम्मीदों का केंद्र है.

फिल्म एक शाश्वत विषय पर सवाल उठाती है की आखिर कब तक मान बाप बच्चे पर अपनी मर्जी थोपते रहेंगे. वो मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा करती है की किस तरह ऐसे है दबावों के चलते हजारों छात्र हर वर्ष आत्महत्या कर लेते हैं.

कॉलेज के डायरेक्टर वीरू के रूप में बोमन ईरानी ने कमाल का अभिनय किया है. लाइफ एक रेस है का फलसफा सिखाने वाले वीरू आप को हर कॉलेज में दिख जायेंगे.

फिल्म विद्यार्थियों को रट्टू तोता बनाने वाली शिक्षा का जम कर मखौल उडाती है और यह उदहारण भी देती है की रट्टू होना कई बार कितना त्रासद हो सकता है.

माधवन और शर्मन ने अच्छा काम किया है. खास तौर पर इंटरव्यू वाले सीन में शर्मन का ये कहना की बड़ी मुश्किल से ये एटीत्यूड आया है आप अपनी नौकरी रखो मुझे अपना एटीत्यूड रखने दो.

बात चाहे मुन्ना भाई एम् बी बी एस की हो या लगे रहो की हीरानी की फिल्मों में एक सन्देश होता है जो हमें सचेत करता है वो इस बार भी सफल हैं और हाँ आमिर ने ४०+ होने के बाद भी २०-२२ साल के किरदार को पूरी ऊर्जा से निभाया है

हमारे देश में कई ऐसे संस्थान हैं जो बच्चों को तोता बनाने के बजे व्यावहारिक शिक्षा देने पर जोर देते हैं इनमे भोपाल के एकलव्य और आई आई टी कानपुर के विनोद गुप्ता इस दिशा में लम्बे समय से काम कर रहे हैं उम्मीद है अब लोगों का ध्यान उन पर जाएगा.

शैलेंद्र भी थे आरके का हालमार्क (भाग -५ )


शैलेंद्र, शंकर -जयकिशन, सदा सुहागन राग भैरवी, आर के बैनर सभी अपने आप में एक कभी न खत्म होने वाली यात्रा की तरह है। फिल्म संगीत की यह यात्रा जो बरसात से शुरू हुई अनेको पडावो से गुजरने के बाद आरडी बर्मन से होते हुए एआर रहमान तक पहुंच चुकी है। गीत लेखन में शैलेंद्र की विरासत को गुलजार भी एक अलग मकाम तक पहुंचा चुके हैं। जिस समय संपूर्ण सिंह यानी गुलजार ने फिल्म बंदिनी के लिए मोरा गोरा अंग--- लिखा तब वे बिमल राय की टीम में असिस्टेंट हुआ करते थे। बकौल गुलजार शैलेंद्र उनके सबसे प्रिय गीतकार थे और उनके सानिघ्य में ही उनमें गीत लेखन का शउर आया। खैर गुलजार पर अपनी बात को मैं यहीं पर खत्म करता हूं। बाद के खंडों में मैं बिमल राय, बंदिनी, गुलजार और शैलेंद्र को लेकर अलग से लिखूंगा।


अजीत कुमार

बात फिल्म बरसात पर हो रही थी। बरसात के कुल दस गीतों में 5 राग भैरवी पर आधरित थे। ये गीत थे -बरसात में हमसे मिले तुम, मुझे किसी से प्यार हो गया,अब मेरा कौन सहारा, छोड गए बालम, मैं जिंदगी में हरदम रोता ही रहा हूं । अपनी संगीत रचनाओं में शंकर ने सही मायने में भैरवी को सदा सुहागन बनाया । ऐसा कोई रंग नहीं था जिसे शंकर जयकिशन ने भैरवी में न ढाला हो। राग को लेकर शंकर जयकिशन का यह प्रयोग अपने आप में अन्यतम था। मेरे हिसाब से पहाडी को लेकर जिस तरह का प्रयोग नौशाद के यहां देखने को मिले वैसा ही प्रयोग भैरवी को लकर शंकर जयकिशन के यहां देखने को मिलता है। फिल्म दुलारी 1949 के लिए नौशाद के संगीत निर्देशन में राग पहाडी में निबद्व रफी की गायी रचना सुहानी रात ढल चुकी न जाने तुम कब आओगे को भला कौन भूल सकता है।

शंकर कहा करते थे मेरे लिए गीत के बोल चित्र यानी पोर्टेट हैं जबकि धुन फ्रेम । अब आप समझ सकते हो कि गीत के बोलों को लेकर राजकपूर, शंकर और जयकिशन कितने संजीदा थे। अपनी पूरी संगीत यात्रा के दौरान शैलेंद्र फ्रेम के दायरे में रहकर निराकार को आकार ही देते रहे। कहें तो शंकर जयकिशन का फ्रेम पहले तैयार करने का एक ही मकसद होता था, गीतकार के निराकार, निर्गुण को आकार देना, सगुण बनाना। एक बात और फिल्म बरसात में टाइटिल यानी शीर्षक गीत बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम के अलावा सिर्फ एक और गीत पतली कमर है तिरछी नजर है की रचना शैलेंद्र ने की थी। बाकी के गीत फिल्म के अन्य गीतकारों हसरत जयपुरी, रमेश शास्त्री और जलाल मलीहाबादी ने लिखे थे।

आपके जेहन में यह सवाल उठ सकता है कि आखिर राजकपूर ने आरके बैनर की पहली फिल्म बरसात के लिए एक ही साथ इतने गीतकारों को क्यूं रखा। जबकि उस समय सामान्यतया अनुबंध् के तहत कोई एक गीतकार ही किसी एक फिल्म की सारी रचनाओं को लिखता था। लेकिन राजकपूर के लिए बरसात अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी. हालांकि इससे पहले भी वे आग के लिए निर्माता निर्देशक की भूमिका निभा चुके थे लेकिन अपनी पहली फिल्म के तमाम प्रयोगों से वे मुतमइन नहीं थे। उन्हें लग रहा था कि असल मे जो वह सिनेमा के पर्दे पर उतारना चाहते हैं उसके लिए उन्हें अभी तक मनमापिफक टीम नहीं मिली है। इसिलिए उन्होंने अपने प्रयोग को बरसात में भी जारी रखा। यहां मैं यह भी बताना चाहूंगा किशंकर जयकिशन राज की पहली फिल्म आग में संगीत निर्देशक राम गांगुली के साथ साजिंदे के तौर पर काम कर रहे थे। लेकिन फिल्म के प्रोडाक्शन कंटोलर इंदर राज आग के संगीत निर्माण की पूरी प्रक्रिया पर नजर जमाए हुए थे। शंकर जयकिशन की फिल्म संगीत की समझ को लेकर आखिर उन्होंने राजकपूर से उन दोनों को बतौर स्वतंत्रा संगीतकार मौका देने की सिफारिश की। अंततः राजकपूर ने भी फिल्म बरसात के लिए शंकर जयकिशन के नाम पर मुहर लगा ही दी।

बहुतों को यह नहीं मालूम कि बरसात के लिए भी शुरू में राम gangulee को ही बतौर संगीतकार रखा गया था। और कुछेक बातों पर हुए विवाद के बाद उनकी जगह पर शंकर जयकिशन को लिया गया। तो मैं था बरसात के लिए एक ही साथ कई गीतकारों के लेने के विषय पर। मेरे हिसाब से राजकपूर उन सबमें में अपने लिए श्रेष्ठ के चुनाव की प्रक्रिया में थे और चुनाव के लिए विकल्प होने जरूरी हैं। बरसात के गीत संगीत की कामयाबी के बाद राज साहब को अहसास हो गया कि गीत और संगीत को लेकर शंकर जयकिशन शैलेंद्र और हसरत परफेक्ट हैं और फिर शैलेंद्र के निधन 1966 तक ये सभी सभी साथ साथ रहे। राजकपूर का एक ही साथ अपनी फिल्मों के लिए दो गीतकारों और संगीतकारों को रखने के पीछे भी समन्वय का मंत्र काम कर रहा था।

संगीत को लेकर जहां शंकर में शास्त्रीय व कर्नाटक संगीत की गहरी समझ थी वहीं जयकिशन पाश्र्व यानी बैक ग्राउंड म्यूजिक और रूमानी गीतों की संगीत रचना में पारंगत थे। बरसात से पहले पृथ्वी थियेटर में जहां शंकर तबला बजाते थे वहीं जयकिशन हारमोनियम। दोनों ने हिंदी सिनेमा के पहले युगल संगीतकार हुसनलाल भगतराम के साथ भी काम किया। हुसनलाल भगतराम की संगीत प्रतिभा की बानगी उनके संगीत निर्देशन में फिल्म प्यार की जीत के रफी के गाए गीत इस दिल के टुकडे हजार हुए हैं।

गीत लेखन को लेकर जहां शैलेंद्र के यहां पूरब का रंग था वहीं हसरत जयपुरी के यहां पश्चिम का रंग। पूरब और पश्चिम के रंग को हिंदी और उर्दू से भी जोडकर देखा जा सकता है। ऐसे भी कहा जाता है कि शंकर की जहां शैलेंद्र से ज्यादा छनती थी, वहीं जयकिशन की हसरत जयपुरी से । बरसात के संगीत में प्रयोगों पर थोडा और ठहर रहा हूं। ताकि अगले के खंडों में यह समझने में आसानी हो कि प्रयोग की इस प्रक्रिया के साथ साथ एक गीतकार अपने आपको कैसे गढता है। बरसात से पहले आर्केस्ट्रेशन और पश्चिमी बीट्स का इस्तेमाल सिर्फ फीलर के तौर पर होता था मतलब साफ मुखडे और अंतरे के बीच खाली स्पेस को भरने के लिए होता था। लेकिन आर्केस्ट्रेशन का एक नए और विलक्षण अंदाज में बतौर प्रील्यूड, इंटरल्यूड, काउंटर मेलोडी और एपीलाग इस्तेमाल बरसात से ही शुरू होता है। प्रील्यूड का मतलब मुखडे की शुरुआत से पहले गीत की भाव भूमि बनाने के लिए प्रयुक्त संगीत, इंटरल्यूड मतलब मुखडे और अंतरे के बीच का संगीत और एपीलाग यानी गीतकी समाप्ति के लिए प्रयुक्त होने वाला संगीत का टुकडा। शंकर जयकिशन से पहले संगीतकार मुखडे और विभिन्न अंतरों के बीच सामान्यतया एक ही तरह के इंटरल्यूड का इस्तेमाल करते थे लेकिन इस युगल संगीतकार ने मुखडे और विभिन्न अंतरों के बीच अलग अलग तरह के इंटरल्यूड का प्रयोग किया। साथ ही जुगल गीतों के गायिकी के तरीके को भी प्रभावी बनाने के लिए नए प्रयोग किए।

बरसात से पहले नायक नायिका क्रमिक अंतराल पर गीत का अलग अलग हिस्सा गाते थे। सीधे कहें तो अगर नायक मुखडा गाता था तो नायिका अंतरा या पहला अंतरा अगर कोई एक गाता था तो दूसरा अंतरा कोई दूसरा। लेकिन बरसात के युगल गीत छोड गए बालम मुझे हाय अकेला छोड गए में मुखडे के साथ साथ साथ ही स्लो फेड इन में लता का आलाप भी चलता है। एक ही साथ दो अलग अलग टेंपोरेलिटीज यानी ओवरलैपिंग टेंपोरेलिटीज का इस्तेमाल शंकर जयकिशन की युगल संगीत रचनाओं का हालमार्क है।





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Sandeep

शैलेंद्र आरके की प्रयोगशाला के एक चितेरे (भाग 4)


पिछले खंड में फिल्म बरसात यानी कहें तो प्रस्थान बिन्दु तक पहुंच गया था। इस खंड में भी मैं बरसात के गीत और संगीत पर ही टिकना चाहूंगा।


अजीत कुमार

बरसात में राजकपूर, शैलेंद्र, हसरत, शंकर और जयकिशन एक दूसरे से मिले लेकिन उनकी एक दूसरे की गजब पहचान ने भारतीय सिनेमा को कितनी महत्वपूर्ण उपलब्धियां दी। यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। बरसात वह फिल्म थी जिसने फिल्म संगीत को बिल्कुल नई ताजगी और जिंदगी प्रदान की। घिसे पिटे बोलों, उबाउ शास्त्रीयता और प्रचलित मुहावरों ;बंगाली लोकगायन, ठेका के उलट श्रोता पहली बार भारतीय और पश्चिमी वाद्य यंत्रों के अदभूत आर्केस्ट्राइजेशन और रिद्म से उपजी स्वर लहरी में झूमकर अभिभूत हुए।

मेलांकली और मेलोडी का जो रंग बरसात के गीतों में उभरकर आया वह पहले हिंदी फिल्म में कभी नहीं देखा गया था। रागों को फ़िल्मी गीतों में उतारने का तरीका भी शंकर जयकिशन का नायाब था। उनके संगीत में पारंपरिक भारतीय वाद्य यंत्रो का प्रयोग भी सबसे ज्यादा देखने को मिले। कुछेक रागों को लेकर तो शंकर जयकिशन की सिद्वहस्तता इतनी थी कि राग और वे एक दूसरे के पूरक हो गए। भैरवी एक ऐसा ही राग था। सदा सुहागन इस राग में दोनों ने हिंदी सिनेमा को सर्वाधिक रचनाएं दी। एक समय तो शंकर और जयकिशन को लेकर एक अलग भैरवी यानी शंकर-जयकिशन भैरवी कहने तक का प्रचलन हो गया था।

पश्चिम की धुनों का भी शंकर जयकिशन ने अपनी फिल्मों व रचनाओं में प्रयोग किया। आखिर उनकी ईमानदार मेहनत और लगन का ही यह परिणाम था कि उनके ये प्रयोग हमेशा विलक्षण बनकर उभरे। मेलांकली और दर्द भरे गीतों को रिद्मिक बनाने की शुरुआत भी यहीं से हुई। कहें तो आरके के संगीत में मेलांकली और मेलोडी ऐसे अविकल प्रवाहित होती थी जिसका अहसास थमने के बाद ही शुरू होता था। आखिर मेलांकली की सही तस्वीर एसजे के गीतों में ही देखने को मिलती है। अव्वल तो शंकर जयकिशन के यहां जिंदगी कभी ठहरी मिलती ही नहीं। और दुख और सुख तो इसी जिंदगी के दो पहलू हैं। फिर दुख को बांध के उसे और गंदला और विगलित करने में वे विश्वास क्यूं करते। । उन्हें तो विश्वास था दुख और दर्द का बरसात की बूदों सा पवित्रा होने में। जीवनदायिनी बनाने में, सृजन का आधर रचने में। आरके बैनर की सिनेमा का भी यही मूल मन्त्र था । तभी तो व्यवस्था विरोधी और समाजवादी मूल्यों में आस्था के बावजूद आरके बैनर की फिल्मों में पलायनवाद की जगह हमेशा एक नई आशा और विश्वास देखने को मिला।

राजकपूर की फिल्मों में एक विश्वास की डोर जो कभी नहीं टूटी वह थी प्यार के सहारे जिंदगी को हसीन बनाने का व मुरझाए ओंठों पर फूल खिलाने का। बरसात के दर्दीले गीतों जैसे मैं जिंदगी में हरदम रोता ही रहा हूं, बिछडे हुए परदेशी एक बार तो आना तू , अब मेरा कौन सहारा और छोड गए बालम मुझे हाय अकेला छोड गए से पहले क्या दर्द भरे गीतों को कोई तेज धुनों पर सजाने की सोच सकता थां। कहें तो फिल्म बरसात का संगीत ही पूरी तरह से बरसात की माफिक था जिसने श्रोताओं के अहसासों को जी भर के भिंगोया और निचोडा। भौतिक व आघ्यात्मिक, दिल व दिमाग, तन व मन या कहें भारतीय व पश्चिम, गजब का संयोग और समन्वय था आरके बैनर के संगीत में। और समन्वय के बगैर एक सच्चे और संपूर्ण कलाकार की कल्पना तक नहीं की जा सकती। ठीक इसी साल महबूब खान की फिल्म अंदाज भी प्रदर्शित हुई थी। संयोग से इस फिल्म में भी राजकपूर दिलीप कुमार के साथ नरगिस के अपोजिट नायक की भूमिका में थे। फिल्म के लिए संगीत दिया था तब के सबसे ज्यादा मशहूर संगीतकार नौशाद अली ने। जब फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद नौशाद अली ने संगीत पर निर्माता निर्देशक महबूब खान की प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने बाहर हो रही बरसात की ओर इशारा करते हुए जबाव दिया लेकिन आपके गानों को तो बरसात ने धो डाला महबूब खान की इस टिप्पणी से आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि फिल्म बरसात का संगीत उस समय कितना लोकप्रिय हुआ था। लेकिन बरसात के गीतों से शैलेंद्र के गीत लेखन की अद्वितीय प्रतिभा या उनकी प्रयोगात्मकता और गीत सौंदर्य से कोई साक्षात्कार नहीं होता। हां शैलेंद्र ने इस फिल्म के गीतों में इतनी बानगी जरूर पेश कर दी कि गीतकार के तौर पर उनका रेंज गजब का है। और वे सिचूएशन के हिसाब से जल्दी से जल्दी सार्थक गीत लिख सकते हैं ।

शैलेंद्र ने इस फिल्म के माघ्यम से यह भी जता दिया कि सिनेमा के लिए गीत लेखन बंद कमरे में कविता सृजन के बराबर नहीं है। शंकर जयकिशन ने बरसात में पहले से ही तैयार धुनों पर गीतकार से गीत लिखवाने की रिवायत भी डाली । बाद में अपनी ज्यादातर फ़िल्मी गीतों के लिए शंकर जयकिशन यही प्रयोग अमल में लाते रहे। हालांकि गीतकारों की बिरादरी को तब यह चलन बहुत नागवार गुजरा था। और वे इसे गीतकारों के उपर संगीतकारों की श्रेष्ठता से जोडकर देख रहे थे। लेकिन शैलेंद्र एक प्रोफेशनल गीतकार थे और उन्होंने माघ्यम की जरूरत को बखूबी अपनाते हुए अपना श्रेष्ठतम देने का प्रयास किया। और उसमें वे पूरी तरह से सफल भी रहे।

आरके बैनर के संगीत का जादुई अहसास सिर्फ सुरों की बाजीगरी की बिना पर नहीं था। बल्कि शब्द, संगीत और गायिकी यानी गीतकार, संगीतकार और गायक की प्रतिभाओं के एकाकार होने में था। इस बात की मिसाल तो इसी में है कि मुकेश जैसे सीमित रेंज के गायक की आवाज को भी शंकर जयकिशन ने राजकपूर को उधार देने की हिम्मत जुटाई और वे इसमें बेहद कामयाब हुए। आरके बैनर ही सही मायने में प्रयोगशाला से कम नहीं था। जिसमें संपादन, निर्देशन से लेकर गीत, संगीत और पिफल्म के अन्य तकनीकी पक्षों को लेकर भी लगातार प्रयोग किए जाते रहे। और गीत लेखन को लेकर शैलेंद्र भी कभी कम प्रयोग करते नहीं दिखे।

बरसात में हमसे मिले तुम (शैलेन्द्र भाग-३)


सिर्फ पूरब की सतरंगी धनुक ही नहीं आम जीवन की सामान्य जीवनानुभूतियों को शैलेंद्र ने अपने गीतों में कितनी सच्चाई और इमानदारी से पिरोया। इसी का जिक्र मैं इस खंड में करने की कोशिश कर रहा हूं। साथ ही मैंने इस खंड में शैलेंद्र के आगमन के समय और आगमन से ठीक पहले हिंदी सिनेमा में गीत लेखन के इतिहास का जायजा लेने का भी प्रयास किया है। बीच बीच में हर एक बार की तरह कुछ और बातें भी आ सकती है।

अजीत कुमार

इस बात का तो मैंने पहले ही जिक्र कर दिया है कि शैलेंद्र हिंदी सिनेमा के पहले हिंदी गीतकार हुए। हालांकि उससे पहले भी पूरब की पट्टी से चलकर कुछेक लेखक हिंदी सिनेमा में गीत लेखन में आए और हिंदी का रंग जमाने का हर संभव प्रयास भी किया लेकिन कारण चाहे जो भी रहे हों उनके प्रयास पूरी तरह से आकार नहीं ले पाए। उनमें एक नाम गोपाल सिंह नेपाली का भी था। नागपंचमी फ़िल्म के लिए रचित उनके गीत आज भी गीत लेखन की उनकी प्रतिभा की बानगी दे ही जाते हैं। कवि नरेंद्र शर्मा का नाम भी लिया जा सकता है। लेकिन उनका मन भी अंततः सिने विध के बजाए रेडियों की दुनिया में ही रम गया। एक नाम और जिसे सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान भी मिला। वह था कवि प्रदीप का। सम्मान के बावजूद हिंदी सिनेमा उन्हें सफल व सार्थक हिंदी गीतकार के तौर पर पचा नहीं सका।वैसे भी उन्हें उनके गैर फ़िल्मी गीत ए मेरे वतन के लोगों के लिए ही ज्यादा प्रसिद्वि भी मिली। सिने गीतकार के लिए जरूरी रेंज का कवि प्रदीप में घोर अभाव दिखा।

कुछेक नाम और लेना चाहूंगा यथाः मधोक और केदार शर्मा । इन दोनों का पूरब की पट्टी से संबंध् नहीं था लेकिन गीत लेखन को लेकर सादगी और सहजता के उनके प्रयास जरूर याद किए जा सकते हैं। वैसे दोनों ने गीतकार बनने का कभी गंभीर प्रयास भी नहीं किया किया। राजकपूर के उस्ताद के तौर पर प्रसिद्व केदार शर्मा ज्यादातर फिल्म निर्माण और निर्देशन में लगे रहे। गीतलेखन तो वे अपनी हाउस मेड फिल्मों के लिए शौकिया तौर पर कर लिया करते थे। कमोबेश मधोक के लिए भी यही बात कही जा सकती है। फिर भी फिल्म तस्वीर, परवाना और रतन के उनके लिखे हुए गीतों को भला कौन भूल सकता है।

शैलेंद्र से पहले के एक और गीतकार का जिक्र कर लेना भी लाजिमी होगा। वो गीतकार थे आरजू लखनवी। महबूब खान की औरत के लिए आरजू लखनवी के लिखे गीतों का जिक्र यहां पर जरूरी है। फिल्मों के लिए पहली बार अख्तरीबाई की आवाज से मौत्तर फिल्म की दो रचनाएं वो हंस रहे हैं आह किए जा रहा हूं मैं---और जिसने बना दी बांसुरी गीत उसी के गाए जा अपने समय में काफी मशहूर हुई। ये वहीं अख्तरीबाई थी जिसे संगीत की दुनिया मल्लिका-ए-गजल बेगम अख्तर के तौर पर जानती है। विभाजन के बाद आरजू साहब पाकिस्तान चले गए।

शैलेंद्र के कमोबेश साथ साथ ही कई और शायर व कवि गीत लेखन में आए। जिसमें शकील बदायुनी , राजा मेंहदी अली खां, बहजाद लखनवी, साहिर लुधियानवी , मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आजमी, भरत व्यास, राजेंद्र कृष्ण प्रमुख हैं। लेकिन इतनी बडी फेहरिस्त में सिर्फ एक नाम भरत व्यास का ही है जिनका संबंध् कुल मिलाकर हिंदी गीत लेखन से रहा। लेकिन जो भी कहे भरत व्यास के प्रयास भी कुछेक मौकों से ज्यादा आगे नहीं निकल पाए। कुछ फिल्मों के लिए अली सरदार जाफरी , खुमार बाराबंकी और मजाज लखनवी ने भी गीत लिखे लेकिन उन्हें सिने गीत लेखन की दुनिया रास नहीं आई। कहें तो उस समय शैलेंद्र अकेले थे जो उर्दूं फारसी की विरासत से आए उन तमाम गीतकारों के बीच अपनी हिंदी के लालित्य को बिखरने के लिए प्रयासरत थे। और सिने गीत लेखन का इतिहास इस बात का गवाह है कि वे अपने प्रयास में पूरी तरह से सफल रहे। उन्होंने इस बात का लोहा मनवा कर ही दम लिया कि कोई भी कोई भाषा तंग नहीं होती है। तंग होती है तो आपकी नजर और भाषा के प्रयोग की क्षमता।

जो लोग इस बात का दावा किए पिफरते फिरते थे कि ठेठ हिंदी शब्दों के सहारे सिने गीत में सौंदर्य पनप ही नहीं सकता। उन्हें न सिर्फ शैलेंद्र की प्रतिभा का कायल होना पडा बल्कि वे यह भी मानने के लिए मजबूर हुए कि हिंदी की बोलियों और उपबोलियों में लोक का ऐसा रस और लालित्य है जिसके सहारे गीतों के भाव सौंदर्य में चार चांद लगाए जा सकते हैं। मेरे हिसाब से हिंदी सिनेमा में गीत लेखन के क्षेत्रा में शैलेंद्र वह प्रस्थान विंदु हुए जिनकी प्रेरणा से उर्दू और फारसी की विरासत से आए एक से एक बडे शायरों ने भी हिंदी की बालियों और उपबोलियों के शब्दों को अपनाकर अपने गीतमाला को सतरंगी छंटा प्रदान की ।

कह सकते हैं फिल्मों का गीत सही मायने में यहीं से लोक की अल्हडता और सामासिकता से दो चार हुआ। शैलेंद्र का आगमन जिस समय गीत लेखन के क्षेत्रा में हुआ कमर जलालाबादी, राजा मेंहदी अली खां, मजरूह सुल्तानपुरी, और शकील बदायूंनी धूम मचाए हुए थे। नौशाद अली के संगीत निर्देशन में शाहजहां के लिए मजरूह के लिखे गीत जब दिल ही टूट गया और गम दिए मुस्तकिल उस समय लोगों की जुबान पर चढा हुआ था। राजा मेंहदी अली खां तो बाम्बे टाकीज के साथ काम करते हुए पहले ही ख्याति बटोर चुके थे लेकिन संगीतकार गुलाम हैदर के निर्देशन में उनका लिखा गीत वतन की राह पर वतन के नौजवां शहीद हो से ही उन्हें सही मायने में आम लोगों के दिलों में जगह मिली।

जानकारी के लिए बता दूं कि शहीद सिने संगीत की यात्रा का वह पडाव था जिसमें पहली बार पंजाबी ठेका की मधुर और अल्हड थाप सुनने kओ मिली थी। फिल्म दर्द के लिए नौशाद अली के संगीत निर्देशन में शकील बदायूंनी रचित उमा देवी का गाया गीत अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का भी उस समय संगीत रसिकों के साथ साथ आम श्रोताओं के कानों में रस घोल रहा था। ठीक उसी समय शैलेंद्र के समकालीन कुछेक और गीतकार भी पैर जमाने की जद्दोजहद में थे। ज्यादातर का नाम मैं इस आलेख में पहले ही ले चुका हूं। कुछेक छूट भी गए हैं। जिसके माफी मांगता हूं।

सन 1945 से लेकर 1950 के बीच का समय सिर्फ गीतलेखन में आ रहे बदलाव का ही साक्षी नहीं था बल्कि पटकथा, संगीत, मूल्य और तकनीक के स्तर पर संक्रमण के साथ साथ सार्थक परिवर्तन के दौर से भी गुजर रहा था। या कहें तो जन की पक्षध्रता के साथ साथ वृहत्तर सामजिक सांस्कृतिक और स्वतंत्राता संग्राम के मूल्यों को आत्मसात करने की कोशिश कर रहा था। इन सबमें हिंदी सिनेमा कितना सफल रहा इस पर तो अलग से बात की जा सकती है। उस समय बाहर की फ़िल्में भी हमारी हम पर पर असर डाल रही थी। लेकिन सबसे ज्यादा असर हमारे यहां के निर्माता निर्देशकों पर उस समय इटली में पनपे नवयर्थाथवाद का हुआ। मालूम होना चाहिए कि नवयर्थाथवाद ने ही तो सिनेमा को यर्थाथ के धरातल पर उतारा। नवयर्थाथवाद एक ऐसा आंदोलन था जिसने तकनीक के साथ साथ पाश्र्व संगीत, कथानक, संपादन और पटकथा व संवाद लेखन के तौर पर नए प्रयोगों का अपनाया। आम इंसान का दुख दर्द भी स्टूडियो की चाहरीदीवारी से निकलकर आउटडोर लोकेशन के मैदान में आया । विचारधारा के हिसाब से स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद का दौर घोर आदर्श का था इसलिए उस समय के ज्यादातर निर्माता निर्देशकों पर समाजवादी मूल्यों की भी गहरी छाप देखी गई। साथ ही विभाजन की त्रासदी को भी हिंदी सिनेमा जज्ब करने की कोशिश में लगा हुआ था।

मनोरंजन के साथ साथ समाजवादी, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का सबसे सरल और सहज संयोग उस समय राजकपूर के यहां देखने को मिला। तभी तो राजकपूर हिंदी सिनेमा के पहले और आखिरी शोमैन कहलाने के हकदार हैं। गीत लेखन को लेकर भी कमोबेश ठीक इसी तरह का संयोग शैलेंद्र के यहां भी था। इसलिए तो राकपूर के अंदर के कलाकार ने अपने जैसे एक और कलाकार को परखने में देर नहीं की । जब राज ने शैलेंद्र को पहली बार सुना उस समय आरके बैनर अस्तित्व में नहीं आया था। लेकिन बतौर निर्माता निर्देशक राज की पहली फिल्म आग बनने की प्रक्रिया में थी। इसलिए उस समय राज के साथ न तो संगीतकार शंकर जयकिशन की जोडी थी और न था ख्वाजा अहमद अब्बास जैसा पटकथा लेखक। शैलेंद्र ने उस समय राज के प्रस्ताव को ठुकराकर ठीक ही किया क्योंकि आग के लिए संगीतकार रखे गए थे राम गांगुली। और क्या पता राम गांगुली शैलेंद्र की प्रतिभा के साथ शंकर जयकिशन जैसा न्याय कर पाते या नहीं।

खैर आरके बैनर 1949 में अस्तित्व में आया जब राजकपूर अपने आरके बैनर के लिए शैलेंद्र, शंकर जयकिशन , मुकेश, और हसरत जयपुरी के साथ गीत और संगीत की एक ऐसी न थमने वाली बरसात लेकर आए जिसे सुन सुन कर श्रोता आज तक भींज रहे हैं। एक बात और बता दूं कि इप्टा के लिए ध्रती का लाल जैसा स्क्रिप्ट लिखने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास फिल्मों आवारा ; 1950 से आरके बैनर के साथ हुए। बरसात से ही शुरू किया राजकपूर ने टाइटिल यानी शीर्षक गीत का प्रचलन। और हिंदी पिफल्मों का पहला शीर्षक गीत बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम को शैलेंद्र ने ही शब्दों में पिरोया।

मुझे पता था तुम्हारा जवाब


उन दिनों

जब मैं तुम्हें टूटकर प्यार करना चाहता था

लिखता रहा प्रेम कविताएं

ऐसे में चूंकि मुझे पता था तुम्हारा जवाब,

मुझे कवितायेँ तुमसे संवाद का बेहतर जरिया लगीं

मैं बेहद खुश होता तुम्हारे जवाबों से

वह मेरी आजाद दुनिया थी

जहां किसी का दखल नहीं था

किसी का भी नहीं

मेरा दिल एक कमरा था

उस कमरे में एक ही खिड़की थी

खिड़की के बाहर तुम थीं

यूं तो कमरे में हमेशा दो लोगों के लिए पर्याप्त जगह मौजूद थी

लेकिन तुमने खिड़की पर खड़े होकर

उस पार से बतियाना ही ठीक समझा

किसी का होकर भी उसका न हो पाना

ये दर्द कोई मुझसे पूछे

ठीक अभी अभी इस उदास रात में

आसमान में कोई तारा चमका है

शायद तुम खिड़की के बाहर खिलखिलाकर हंसी हो

आने वाले कल का आईना है अवतार

अब तक देखी गई विज्ञान फंतासी फिल्मों में मुझे जेम्स कैमरून की अवतार सबसे अधिक पसंद आई तो इसके पीछे वह कारण बिल्कुल नहीं था कि ये 2000 करोड़ खर्च करके बनाई गई तकनीकी रूप से अत्यंत सक्षम फिल्म है। ऐसा भी नहीं है कि इसने अभिनय के कोई नए प्रतिमान स्थापित किए हों। फिल्म मुझे इसलिए अच्छी लगी क्योंकि यह हमारे भविश्य की सच्ची कहानी कहती है।

क्या है कहानी


अल्फा नाम के सितारे का चक्कर लगा रहे एक ग्रह पोलिफेमस के उपग्रह पैंडोरा के जंगलों में इंसान को दिखते हैं अकूत संसाधन... बस शुरू हो जाता है, इंसान का मिशन − प्रोग्राम अवतार, जिसमें भाग लेने के लिए जेक सुली को भी चुना जाता है... जेक पुराना नौसैनिक है − चोट खाया हुआ और कमर के नीचे अपाहिज... उसे बताया जाता है कि इस मिशन के बाद वह अपने पांवों पर चल सकेगा... लेकिन मिशन आसान नहीं है, क्योंकि पैंडोरा की हवा में इंसान सांस नहीं ले सकते। इसके लिए तैयार किए जाते हैं 'अवतार' − जेनेटिकली तैयार ऐसे इंसान, जो वहां जा सकें। इस नए जिस्म के साथ पैंडोरा में चल सकेगा जेक...लेकिन दूसरी तरफ पैंडोरा के मूल वासी भी हैं − 'नै वी', जिन्होंने अपनी दुनिया को ज्यों का त्यों बनाए रखा है... वे आदिम लगते हैं, लेकिन अपनी धरती को बचाने के लिए लड़ सकते हैं। इस जंग में मालूम होता है कि 'नै वी' कई मामलों में इंसानों से आगे हैं।आगे की कहानी इसी से जुड़े रोमांचक टकराव की कहानी है, लेकिन फिल्म सिर्फ जंग पर खत्म नहीं होती। उसमें एक कहानी मोहब्बत की भी है। पैंडोरा के जंगलों में दाखिल होते जेक के सामने खतरे भी आते हैं और खूबसूरत चेहरे भी। यहीं उसे मिलती है नेयित्री... साल सन् 2154... अपनी धरती के बाहर दूर−दूर तक देख रही है इंसान की आंख। इस मोड़ पर यह विज्ञान कथा युद्ध और प्रेम के द्वंद्व रचती एक मानवीय कहानी भी हो जाती है। जेक के लिए तय करना मुश्किल है कि वह अपनी धरती का साथ दे या अपने प्रेम का।


लाख टके का सवाल यह है कि जिस तेजी से पृथ्वी के संसाधनों की लूट हो रही है क्या इस फिल्म को महज कल्पना मानकर हम इसे काफी और पोपकोर्न के साथ देखें। क्या ये सच नहीं है कि शहरों के भरपूर दोहन के बाद अब इंसान आदिवासी इलाकों उन जंगलों की ओर रुख करने लगा है जहां ये संसाधन वर्शों से संरक्षित पड़े हैं।


क्या पेंडोरा कोई दूसरा ग्रह ही है हमारे आसपास स्थित झाबुआ, अबूझमाड़ बस्तर के जंगल पेंडोरा नहीं है। क्या आपसी साहचर्य और प्रेम से भरे उनके जीवन में विकास के नाम पर भौतिक सुविधाओं और पैसे का जहर घोलने की कोषिष हम नहीं कर रहे हैं जो उनके लिए अब तक कतई गैर जरूरी बना रहा है। एक बार अवतार देखिए और इन सब मुद्दों पर सोचिए।

शैलेंद्र हिंदी सिनेमा के पहले जनगीतकार (भाग २)


प्रथम भाग में मैंने शैलेंद्र से ज्यादा उस समय का जायजा लिया जो उनके हिंदी सिनेमा में आगमन से पहले या आगमन के शुरूआती दिनों में विद्यमान थी। रही बात शैलेंद्र की फिल्मी यात्रा की तो इस भाग में उस पर आने की कोशिश कर रहा हूं।

अजीत कुमार

पहले भाग में ही यह स्पष्ट कर देने की कोशिश की थी कि शैलेंद्र को हम बतौर एक ऐसे गीतकार के तौर पर याद करेंगे जिन्होंने सिने गीत लेखन के तमाम प्रचलित मुहावरों से हटकर अपना एक अलग रंग जमाया। जिसमें लोक का रंग, सादापन, लालित्य सबकुछ समाहित था। मेरे हिसाब से हर कलाकार के अंदर एक बागी की आत्मा निवास करती है जो उसे रूढियों और प्रचलन के विरूद्व जाने के लिए बाध्य करती है। शैलेंद्र भी सचमुच में एक बागी गीतकार थे।


थियेटर की कोख से नए नए जन्मे हिंदी सिनेमा के लिए उस समय ठेठ हिंदी में गीत लेखन के बारे में सोचना भी दुश्वार था। उर्दू और फारसी के अल्फाजों के बगैर संवादलेखन से लेकर पटकथा लेखन और गीतलेखन की कतई गुजाइश नहीं थी। लेकिन इप्टा और प्रलेस के लिए कलम चलानेवाला लेखक पारसी थियेटर के उस घिसे पिटे सामंती और उपनिवेशवादी चरित्र को कैसे आत्मसात कर सकता था। यूं तो उस समय शैलेंद्र के ज्यादातर साथी जो प्रलेस और इप्टा में उनके साथ थे देर सबेर सिनेमा की ओर रुख किया लेकिन शैलेंद्र ही अकेले हैं जिनके यहां सिने गीतलेखन के क्षेत्र में भाषा और शिल्प को लेकर नए प्रयोग मिलते हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं शैलेंद्र पहले गीतकार हुए जिन्होंने सिने गीत लेखन को आम जनों की जुबान में ढाला। यह घूंटी तो प्रलेस के सानिघ्य में उन्हें पीने को मिली थी। जिसे कर्म क्षेत्र में उतारने में भी उन्होंने कोई कोताही नहीं की।


प्रलेस के ज्यादातर साथी यथा -कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी सिने गीत लेखन के क्षेत्र में आए जरूर लेकिन भाषा के तौर पर ये सारे के सारे उसी फारसी और उर्दू की विरासत से निकले थे। हालांकि अपने गीतलेखन में इन शायरों ने हिंदी और उसकी बोलियों के रंग का बाखूबी इस्तेमाल किया लेकिन सादगी लोक और हिंदी का जो रंग शैलेंद्र जमाने में कामयाब हुए उसकी मिसाल नहीं। कैफी, साहिर और मजरूह जैसे गीतकारों ने भले ही अपनी अपनी शायरी में प्रलेस के मूल्यो को थोडा बहुत अपनाया लेकिन सिने गीत लेखन के क्षेत्र में वे पारसी थियेटर के गीत लेखन की परंपरा की कडी को ही मजबूती देते देखे गए। कहें तो देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित कराने वाले शैंलेंद्र पहले गीतकार थे। हिंदी पट्टी यानी पूरब का रंग शैलेंद्र के बाद किसी के यहां नहीं देखने को मिला।

लोगों को ताज्जुब हो सकता है कि आखिर रावलपिंडी में पला बढा एक इंसान अपने सिने गीतों में पूरब का इतना बेजोड रंग कैसे ढाल सकता है। आखिर कलाकार तो कलाकार होता है उससे यही जादुई प्रयोग की अपेक्षा भी की जाती है। लेकिन इसके पीछे असली राज तो यह है कि शैलेंद्र के दादाजी यानी केसरीलाल का संबंध बिहार से था। बचपन के कुछेक दिन भी उनके मथुरा में ही गुजरे। अपने पुरखों की धरती बिहार की खुशबू से लबरेज शैलेंद्र की रावलपिंडी, मथुरा और बंबई की यायावरी ने ही तो उनके व्यक्तित्त्व में उर्दू हिंदी यानी गंगा जमुनी तहजीब की इतनी सम्मिलित मिठास भर दी। जो उनके गीतों के माध्यम से आज भी श्रोताओं को पूरबा बयार सी शीतलता प्रदान कर रही है। लेकिन उस शीतलता में भी बसती है टीस, भेद जानने की आतुरता, चुभन, कसक, अव्यक्त का दर्द।

उठ्ठा है तूफान जमाना बदल रहा (शैलेन्द्र -भाग एक )


ये अजीत सर का बडप्पन है कि शैलेन्द्र पर मेरे लिखे को बढ़िया बता रहे हैं हकीकत यह है कि उस दिन इन्होने मुझे सतही लेखन के लिए जम कर लताड़ लगाई थी। सर अपने प्रिय गीतकार पर तीन भाग में लिखेंगे। ये श्रंखला का पहला भाग है - संदीप


अजीत कुमार
संदीप का शैलेन्द्र पर लिखना अच्छा तो लगा लेकिन अपन को तो इतने से संतोष कहां। सो मैं संदीप की बात को आगे बढाने की कोशिश कर रहा हूं।


लिखने की शुरूआत में ही मेरे सामने यह प्रश्न उठ रहा है कि आखिर शैलेन्द्र को कैसे याद करूँ बतौर गीतकार या कवि। ऐसा इसलिए कि अगर मैं शैलेंद्र को बतौर कवि याद करता हूं तो आलोचकों की भौंहें तन सकती है। क्योंकि ये आलोचक तो दिनकर, बच्चन और गुप्त तक को कब के खारिज कर चुके हैं। और रही बात शैलेंद्र, नीरज, और भरत व्यास की तो इन सबको ये महानुभाव टिप्पणी के लायक भी नहीं समझते। खैर मैं यहां कवि के तौर पर शैलेंद्र को याद नहीं कर रहा हूं और इसकी जरूरत भी नहीं समझता। इसकी जरूरत तो साहित्य की कसौटी पर सिनेमा को कसनेवालों को होगी। मेरे हिसाब से सिनेमा अकेले में ही एक ऐसी सशक्त स्वायत्त और संश्लिष्ट विधा है जिसका हर एक पक्ष अपने ही प्रतिमानों, अवधारणाओं और कसौटियों पर कसे जाने की योग्यता रखता है। और रही बात अगर भारतीय सिनेमा की तो इसे सिनेमा के प्रचलित यूरोपीय और अमेरिकी सिद्वातों से अलग हटकर देखने की भी जरूरत होगी। ऐसा नहीं करने पर कभी भी शैलेंद्र जैसे गीतकार का वाजिब मूल्यांकन नहीं हो सकता।


हिंदी सिनेमा की बात बगैर गीत और संगीत के कभी पूरी हो ही नहीं सकती। कहें तो हिंदी सिनेमा ही क्या भारतीय जनमानस को ही संगीत से अलग कर देखा नहीं जा सकता। आम भारतीय जीवन का ऐसा कोई सोपान नहीं जिसका संगीत स्वागत नहीं करता हो। चाहे उसके कितने ही अलग अलग रंग हों । बधैया, लोरी, भजन, कीर्तन, चैती, होरी, दादरा, पूरबी, निर्गुण, बाउल, भटियाली, विदेसिया जैसी अनेकों शैलियों में लोकजीवन के अलग अलग सोपानों का रंग निरेखा जा सकता है। इतना ही नहीं अपने यहां लोरिक और बिरहा जैसी लोकगाथाओं के गायन का भी प्रचलन है। सामवेद से लेकर संस्क्त के नाट्य रूपक भी भारतीय जनमानस के साथ संगीत की अनिवार्यता और अविभाज्यता को ही तो प्रदर्शित करते हैं।


लोकजीवन के इसी देशज रंग और लालित्य को सिनेमा में प्रतिस्थापित किया अमर गीतकार शैलेंद्र ने। उस समय जब हिंदी सिनेमा पारसी थियेटर रंग में पूरी तरह सराबोर था। बगैर फारसी और उर्दू का पाठ किए कोई संवाद लेखन, पटकथा और गीत की रचना के बारे में सोच भी नहीं सकता था। सिने संगीत पर भी पारसी थिएटर की शास्त्रीयता और उपशास्त्रीयता का गजब का असर था। लेकिन उस दौर के सिनेमा में नाटकीयता, भडकाउ साज सज्जा और बोझिल शास्त्रीयता के सिवा कुछ भी नहीं था। ठीक यही बात गीत लेखन को लेकर भी थी। पटकथा ज्यादातर ऐतिहासिक और मिथकीय पात्रों के इर्द गिर्द ही बुनी जाती थी। इसलिए गीत लेखन को लेकर प्रयोग या सामजिक मूल्यों के सहज प्रसार की कोई गुंजाइश नहीं के बराबर थी। कहो तो उस समय हिंदी सिनेमा का कोई अपना रंग ही नहीं था। था तो सिर्फ पारसी थिएटरों की उबाउ और थक चुकी शैली का उबास रंग।


जो लोग हिंदी सिनेमा में गीत, संगीत और नृत्य की परंपरा को पूरी तरह से पारसी थियेटर की देन मानते हैं उन्हें यह जानना चाहिए कि भारतीय लोकजीवन में संगीत, गीत और नृत्य की परंपरा उस समय से है जब शास्त्रीय संगीत का कोई अस्तित्व नहीं था। संगीत का कोई भी जानकार आपको यह बता देगा कि लोकसंगीत सभी संगीतों की जननी है। हां पारसी थियेटर के बारे में इतना तो जरूर कह सकता हूं कि इसने सामंती और उपनिवेशवादी मूल्यों पर आधारित नाटकीय, दरबारी और बोझिल शास्त्रीयता से ओत प्रोत संगीत का बोझ जरूर डाला हिंदी सिनेमा पर। लेकिन लोकमूल्यों और प्रगतिशील विचारों से कला के तमाम आयामों को रंगने की मुहिम भी उस समय जोर पकड रही थी। जहां लेखन के क्षेत्र में प्रगतिशील लेखक संघ समतामूलक विचारों को प्रसारित कर रहा था वहीं इंडियन पीपुल्स थियेटर यानी इप्टा अपनी विशिष्ट लोकशैली में जनमानस को दकियानूसी और सामंती विचारों का चोला उतारने के लिए प्रेरित कर रहा था।


अंतर्राष्टीय स्तर पर भी सिनेमा को लेकर इटली में नवयर्थाथवाद दस्तक दे चुका था। और आपको जान लेना चाहिए कि शैलेंद्र भी हिंदी सिनेमा में अपने आगमन से पहले इप्टा के लिए ही काम कर रहे थे। साथ में थे शम्भू मित्रा, बलराज साहनी, ख्वाजा अहमद अब्बास, पृथ्वीराज कपूर, बिजोय भट्टाचार्या, उत्पल दत्त और सलिल चैधरी जैसे समर्पित कलाकार। जो बाद में भारतीय सिनेमा के शीर्ष हस्ताक्षर बनकर सामने आए। अब आप सोच ही सकते हैं कि इप्टा के लिए अपनी कलम चलाने वाला क्या पारसी थियेटर के घिसे पिटे मुहावरे में अपने आपको कैद कराने के लिए तैयार हो सकता था जबाव आएगा कभी नहीं। लेकिन आम जिंदगी की मजबूरी इंसान को अपने मूल्यों से दूर जाकर भी पैर टिकाने के लिए बाघ्य करती है। यही शैलेंद्र के साथ भी हुआ।


हालाँकि मजबूरी इंसान को समझौता करने के लिए तैयार कर लेती है फिर भी उसके अंदर का कलाकार और मैं उसे उस प्रचलित मुहावरे में भी एक विशिष्ट रंग भरने के लिए उकसाता ही रहता है और इसमें वह कामयाब हो ही जाता है। शैलेंद्र क्या इप्टा के अन्य साथी कलाकारों को लेकर भी यही कहा जा सकता है। अपने अपने फनों के ये माहिर मुख्यधारा की सिनेमा में आए जरूर लेकिन अपने मूल्यों और पहचान से सिनेमा का नया सौंदर्यशास्त्र रचकर गए। तभी तो आज भारतीय सिनेमा का इतना विकसित रूप रंग आज आपके सामने है। इप्टा से संबद्व शैलेंद्र के तमाम साथी फनकारों ने भारतीय सिनेमा को विश्व स्तर पर अलग पहचान दी और कला के इस अनूठे माध्यम को भारतीय लोकजीवन और यर्थाथ के रंग से सराबोर किया। सिर्फ इप्टा ही नहीं प्रगतिशील लेखक संघ के साथ भी शैंलेंद्र का लंबा संबंध रहा। लोक की जमीन पर अपने लेखन को उतारने का वैसे तो उनके पास नैसर्गिक शउर था लेकिन प्रलेस के साथी कलाकारों के सानिध्य में तेवर में लोक का रंग और चढा। कुल मिलाकर कहें तो शैलेंद्र के जनगीतकार ने इप्टा और प्रलेस में आकर अपना पूरा आकार लिया।

भारतीय भाषाओं के ज्यादातर शीर्ष लेखकों का संबद्व उस समय प्रगतिशील लेखक संघ से था। कुछेक नामों को मै यहां पर लेना चाहूंगा यथा- सज्जाद जहीर, मुल्कराज आनंद, सआदत हसन मंटो, अली जावेद जैदी, फैज अहमद फैज, भीष्म साहनी, राजेंद्र सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, कैफी आजमी, कृष्णचंदर, साहिर लुधियानवी, अली सरदार जाफरी, मजरूह सुल्तानपुरी सरीखे लेखक। उट्ठा है तूफान जमाना बदल रहा और तू जिंदा है तोजिन्दगी की जीत पर यकीन कर जैसे इप्टा के लिए शैलेंद्र के लिखे गीत तो उस समय लोगों की जुबान पर बदलाव और प्रगतिशील मूल्यों के बोल बनकर फूट रहे थे।


आखिर इसी इप्टा के लिए शैंलेंद्र जब अपना गीत जलता है पंजाब पढ रहे थे, श्रोताओं की कतार में बैठे राजकपूर पर इतना असर हुआ कि वे उनको अपनी फिल्मों के लिए गीत लिखने का आमंत्रण तक दे गए। लेकिन उस समय शैलेंद्र सिर्फ कलाकार थे । और सिर्फ एक कलाकार इसके लिए कैसे तैयार हो सकता था। सो वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। लेकिन एक कलाकार के साथ साथ एक पिता की भूमिका में आते ही उन्हें आखिर परिवार की गाडी चलाने के लिए राजकपूर के प्रस्ताव को स्वीकार करना पडा। और फिर राजकपूर ने आरके बैनर के लिए एक ऐसी टीम बनाई जिसने तीन चार दशकों तक लोगों का न सिर्फ जी खोलकर मनोरंजन किया बल्कि सिनेमा के माध्यम से मानवीय और सामाजिक मूल्यों के प्रसार का भी बीडा उठाया। जहां गीत लेखन में शैलेंद्र के साथ हसरत जयपुरी रखे गए। वहीं संगीत की जिम्मेदारी शंकर जयकिशन के कंधों पर डाली गई। इप्टा के साथी कलाकार ख्वाजा अहमद अब्बास को पटकथा लेखक की भूमिका में लिया गया। और गायक मुकेश को तो राजकूपर ने अपनी आवाज ही दे डाली।

एक अजनबी शहर में मर जाने का ख्याल

एक नए शहर में
जिससे अभी आप की जान पहचान भी ठीक से ना हुई हो
मर जाने का ख्याल बहुत अजीब लगता है
ये मौत किसी भी तरह हो सकती है
शायद ऐ बी रोड पर किसी गाडी के नीचे आकर
या फिर अपने कमरे में ही करेंट से
ऐसा भी हो सकता है की बीमारी से लड़ता हुआ चल बसे कोई
हो सकता है संयोग ऐसा हो की अगले कुछ दिनों तक कोई संपर्क भी ना करे
माँ के मोबाइल में बैलेंस ना हो और वो करती रहे फ़ोन का इंतज़ार
दूर देश में बैठी प्रेमिका / पत्नी मशरूफ हो किसी जरूरी काम में
या फिर वो फ़ोन और मेसेज करे और उसे जवाब ही ना मिले
दफ्तर में अचानक लोगों को ख़याल आयेगा की उनके बीच
एक आदमी कम है इन दिनों
ऐसा भी हो सकता है की लोग आपको ढूंढना चाहें
लेकिन उनके पास आपका पता ही ना हो ....

सजन रे झूठ मत बोलो़...


मैं सोचता हूं कि हिंदी सिनेमा से जुड़े लोगों की कभी चर्चा की जाएगी तो क्या वह शैलेन्द्र और राज कपूर का जिक्र किए बिना पूरी होगी? शायद नहीं। उन्हें तो नियति ने भी एक अनूठे बंधन में बांध दिया था। 14 दिसम्बर को जहां राज कपूर इस दुनिया में आए थे वहीं शैलेन्द्र ने इसी तारीख को इस दुनिया को अलविदा कहा। एक का जन्म पेशावर में हुआ तो दूसरा रावलपिंडी में पैदा हुआ। एक ने पिता से रंगमंच व अभिनय का ककहरा सीखा तो दूसरा शुरू से है इप्टा से जुड़ गया. इसमें कोई शक नहीं कि राज कपूर ही वह फिल्मकार थे जिसके साथ शैलेन्द्र ने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया।

राज कपूर ने पहली बार शैलेन्द्र को एक कवि सम्मेलन में सुना था। उन्होंने अपनी फिल्मों के लिए उनके गीत मांगे, जाहिर है मस्त तबीयत शैलेन्द्र ने साफ इंकार कर दिया। दिन बीते जीवन की कड़वी हकीकतों से रूबरू होने के बाद शैलेन्द्र को जरूरत आन पड़ी वे बंबई पहुंचे राज कपूर के पास। उन्होंने उनकी फिल्म बरसात के लिए पहला गाना लिखा- बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम...।

एक और समानता जो दोनों में मिलती है वह थी जन सरोकारों की चिंता को अपनी रचनात्मकता के जरिए अभिव्यक्ति देने की। राज कपूर जहां उस समय आवारा, आग, बूट पोलिश, जागते रहो जैसे सिनेमा बना रहे थे वहीं शैलेन्द्र रमैया वस्ता वैया..., सब कुछ सीखा हमने ..., जिस देश में गंगा बहती है... जैसे गीत लिखकर निहायत ही आदर्श आम आदमी की कल्पना में जुटे हुए थे।

शैलेन्द्र का सपना तीसरी कसम
प्रख्यात लोकधर्मी कथाकार फणीष्वरनाथ रेणू की कहानी मारे गए गुलफाम पर एक फिल्म बनाना शैलेन्द्र का सपना था। राज कपूर को नायक लेकर उन्होंने इस पर फिल्म बनाई तीसरी कसम। कपूर ने दोस्ती निभाते हुए इसके लिए पारिश्रमिक लिया महज एक रुपया। विभिन्न कारणों से फिल्म का बजट बढ़ता गया और शैलेन्द्र कर्ज में डूबते गए। इसकी जिम्मेदारी काफी हद तक राज कपूर पर भी डाली जाती है। फिल्म के फ्लाप होने के सदमे ने सिनेमा के अब तक के शायद सबसे सशक्त गीतकार को हमसे छीन लिया। हालांकि उनकी मौत के बाद फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रपति स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ।

पुनश्च-तीसरी कसम फिल्म में हीरामन की बैलगाड़ी को क्या मुख्य पात्रों से अलग करके देखा जा सकता है? अभी ब्रजेश भाई का एक लेख नेट पर देखा जिसके मुताबिक वह गाड़ी अब भी पूर्णिया जिले के बरेटा गांव में रेणू की बहन के घर पर रखी हुई है। -- Sandeep

डाक्टर कलाम से एक मुलाकात


शुक्रवार को डाक्टर एपीजे अब्दुल कलाम से मुलाकात करने का अवसर मिला अपने अखबार की ओर से। वे आईआईएम इंदौर के दो दिन के दौरे पर यहां आए हुए हैं। हालांकि पहले दिन मीडिया को औपचारिक निमंत्रण नहीं था लेकिन हम घुसपैठ करने में कामयाब रहे। डाक्टर कलाम ने बच्चों से आग्रह किया कि देश के ग्रामीण इलाकों के विकास में सक्रिय योगदान दें।

जब हम पहुंचे डाक्टर कलाम बच्चों को पुरा प्रोजेक्ट के बारे में अपनी सोच बता रहे थे। इससे पहले मैंने इस प्रोजेक्ट के बारे में सुना नहीं था। इसका पूरा रूप है- प्रोवीजन आफ अर्बन अमिनिटीज इन रूरल एरियाज। अर्थात ग्रामीण इलाकों में शहरी सुविधाएं। उन्होंने बताया कि निजी सार्वजनिक भागीदारी पर आयोजित यह योजना कुछ स्थानों पर सफलतापूर्वक चल रही है। जिसमें 20-30 गांवों के एक समूह को चिह्नित कर उसे एक स्वावलंबी टाउनशिप के रूप में विकसित किया जाता है। इस पुरा में नालेज सेंटर, एग्री क्लीनिक्स, टेली एजुकेशन , टेली मेडिसिन, वाटर प्लांट कोल्ड स्टोर आदि की समुचित व्यवस्था के साथ साथ लोगों को स्किल्ड वर्कर के रूप में ट्रेंड भी किया जाता है।

उन्होंने आईआईएम इंदौर से आग्रह किया कि पुरा को वह पाठ्यक्रम में शामिल करे। इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि देवास और झाबुआ जैसे नजदीकी इलाकों में ऐसे पुरा स्थापित कर उनका प्रबंधन आईआईएम के बच्चों को सौंपा जाना चाहिए;

डाक्टर कलाम ने हालांकि पुरा परियोजना को पॉवर प्वाइंट की मदद से काफी बेहतर ढंग से समझाया लेकिन फिर भी कुछ सवाल अनुत्तरित रह गए। मसलन,

यदि पुरा में पंचायती संस्थाओं की क्या भूमिका होगी ?

क्या वे निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम करेंगी ?

उनके अधिकारों का बंटवारा किस तरह होगा ? आदि आदि।

इसके अलावा मेरे मन में यह सवाल भी उठा कि आखिर निजी क्षेत्र को सुदूर ग्रामीण इलाकों में ऐसे धर्माथ दिख रहे काम में क्या रुचि होगी? अगर वह इसमें रुचि लेता है तो क्या यह भू माफिया को परोक्ष समर्थन और बढ़ावा नहीं होगा?

डाक्टर कलाम के साथ पुरा परियोजना पर काम कर रहे आईआईएम अहमदाबाद के पासआउट सृजन पाल सिंह भी थे। ये वही सृजन हैं जो कुछ अरसा पहले सक्रिय राजनीति में आने की इच्छा जता कर सुर्खियों में आए थे। उन्होंने लंबे चैड़े पैकेज के बजाय कलाम के साथ कुछ सार्थक काम करने को तरजीह दी है।

रोचक - चाय के दौरान मुझे कलाम साहब से बातचीत का मौका मिला। मैंने उनसे पूछा कि आमतौर पर उनके लेक्चर आईआईएम और आईआईटी जैसे बड़े संस्थानों में ही क्यों होते हैं क्यों नहीं वे छोटी जगहों के सरकारी स्कूल कालेजों में जाते? इसपर कलाम साहब का जवाब काफी मजेदार था। उन्होंने जोर देकर कहा कि वे छोटे कालेजों में भी जाते हैं। उन्होंने कुछ छोटे कालेजों के नाम गिनाए जिनमें मैं सिर्फ सेंट जेवियर कालेज का नाम ही ध्यान रख पाया। बाकी नाम चूंकि मैंने सुने नहीं थे कभी इसलिए वे मेरी स्मृति से निकल गए।

बिहार यात्रा वृत्तांत






अजीत सर की शादी में अरसा बाद बिहार जाना हुआ. गया नालंदा, नवादा इन जगहों पर खूब घूमे. पहले के मुकाबले जबरदस्त ढंग से बदली है बिहार की तस्वीर. गया से हसुआ तक का ४५ किमी का सफ़र बस से महज १ घंटे में तय हो गया वो भी जगह जगह रुकते हुए. क्या शानदार रोड थी एकदम चिक्कन. गाडी सरपट भाग रही थी.

सर की शादी २ तारीख को थी खूब डांस वांस किये हम लोग. रात में देर तक जग कर पूरब की शादी देखी. वहां से महावीर स्वामी का अंतिम संस्कार स्थल पावापुरी एकदम पैदल दूरी पर था सो सुबह सात बजे जा पहुंचे वहां. जलमहल में महावीर के पद चिन्हों के दर्शन किये और ढेर सारे मंदिरों का भ्रमण किया.

करीब १२ बजे बारात लौटी और २ बजे एक बार फिर सर को साथ लेकर हम लोग राजगीर-नालंदा की ओर कूच कर गए. राजगीर के गरम कुण्ड को लेकर मन में तरह तरह की जिज्ञासाएं थीं की आखिर वहां पानी गरम कैसे रहता है? गोलमोल पहाडी रास्तों से गुजरते हम राजगीर पहुँच तो गए लेकिन गर्म कुण्ड का गन्दला पानी देख कर मन घिन्ना गया सो नहाने का प्लान आम सहमती से रद्द कर दिया गया. राजगीर में हमने खाना भी खाया. उसकी गजब व्यवस्था थी. वहां ढेर सारे परिवार चूल्हा और बर्तन उपलब्ध कराते हैं आप अपना राशन लेकर जाइये जो मर्जी पका कर खाइए. उन्हें बस चूल्हे और बर्तन का किराया दे दीजिये.

कुण्ड की ओर जाते हुए एक अजीब बात देखी. वहां एक तख्ती पर लिखा था माननीय पटना उच्च न्यायलय के आदेश से कुण्ड में मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित है. तमाम कोशिशों के बावजूद मैं इस बारे में ज्यादा मालूमात हासिल हीं कर सका.

अगला पड़ाव था नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष. शाम करीब ४ बजे हम वहां पहुंचे लेकिन तब तक कुछ साथियों की हिम्मत पर नींद और रात की थकन हावी हो चुकी थी सो उन्होंने गाडी में आराम करने का फैसला किया और हम ३-४ लोग जा पहुंचे नालंदा विवि के खंडहरों के स्वप्नलोक में. मन में बौध कालीन ज्ञान विज्ञानं के विकास की स्मृतियाँ कौंधने लगीं. हमने उसे जी भर के निरखा. विवि की १५०० पुरानी बसावट की व्यवस्था- कमरे, स्नानागार, भोजन कक्ष और विहार आदि को देख कर अपने शहरों की अनियोजित बनावट का ध्यान आ गया. लगा की हम विकास क्रम के कुछ मूल्यों में पीछे तो नहीं जा रहे हैं.

नालंदा विवि के बारे में सुन रखा था की आतताइयों के आग लगाने के बाद वहां रखी पुस्तकें ६ महीने तक जलती रही थीं. वहां १०००० से अधिक देशी विदेशी छात्र शिक्षा लेते थे जिन्हें प्रारंभिक प्रवेश परीक्षा में द्वारपाल के प्रश्नों का जवाब देना पड़ता था. आँखें वहां आये पर्यटकों में व्हेनसांग और फाहियान को ढूँढने लगीं.

स्थानीय साथियों ने बताया की सुनसान रास्ता है और ज्यादा देर करना ठीक नहीं. इस तरह समय के अभाव में हम वापस लौट आये.

गूगल और अपने मोबाइल की मदद से ली गयी तस्वीरें लगा रहा हूँ दोस्त डिजिटल कैमरे से ली गयी तस्वीरें जैसे ही मेल करेगा ढेर सारी आप की नजर करूँगा ..... --

क्या दे दना दन को स्त्री विरोधी फिल्म मानना चाहिए




दे दना दन में प्रियदर्शन का हालिया रूप निराश करता है.इस फिल्म में पटकथा के नाम पर है तो सिर्फ सितारों का जमघट, शालीन दिखते छोटे कपड़ों में नाचती गाती शो पीस नायिकाएं, घंटे भर लंबा क्लाइमेक्स और कनफ्यूजन का अंतहीन सिलसिला। इसके अलावा प्रियदर्शन की अन्य फिल्मों की तरह यह भी स्त्री चरित्रों को आब्जेक्ट की तरह पेश करती है इस बार कुछ ज्यादा फूहड़ तरीके से।
फिल्म की शुरुआत में अक्षय कुमार और उनकी मालकिन के कुत्ते के बीच के दृश्य रोचक संभावना पैदा करते हैं लेकिन जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है निर्देशक की पकड़ उस पर से ढीली होती जाती है। एक अच्छी संभावनाओं भरी फिल्म का अंत पानी के सैलाब के साथ होता है जिसमें सब कुछ बह जाता है,प्रियदर्शन का निर्देशन, आपका पैसा और समय भी।

थोड़ी बात कहानी पर नितिन और राम दो दोस्त हैं जो सिंगापुर में रहते हैं। हालाँकि उनकी दोस्ती गंभीर है लेकिन इतने सारे कमीने पात्रों के बीच उसे और स्थापित किया जाना चाहिए था. नितिन जहां अपनी पढ़ाई के लिए पिता द्वारा लिए गए कर्ज को चुकता करने के लिए एक दुष्ट अमीर महिला अर्चना पूरण सिंह के यहां नौकर कम ड्राइवर का काम करता है वहीं अपनी मां और बहन के गहने बेचकर भारत से करियर बनाने आया राम कूरियर बॉय के रूप में काम करता है।
दोनों की एक एक अमीर प्रेमिका है जिसके पैसे से उनका खर्च चलता है। अपनी शादी के लिए अमीर बनने की खातिर दोनों ना चाहते हुए अपहरण, लाश और फिरौती के भ्रामक खेल में उलझ जाते हैं। खूबसूरत कैटरीना के हिस्से मासूमियत से मुस्कराने के सिवा कुछ नहीं आया है। शायद इसके अलावा वे कुछ कर भी नहीं सकतीं। समीरा रेड्डी की बात समझ में आती है लेकिन कैटरीना करियर के इतने धांसू दिनांे में ऐसी भूमिकाएं क्यों कर रही हैं। नेहा धूपिया ने पांच मिनट के छोटे से रोल में रंग जमा दिया है। राजपाल और अदिति गोवित्रीकर और चंकी पाण्डेय ने अच्छा अभिनय किया है. टीनू आनंद, शक्ति कपूर, असरानी, भारती का माल हैं. परेश रावल इन दिनों हर हास्य फिल्म में एक सा अभिनय करते हैं. फ़िल्म में संगीत ना ही होता तो बेहतर था।

फिल्म क्या कहना चाहती है- दे दना दन का नाम दे धना धन होना चाहिए था क्योंकि इसका लगभग हर पात्र पैसे के पीछे है. यह फिल्म महिलाओं को हाशिये पर रखती है और उन्हें बहुत बुरी तरह पेश करती है. महिलाओं के साथ मारपीट गाली गलौज के उन्हें बेवकूफ दिखाया गया है. अदिति गोवित्रिकर को लम्पट दिखाना भी इसी कड़ी का हिस्सा है.
प्रियदर्शन को यह सोचना चाहिए की हेरा फेरी से दे दना दन तक के सफ़र में उन्होंने क्या पाया और क्या खोया...

अगर आप ने फ़िल्म देखी है तो यह जरूर बताएं की क्या इसे वाकई स्त्री विरोधी फ़िल्म मानना चाहिए?

फिल्म के नाम पर कूड़ा है कुर्बान


कल मैं शिव सैनिकों और सैफ करीना के आन्स्क्रीन इश्क की वजह से चर्चित फिल्म कुर्बान देखने गया था। एकदम कूड़ा फिल्म निकली। बोलीवुड की यह फिल्म कहने को तो आतंकवादियों का पक्ष पेश करने की कोशिश करती है लेकिन यह एक तरह से आतंकवाद को स्थापित करती है।

कुर्बान इस्लामिक आतंकवाद पर बने किसी वीडियो गेम की तरह है। जहां पहचान छिपा कर प्रोफेसर बना नायक (खलनायक?) सैफ अमेरिका में रह रही भारतीय लड़की करीना से शादी करता है ताकि वह उसके साथ अमेरिका जा सके। वहां वह अपने साथियों के साथ आतंकी हमलों की योजना बनाता है। उसकी पत्नी को जब उसकी असलियत पता चलती है तो वह एक सच्चे मुसलमान (जैसा कि होना चाहिए) विवके ओबेराय की मदद से हमलों को नाकाम करने की कोशिश करती है और कुछ हद तक सफल भी। नायक यानि सैफ अंत में आत्महत्या कर लेता है।

फिल्म की टैग लाइन है कुछ प्रेम कथाओं पर खून होता है। लेकिन इस फिल्म में तो प्रेम है ही नहीं। है तो सिर्फ नफरत, इस्लाम की फुरसतिया अंदाज में की गई व्याख्या, करीना के चेहरे पर स्थायी दहशत और मसखरा लगता हुआ आतंकवादी सैफ।

पूरी फिल्म में करीना कहीं भी मनोविज्ञान की प्रोफेसर नहीं लगती। पहले हाफ में हर संभव मौके पर सैफ करीना के चुंबन दृश्य और दूसरे हाफ में अतिरिक्त लंबा बिस्तर का सीन समझ से परे है।

फिल्म का इकलौता मार्मिक सीन वह है जहां मरते हुए सैफ से करीना उसका असली नाम पूछती है। एक व्यक्ति जिससे आपने प्यार किया, शादी की और जीवन की खुशियाँ बांटी लेकिन आपको अंत में पता चलता है कि वह आपसे पहचान छिपाकर आपके साथ रहता था। और आप तो उसका असली नाम भी नही जानते इस पीड़ा को करीना ने बेहतर अभिव्यक्ति दी है। बीच बीच में आतंकियों के मुंह से अमेरिका विरोधी वाक्यों का तड़का डाल कर उन्हें जस्टीफाई करने की जो कोशिश निर्देशक ने की है। उन दृश्यों और संवादों में थोड़ी और गहराई की जरूरत थी। विवेक ने अच्छा अभिनय किया है।

कुर्बान दरअसल न्यूयार्क और फना की मिक्सिंग है। लेकिन यह निराष करती है। सैफ करीना की बात समझ में आती है लेकिन ओम पुरी और किरण खेर जैसे समर्थ कलाकार ऐसी घटिया फिल्मों मंे काम क्यों करते हैं यह बात समझ से परे है। उन्हें किसी तरह का दायित्व बोध नहीं होता है क्या!

सलाह- जो लोग वास्तव में आतंकवाद पर फिल्म बनाना चाहते हैं उन्हें एक बार खुदा के लिए देख लेनी चाहिए।

क्रिकेट को कविता बना दिया सचिन ने...


वह सन 1989-90 के जाड़ों के दिन थे जब सियालकोट में पाकिस्तान के साथ श्रृंखला के अंतिम टेस्ट मैच में एक खतरनाक बाउंसर सीधी एक 16 साल के किशोर की नाक पर जाकर लगी थी। नाक से खून की एक धारा निकली। मैच देख रहे जाने कितने लोगो के दिल से आह निकली और व्याकुल माओं की छाती में दूध उतर आया। लेकिन वो लड़का जिद्दी था उसने मैदान नहीं छोड़ा और उस समय दुनिया के सबसे तेज माने जाने वाले पाकिस्तानी पेस अटैक का सामना करने की ठानी। वह अटैक जिसमें वकार, वसीम और इमरान खान खूंखार गोलंदाज शामिल थे.उसके बाद जो हुआ वो इतिहास का हिस्सा बन चुका है।

उस सिरीज ने क्रिकेट को एक नया नक्षत्र दिया- सचिन तेंदुलकर। वही सचिन जिसने हाल ही मे इंटरनेशनल क्रिकेट में 20 वर्ष पूरे किए हैं और रिकार्ड बुक्स उसके नाम से अटी पड़ी हैं। उसी सिरीज में खेले गए एक प्रदर्षनी मैच में सचिन ने पहली बार अपनी प्रतिभा की झलक दिखाई जब उन्होंने युवा पाकिस्तानी लेग स्पिनर मुश्ताक अहमद को एक ओवर में दो छक्के जड़े। इस पर तिलमिलाए मुश्ताक के गुरू और पाक के स्पिन लीजेंड अब्दुल कादिर ने सचिन को चुनौती ही दे डाली, ‘बच्चों को क्या मारते हो, मुझे मारो।’ सचिन खामोश रहे जैसे कि वे अब भी रहते हैं। सिर्फ उनका बल्ला बोला और उस ओवर का स्कोर रहा- 6,0,4,6,6,6,। उन्होंने महज 16 गेंदों पर अपना अर्ध शतक पूरा किया।

सचिन ने अगले साल इंग्लैंड में खेलते हुए टेस्ट क्रिकेट का पहला शतक तो जड़ दिया लेकिन वन डे में पहले शतक के लिए उन्हें अगले पांच सालों तक इंतजार करना पड़ा। शायद युवा सचिन के स्वभाव की हड़बड़ी और एक दिवसीय क्रिकेट का गतिशील रोमांच उन्हें विकेट पर टिकने नहीं दे रहा था। सचिन अनेक पारियो में ५० रन के बाद कैजुअल तरीके से खेलकर अपना विकेट गंवा बैठे।

सचिन को लता बहुत पसंद हैं। वे उन्हें आई (मां) बुलाते हैं और अपने हर दौरे पर उनके गीत सुनते हुए जाते हैं। लता स्वर कोकिला हैं और सचिन बल्लेबाजी का महाकवि। सचिन को बल्लेबाजी करते हुए देखकर लगता है कि मोजार्ट समेत दुनिया के तमाम बड़े संगीतकार इसी तरह अपने गीतों को आकार देते होंगे जितने करीने से सचिन स्ट्रोक लगाते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 20 सालों से जमे सचिन ने कई झंझावात झेले। मैच फिक्सिंग का काला साया उनके ही दौर में क्रिकेट पर पड़ा, टीम इंडिया को विष्व कप के पहले ही दौर में बाहर होना पड़ा। लेकिन सचिन के स्वभाव की गंभीरता ने हर चीज को बहुत सहजता से लिया। मुंबई के मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए सचिन का माथा सफलता से नहीं फिरा। उन्होंने जाना कि ये सारी उपलब्धियां उनके पास इसलिए हैं क्योंकि क्रिकेट उनका जुनून बना हुआ है।

पांच फीट चार इंच के उस नाटे उस्ताद के कंधे एक अरब से ज्यादा की आबादी का बोझ दो दशकों से उठाए हुए हैं लेकिन वे आज तक झुके नहीं बल्कि उन्होंने ऐसे अनगिनत मौके दिए जब देशवासियों का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

उन्होंने आंखें उठाकर दुनिया को देखा मानो कह रहे हों देखो ये हमारा सचिन है-

मैदान पर शेर सा दहाड़ता सचिन

चीते सा चपल सचिन

बिल्कुल पड़ोस के लड़के जैसा सहज सचिन

बल्ले से कविताएं लिखता सचिन

गेंद से उम्मीदों पर खरा उतरता सचिन

सचिन जब बल्ला लेकर मैदान पर उतरते हैं तो वो मध्यकालीन रोमन ग्लेडिएटर की तरह दिखते हैं। उनके चेहरे की प्रतिबद्धता किसी भी गेंदबाज का हाड़ कंपा देने के लिए काफी होती है। जाने अनजाने कितने ही गेंदबाजों के करियर का सूर्य उनकी तूफानी बल्लेबाजी की छांव में अस्त हो चुका है।

सचिन की बल्लेबाजी में समय को थाम लेने की ताकत है। यकीन न हो तो उस समय आप शहर में निकलकर देखिए जब सचिन बल्लेबाजी कर रहे हों और शतक के आसपास हों। आपको पूरा शहर ठहरा हुआ मिलेगा।

हालांकि कि सचिन क्रिकेट के सबसे विवादित युग में एक खिलाड़ी के रूप में परिपक्व हुए लेकिन विवादों से उनका नाता दूर दूर तक नहीं रहा। जाने कितने ऐसे मौके आए जब लोगों ने सचिन का करियर खत्म होने की घोशणा ही कर डाली लेकिन सचिन ने कुछ नहीं कहा और हमेशा की तरह अपने बल्ले से जवाब दिया। सचिन ने आज अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम पर श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट क्रिकेट में अपना 43वां सैकड़ा जड़ा है। आलोचकों ने कलम घिसनी शुरू कर दी है की यह पारी एक मुर्दा पिच पर बेजान गेंदबाजों के सामने खेली गयी है...

सचिन अभी और खेलें और हमें आनंदित करें यही कामना है और क्या...

धर्म को लेकर अपराधबोध क्यूं



-अजीत कुमार

प्रभाष जी किस तरफ के हैं। यह मेरे लिखने का उद्देश्य कभी नहीं रहा है। आखिर किन्हीं दो व्यक्तित्वों के बीच क्या कभी सीधी रेखा खींची जा सकती है। मेरे हिसाब से तो खीचने की कोशिश भी नहीं होनी चाहिए। मुझे तो प्रभाष जी को याद करते हुए वो सभी जन याद आ रहे हैं। जिन्होंने समय के सापेक्ष लोक मंगल को अपने जीवन का ध्येय बनाया। चाहे वो राजनीतिज्ञ, पत्रकार या कला व संस्कृति से सबंद्व कोई हस्ताक्षर रहे हों।


इतना ही नही विशिष्ट के खांचे में नहीं समोने वाले वे आम जन जो न तो इतिहास और साहित्य में कहीं दर्ज हैं को भी प्रभाष जी के संदर्भ में याद कर रहा हूँ । रही बात किस तरफ की तो आप जानते ही होगे कि घसीटू तरफदारी और जड वैचारिक आस्था से साहित्य के साथ -साथ समाज का आज तक कितना भला हुआ है। जहां तक रही प्रभाष जी के बहाने तुलसी को याद करने की बात तो इसका एकमात्र आधार सिर्फ और सिर्फ लोकमंगल को लेकर दोनों की अपनी अपनी अप्रतिम और विलक्षण प्रतिबद्वता में निहित है। लेकिन इन दोनों में यह प्रतिबद्वता कभी भी जडता की शिकार नहीं हुई।


लेकिन आज अपनी परंपरा, और आस्था को लेकर आज जिस तरह का निगेशन यानी नकार देखने को मिल रहा है। उसकी पडताल प्रभाष जोशी और तुलसी के संदर्भ में ही अच्छी तरह से ली जा सकती है। इतना ही नहीं स्वतंत्र भारत में एक खास विचार धारा वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्टता के नाम पर किस तरह से परंपरा और आस्था को खारिज करने में लगी है, दकियानूस करार देने में लगी है कि पोल भी खोली जा सकती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने दिनों बाद भी अगर देश में सांप्रदायिक राजनीति की नकेल नहीं कसी जा सकी है। तो इसका एकमात्र कारण भी एक तरह से रूमानी नकार में ही है।


वे लोग जो वैज्ञानिकता के नाम पर तमाम आध्यात्मिक और धार्मिक मूल्यों को एक सिरे से नकारने में लगे हैं, कब समझेंगे कि नकार के सहारे समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं की जा सकती। प्रभाष जी और गांधी के व्यक्तिगत जिंदगी में धार्मिक या परंपरावादी होने को लेकर तथाकथित प्रगतिशीलों की पाखंडी भौंहें क्यूं तनने का नाटक रचाती है। ये उपहास उडाते हैं प्रभाष जी की जिंदगी में विरोधाभास को लेकर। जबकि मैं नहीं मानता कि उन सबों की जिंदगी में आस्था और वैज्ञानिकता को लेकर कोई विरोधाभास नहीं होगा। बशर्ते वे समाज के साथ साथ अपने आप को भी समझने की प्रक्रिया में रहे हों।


वैसे भी अपन को विरोधाभास से कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत तो इस बात में है कि ये तथाकथित प्रगितिशील अपने विरोधाभासों को लगातार नकारने में लगे हुए हैं। काश ये भी प्रभाष जी और गांधी की तरह अपने विरोधाभासों को स्वीकार कर लिए होते। मेरे हिसाब से इंसान जितना ही ज्यादा अपने आप को समझने की कोशिश करता है । विरोधाभासों और उलझनों की परिधि में और वह अपने आप को और ज्यादा उलझता हुआ पाता है। लेकिन बिना अपने को समझने की प्रक्रिया में शामिल किए क्या विरोधाभास, उहापोह और आशंका।लेकिन इन स्थितियों में आप आसानी से रच सकते हैं नाटक अपनी वैज्ञानिक सोच की मसीहाई का।


आज नकार की जगह सबसे बडी जरूरत है आत्म स्वीकृति की। क्योंकि आत्मस्वीकृति के बाद ही इंसान अपने आप को ज्यादा से ज्यादा मानवीय और नैतिक बनाने की प्रक्रिया में निरत करता है। लेकिन परंपरा और धार्मिक आस्था को लेकर कोई जरूरत नहीं है अपराधबोध की। अगर कोई ब्राहमण जाति में पैदा हुआ है और अपनी परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं को लेकर उसमें नकार नहीं है। तो इसमें मैंे कोई गुनाह नहीं मानता। लेकिन अगर परंपरा न्याय और नैतिकता की अवहेलना करे तो जरूर उसे पहचानकर उससे निवृत्त हो लिया जाए। जो लोग नास्तिक होने की दुहाई देते फिरते हैं, उनको मैं बता दूं कि इंसान को मानवीय और नैतिक बनाने की सबसे बडी शक्ति धर्म में ही निहित है। वहीं एक नास्तिक व्यक्ति के लिए तो नैतिकता और मानवीयता का कोई मूल्य ही नहीं। तभी तो ये नास्तिक हमेशा धर्म को राजनीतिक फायदों के लिए भुनाते आए हैं।


ज्यादा पीछे नहीं लौटें तो गौर फर्मा लें विभाजन की त्रासदी पर। गांधी आस्तिक थे लेकिन जिन्ना नास्तिक। लेकिन आखिर एक नास्तिक ने क्या किया। धर्म के नाम पर करेाडों लोंगों की जिंदगी को देखते ही देखते तबाह कर दी। लोगों के अवचेतन में कभी न भरने वाले नासूर जख्म दिए। वहीं एक रामनामी हिंदू नोआखाली और बिहार में जान की बाजी लगाकर खाक छान रहा था दिलों को जोडने की कोशिश में। आखिर उसके धर्म ने उसे इतना मजबूत और नैतिक तो बना दिया था------- ।

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आप को

कल रात एक मित्र से फूलन देवी और उनपर बनी फ़िल्म पर चर्चा होती रही और संयोग से उसके बाद ही कविता कोष पर अदम गोंडवी की इस रचना पर नजर गयी, आप भी पढ़ें - संदीप

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर

मर गई फुलिया बिचारी थी कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छतपताई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से- बहन, सो जा मेरे से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वो इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी पर
देखिये सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सूअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिये ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फ़िर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने -अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी´
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना
गया क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
`जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने´
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोल कर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से गया
सुन पड़ा फिर `माल वो चोरी का तूने क्या किया´
`कैसी चोरी माल कैसा´ उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर
-`मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक dओ
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो´
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुंहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे´

´ कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं ´
´यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फ़िर दहाड़े "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा
"इक सिपाही ने कहा "साइकिल किधर को मोड़ दे
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल`
कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल´
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रान्त के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !

अबू आजमी को हीरो मत बनाओ

आज प्रभाष जी नहीं हैं, न कागद कारे जैसा स्तंभ है। उनके रहते हुए लगा ही नहीं कि लिखूं , क्योंकि उन्हें पढकर लगता था मेरी सारी बातें उन्होंने लिख दी हैं. आज उनके नहीं होने के बाद अपने अंदर की बात कहीं पढने को नहीं है सो खुद ही लिखने को मजबूर हूं।
-अजीत कुमार

महाराष्ट विधानसभा में जो भी हुआ उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम होगी। लेकिन भर्त्सना को लेकर हिंदी पत्रों और चैनलों में जिस तरह की गैर जबावदेह और अपरिपक्व तत्परता देखी गई। वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए किसी भी सूरत से विवेक सम्मत नहीं है। कुछेक अखबारों और चैनलों को छोड दिया जाए तो ज्यादातर अखबार और समाचार चैनल अबू आजमी को ऐसे पेश करते दिखे मानोे वह हिंदी और हिंदी पट्टी के मान सम्मान का रखवाला हो। जहां तक महाराष्ट नवनिर्माण सेना और राज ठाकरे की बात है, इन सबों पर हिंदी अखबारों और चैनलों ने इतना कुछ लिख और बोल दिया है कि अब कुछ बचा भी नहीं है।

आखिर गाली देने की भी सीमा होती है। और गाली देना वैसे भी अपनी आदत में नहीं रही है। मुझसे पूछा जाए तो गाली के लिए पत्रकारिता क्या कहीं भी कोई जगह नहींे होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से राज ठाकरे को लेकर हिंदी पत्रों का रवैया गरियाने तक ही सीमित रहा है। एक बात मैं पूछता हूं कि क्या अबू आजमी हिंदी के मान सम्मान के संरक्षक हो सकते हैं। क्या प्रेमचंद और निर्मल वर्मा की हिंदी इतनी गरीब है कि वह इन छिटपुट वाकयातों को लेकर अपमानित हो जाएगी।

मेरे साथियों ,आम जनों की अपेक्षा पत्रकारों से ज्यादा विवेक और जबावदेही की अपेक्षा की जाती है लेकिन अबू आजमी के साथ हिंदी की इज्जत को जोडना कौन सी जिम्मेदारी है। आखिर अबू आजमी का हिंदी का मान सम्मान बढाने में क्या योगदान रहा है। कौन नहीं जानता कि विघटनकारी राजनीति की बिना पर ही आज वे विधानसभा तक पहुंचने में सफल रहे हैं। अब आप ही बताओ कि एमएनएस की विघटनकारी राजनीति की बखिया उधेडने के लिए क्या अबू आजमी को हीरो बनाना जरूरी है। मैं यह कभी मान नही सकता कि अनैतिकता का मुकाबला अनैतिकता से किया सकता है। अनैतिक का मुकाबला नैतिक बनकर ही किया जा सकता है।

मीडिया की जिम्मेदारी तो यह होनी चाहिए थी कि बजाय अबू आजमी को हिंदी के मसीहा के तौर पर प्रस्तुत करने के वह महाराष्ट निव निर्माण सेना, राज ठाकरे और शिवसेना की विघटनकारी राजनीति का विरोध करने के नाम पर वे तमाम राजनेता जो उत्तर भारतीयों के वोट को हथियाने के लिए राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं, भाषा, क्षेत्र, जाति और धर्म की कुत्सित राजनीति कर रहे हैं, को ये एक साथ बेनकाब करते। स्वार्थ और अवसरवादिता की रोटियां सेंकने वाले ये राजनेता कभी नहीं चाहेंगे कि शिवसेना और एमएनएस की घटिया राजनीति कभी बंद हो आखिर इन्हें भी तो अपनी दुकान उन्हीं के सहारे चलानी है। लेकिन इन अनैतिक राजनीतिक कृत्यों और उनको लेकर मीडिया की गैर जबाबदेही का अंजाम क्या होगा। क्या आपने सोचा है। हिंदी मीडिया ने एमएनएस और शिवसेना के विरोध का परचम जिन हाथों में दे दिया है। उसे लेकर आप ही बताओ आम मराठी मानुष आखिर क्या सोचता होगा। क्या अबू आजमी के बारे में भी लोंगों को विशेष बताने की जरूरत है।

आखिर हिंदी मीडिया की इन हरकतों से देश का संघीय ढांचा ही कमजोर होगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से देश के उत्तर पूर्व और कश्मीर, में जो हालात है। वह इसी गैर जबावदेह राजनीति और पत्रकारिता का नतीजा है। जहां जाति, धर्म, क्षेत्र और समुदाय विशेष की परिधि से आज तक भारतीय मीडिया पूरी तरह से नहीं निकल पायी है। वहीं खबरों को एक्सक्लूसिव बनाकर परोसने की आपाधापी ने पत्रकारिक मूल्यों का पूरी तरह से गला घोंट दिया है। ज्यादा निराशा तो तब होती है जब हम पाते हैं कि आज के हिंदी पत्रकारों को पत्रकारिक मुूल्यों से कुछ लेना देना ही नहीं है। लेकिन वे महानुभाव जो पिछले 20-30 सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं, क्यूं भीष्म पितामह की तरह द्रौपदी का चीरहरण चुपचाप देखते को विवश हैं। आप ही सोचो क्या पत्रकारिक मूल्यों से विरत होकर देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता को अक्षुण्ण रखने की बात की जा सकती है। क्या दुनिया भर में अपनी विविधता और बहुलता की दुहाई दी जा सकती है। अलगाव की राजनीति को हतोत्साहित किया जा सकता है।

एक बात और जो मीडिया राज, एमएनएस और शिवसेना को गरियाने से बाज नहीं आ रही है, उसे इन सबों के लिए कांग्रेस को कटघरे में खडा करने की जरूरत कभी शिद्दत से महसूस तक नहीं हुई। भले कभी कभार थोडी रस्म अदायगी कर दी गई हो। सिर्फ और सिर्फ चुनावो में मिली कुछेक सफलताओं के आधार पर कांगे्रस, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के गुणगान से मीडिया को आखिर फुर्सत ही कहां है। किसे नहीं पता कि एमएनएस की घटिया राजनीति का फायदा सबसे ज्यादा किस पार्टी को मिला है। वास्तव में कांगे्रेस अगर एमएनएस और राज की हरकतों पर लगाम लगाने के प्रति गंभीर होती तो मैं कोइ कारण नहीं मानता कि ये लोग आज यहां तक पहुंचे होते। सच में देश के संघीय ढांचे को बर्बाद करने वाली इस तरह की राजनीति के लिए सिर्फ कांग्रेस जिम्मेदार है। अतीत में भी पंजाब, कश्मीर और उत्तर पूर्व में कांग्रेस ने कुछ ऐसा ही किया है।