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चला गया सुरों का सारथी

जब जब हिंदी सिनेमा में पाश्र्व गायिकी को नई पहचान देने वाले गायकों की बात की जाएगी। मन्ना डे का नाम सबसे ऊपर होगा।


पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई..., तू प्यार का सागर है..., लागा चुनरी में दाग..., एक चतुर नार, ऐ मेरी जोहरा जबीं...ए मेरे प्यारे वतन...सुर न सजे क्या गाऊं मैं...ये कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें सुनने के बाद लगता है कि हां, इन्हें मन्ना डे के सिवा कोई और नहीं गा सकता था। हिंदी समेत विभिन्न भारतीय भाषाओं में ऐसे हजारों मधुर गीतों को स्वर देने वाले महान गायक मन्ना डे का गुरुवार तड़के बेंगलूर में निधन हो गया। वह 94 वर्ष के थे।
कोलकाता के पारंपरिक बंगाली परिवार में प्रबोध चंद्र डे के रूप में जन्मे मन्ना डे का संगीत की दुनिया से परिचय कराया उनके चाचा संगीताचार्य कृष्ण चंद्र डे ने। उनके साथ ही मन्ना डे 1942 में मुंबई आ गए। उन्होंने 1942 में फिल्म तमन्ना के लिए मशहूर गायिक सुरैया के साथ युगल गीत गया- 'जागो आई उषा, पंछी बोले जागो।Ó
इसके साथ ही हिंदी सिने जगत के साथ उनके तकरीबन आधी सदी लंबे सफर की शुरुआत हुई। सन 1942 से 50 तक कुछ धार्मिक फिल्मों समेत मन्ना डे ने कई गीत गाए लेकिन उनकी प्रतिभा निखरकर सामने आई सन 1950 में आई फिल्म मशाल में गाए गीत 'ऊपर गगन विशालÓ से। इस गीत को संगीत से सजाया था महान संगीतकार सचिन देव बर्मन ने। हालांकि यह सफर इतना आसान भी न था। मन्ना डे के जबरदस्त रियाज और शास्त्रीय शैली की गायिकी ने फिल्मी दुनिया में धारणा बना दी थी कि वे राग आधारित गीतों के लिए ही उपयुक्त हैं।
फिल्म बसंत बहार के गीत 'केतकी गुलाब जूहीÓ में उन्हें देश के आलातरीन शास्त्रीय गायकों में से एक पंडित भीमसेन जोशी से एक किस्म का मुकाबला ही करना पड़ा। अपने सामने पंडित भीमसेन जोशी को देखकर पहले मन्ना डे ने उसे गाने से ही इनकार कर दिया था। हालांकि बाद में बहुत समझाइश के बाद वह गाने के लिए तैयार हुए और उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। वह गाना हिंदी सिने जगत के सबसे बेजोड़ गीतों में शामिल है। उन्होंने भाषायी बंधन तोड़ते हुए हिंदी के अलावा बांग्ला, गुजराती , मराठी, मलयालम, कन्नड और असमी मेंं 3500 से अधिक गीत गए।
उन्होंने हरिवंश राय बच्चन के मशहूर काव्य मधुशाला को भी आवाज दी जो अत्यंत लोकप्रिय हुआ। संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने मन्ना डे की बहुमुखी प्रतिभा को जल्द ही पहचान लिया और उस दौर में जब मुकेश को राजकपूर की आवाज माना जाता था, मन्ना डे ने शोमैन को कई फिल्मों में अपना स्वर दिया। इन फिल्मों में गाया उनमें आवारा, श्री 420, चोरी-चोरी और मेरा नाम जोकर प्रमुख हैं।
मन्ना डे ने यह स्वीकार भी किया था कि संगीतकार शंकर वह पहले शख्स थे जिन्होंने उनकी आवाज की रेंज को पहचाना और उनसे रूमानियत भरे गीत गवाए। इसका नतीजा 'दिल का हाल सुने दिलवालाÓ, प्यार हुआ इकरार हुआ, आजा सनम, ये रात भीगी भीगी, ऐ भाई जरा देख के चलो , कसमे वादे  प्यार वफा और यारी है ईमान मेरा Ó जैसे गीत हमें मिले।
यह संयोग ही है कि मन्ना डे ने हिंदी सिनेमा में अपना आखिरी गीत  1991 में आई फिल्म 'प्रहारÓ में गाया। गीत के बोल थे-'हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा..।Ó यही वह वर्ष था जब देश में उदारीकरण की शुरुआत हुई और उसके साथ ही शोरगुल ने तेजी से संगीत का स्थान लेना शुरू कर दिया। ऐसे में मन्ना डे जैसे संजीदा और नजाकत वाले गायक का हाशिये पर जाना तय था।
मन्ना डे ने न केवल अपनी गायिकी के लिए सर्वश्रेष्ठï गायक का राष्टï्रीय पुरस्कार हासिल किया बल्कि उन्हें फिल्म जगत में उनके योगदान के लिए पद्मश्री, पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के सम्मान से भी नवाजा गया। उन्होंने वर्ष 1953 में केरल की रहने वाली सुलोचना कुमारन से विवाह किया था। मन्ना डे अपनी पत्नी के बेहद करीब थे और जनवरी 2012 में उनकी मृत्यु हो जाने के बाद से वह नितांत एकाकी जीवन जी रहे थे। मन्ना डे भले ही हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनके गाए मधुर गीत उन्हें हमारी स्मृतियों में हमेशा रखेंगे। मुहावरों को अगर केवल मुहावरा न माना जाए और उनका सचमुच कोई अर्थ होता है तो यह कहने में कुछ भी गलत नहीं कि मन्ना डे का जाना दरअसल सिने संगीत के एक युग का अंत है।
पहलवान से गायक बनने का सफर

कॉलेज के दिनों में राज्य स्तरीय उदीयमान पहलवान प्रबोध चंद्र डे भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनना चाहते थे लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था... और वे देश के सर्वश्रेष्ठ गायक बने।  मन्ना डे ने विद्यासागर कॉलेज में पढ़ाई करते हुए गोबोर बाबू से कुश्ती का प्रशिक्षण प्राप्त किया और अखिल बंगाल कुश्ती प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंचे।
डे ने अपनी आत्मकथा 'मेमोरिज कम एलाइवÓ में लिखा, 'उस समय मेरी एक ही आंकाक्षा थी फाइनल में जीत दर्ज करना और भारत का सर्वश्रेष्ठ पहलवान बनना। पूरे बचपन और किशोरावस्था में संगीत से कन्नी काटने के बाद मेरी इच्छा कुश्ती में चैम्पियन पहलवान बनने की थी। लेकिन युवावस्था में प्रवेश करने और वयस्क बनने के साथ संगीत मेरे जीवन और आत्मा पर छा गया।Ó
आंखों की रोशनी कम होने के साथ कुश्ती के क्षेत्र में आगे बढऩे की उनकी आकांक्षा प्रभावित हुई। जब उन्होंने चश्मा पहन कर कुश्ती लडऩा चाहा तब कई दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ा।
ऐसे ही एक कुश्ती मैच में उनका चश्मा टूट गया और कांच का एक छोटा सा टुकड़ा आंख के नीचे धंस गया।  तभी वह कुश्ती से पीछे हट गए और खेल को छोड़ दिया। उन्हें एहसास हो गया था कि उनके लिए सही अर्थो में संगीत ही है।
डे ने कहा, 'यह ज्यादा लम्बा नहीं खींचा। मुझे खेल और संगीत में से एक को चुनना था। मैंने संगीत को चुना।Ó  उनके चाचा और संगीतकार कृष्ण चंद्र डे ने संगीत की शिक्षा और प्रशिक्षण देना शुरू किया और मन्ना डे नाम उन्हीं का दिया हुआ है। उन्होंने मन्ना डे को 1942 में फिल्म 'तमन्नाÓ से बॉलीवुड में प्रवेश दिलाया। मन्नाडे ने हिंदी, बांग्ला समेत कई भाषाओं में 3500 से अधिक गाने गाए। उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार, पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया।      

"मैं बेसब्री से सिनेमा के अंत की प्रतीक्षा कर रहा हूं"


जब मैं आलोचक था तब भी स्वयं को फिल्मकार मानता रहा।
आज मैं स्वयं को आलोचक मानता हूं , एक प्रकार से हूं भी,
बल्कि पहले से कहीं अधिक मुखर।
अब मैं समीक्षा लिखने के बजाय फिल्म बनाता हूं,
आलोचनात्मकता इसमें समा गई है।
मैं खुद को एक एसा निबंधकार मानता हूं,
जो उपन्यास शैली में निबंध लिखता है व निबंध शैली में उपन्यास।
लिखने की बजाय मैं उन्हें फिल्म देता हूं।
यदि कभी सिनेमा न रहा
तो मैं इस नियति को सहजता से स्वीकार कर लूंगा तथा
टेलीविजन की तरफ मुड़ जाउंगा।
यदि टेलीविजन न रहा तो मैं कागज-कलम थाम लूंगा।
अभिव्यक्ति के सभी रूपों में स्पष्ट निरंतरता है।
वे एक ही हैं।
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मैं बेसब्री से सिनेमा के अंत की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
ज्यां लुक गोदार
(गोदार आैर गोदार में)

मखमली आवाज का वो जादुई स्पर्श ।


संगीत की ताकत, उसके जादू के जिन किस्सों को हम बचपन से सुनते आए हैं। उनकी हकीकत से रूबरू होना हो तो तलत महमूद की मखमली आवाज से होकर गुजरना होगा। तलत साहब की आज 86वीं सालगिरह है।

1924 में लखनऊ के एक रवायती मुस्लिम परिवार में जन्में तलत महमूद को कुदरत ने रेशमी आवाज से नवाजा था। उनकी आवाज की अनोखी लरजिश ने उन्हें सिने – गजल गायिकी में एक अलग मुकाम दिलाया। मारिस म्यूजिक कालेज से संगीत की शिक्षा के दौरान महज 16 साल की उम्र में उन्हें आल इंडिया रेडियो पर गाने का मौका मिला। कहते हैं हीरे की परख जौहरी ही जानता है। 1941 में एचएमवी ने उनकी आवाज मे पहला एलबम निकाला सब दिन एक समान नहीं था। उनकी गजल तस्वीर ' तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी... ने उनकी पहचान हिंदुस्तान के कोने-कोने में फैला दी।

तलत की पारंपरिक नायक की सी धज ने उन्हें हीरो बनने को प्रेरित किया। वे सिनेमा में नायक के रूप में भाग्य आजमाने कोलकाता के रास्ते मुंबई जा पहुंचे। मशहूर फिल्मकार एआर कारदार ने उन्हें अपनी फिल्म दिल ए नादां में नायक चुना। उस फिल्म में तलत का गाया गीत- जिंदगी देने वाले सुन उनकी पहचान बन गया। बहुत जल्द उन्हें महसूस हो गया कि वे अभिनय के लिए नहीं बने हैं।

तलत की आवाज का मखमली कंपन उन्हें अपने समकालीन अन्य गायकों से अलग बनाता था लेकिन कुछ लोगों की नकारात्मक कमेंट से निराश तलत वैसी गायिकी से तौबा करने चले । बात पहुंची मशहूर संगीतकार अनिल बिस्वास तक। उन्होंने तलत को जमकर डांट लगाई। बिस्वास ने कहा कि आवाज की यही थिरकन उन्हें तलत महमूद बनाती है। वरना क्या गायकों की कमी है सिनेजगत में।

तलत साहब की गायिकी का अंदाजा लगाने के लिए एक एक्सरसाइज करते हैं। किसी भी लोकप्रिय फिल्मी गीत को याद करें। तत्काल दिमाग में गायक के साथ एक अभिनेता की छवि उभर आती है। अब तलत के गाए गीतों को याद करें। मैं दिल हूं इक अरमान भरा…, ए मेरे दिल कहीं और चल…जलते हैं जिसके लिए… शामे गम की कसम…हमसे आया न गया… ए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल…आदि गीतों की लंबी फेहरिस्त है जिन्हें सुनते हुए कोई चेहरा याद नहीं आता केवल तलत की रसीली आवाज कानों में घुलती है।

हालांकि तलत की आवाज की यही खूबी उनकी सीमा भी थी। गजलों के अलावा उन्हें हर तरह के गीत गाने को नहीं मिले। 60 के दशक में राक एंड रोल तथा ओर्केस्ट्रा ने तलत जैसे गायक को चलन से लगभग बाहर कर दिया लेकिन परदे के बाहर उनके चाहने वालों की कमी थोड़े ही थी। वे 1956 में सिंगिंगकंसर्ट में विदेशा जाने वाले पहले भारतीय गायक बने। सन 1991 तक उन्होंने अफ्रीका, अमेरिका, यूके, वेस्ट इंडीज के अनेक देशों में आवाज का जादू बिखेरा। अमेरिका में तो जो फ्रैंकलिन ने अपने मशहूर टीवी शों में उनका परिचय फ्रैंक सिनात्रा आफ इंडिया के रूप में कराया।

9 मई 1998 को दुनिया से रुखसत हुए तलत साहब की याद उनके लाखों प्रशंसकों के दिलों में आज भी जिंदा है और हमेशा रहेगी।


किसका जूता, किसका सर...


पहली बार नहीं हुआ है और हर बार नजरअंदाज किया गया हैं फर्क सिर्फ यह है कि इस मर्तबा ‘इस बार बार की गलती’ के साथ ऐसी शख्सियत का नाम जुड़ा है जिसे हम गुलजार के नाम से जानते हैं और जो हमारी नजरों में पाकीजा एहसास की तरह दर्ज रहा है। बिल्कुल उनके लिखे गीत की मानिंद हमने उन आंखों की महकती खुशबू देखी है हम उससे मुतासिर भी हुए र्हैं। बहरहाल इस दफा उस खुशबू में संदेह की परत चढ़ गई है। यह शक इतना पुख्ता जान पड़ता है कि उसने यकीन की शक्ल अख्तियार कर ली है। यकीन जो एक शख्सियत के लिए हमारी सिलसिलेवार मुहब्बत को छलनी कर रहा है।

अब आप लाख दिलासा दें कि आपके गुलजार यकीनन हिंदी सिनेमा के अकेले चश्मो-चिराग हैं जिसकी रोशनी में हमने अपने गमों की चादर को धोया है लेकिन आज वह रोशनी ध्ब्बे में तब्दील हो गई है। हमारे गमों से ज्यादा उस रोशनी का सच तकलीफदेह लग रहा है। भले ही बहस के दो दालान में बिछी चारपाई कुछ समय बाद दो पैरों पर खड़ी कर दी जाने वाली है मगर यह जिद्दी सवाल तो तब भी जस का तस रहेगा कि एक आलातरीन अदीब ऐसा कैसे कर सकता है।

अगर इलाहाबाद के कुछ जागरुक अदीबों ने यह मसला न उठाया होता तो साहित्य के ताबूत में एक कील और ठुक जाती। मार्क ट्वेन ने सच कहा है कि जब सच अपने जूते के तश्मे बांध रहा होता है तब तक झूठ के कदम कई मील दूर जाकर ठहर चुके होते हैं। लेकिन झूठ ने इस बार इब्नेबतूता के जूते पहने थे और जूते खुद अपना राज खोल गए।
इब्नेबतूता हैं... उनका जूता है... सर्वेश्वररदयाल सक्सेना हैं और गुलजार हैं। सबकुछ तो धुले आसमान की तरह साफ है। कविता का जो इंद्रधनुष साठ - सत्तर के दशक में रचा गया उसमें रंगों का हेरफेर करके आप मालिकाना हक कैसे जता सकते हैं। गुलजार ने तो सफाई देने की जहमत तक नहीं उठाई वह अपने कद्दावर बुत के भरोसे समूचे आसमान को निगलने की फिराक में थे।

गुलजार ने पहले भी गालिब का मतला उठाया था और तब गालिब तो इस कदर लाल-पीले नहीं हुए। जनाब! तब बाकायदा गुलजार ने इस उठाइगीरी की सूचना जाहिर की थी और कौन जाने उन्हें गालिब की लोकप्रियता का इल्म न होता तो शायद ऐसा न करते वे ।

सर्वेश्वरदयाल जैसे हिंदी के कवि के बारे में गलतफहमी उन्हें भारी पड़ गई। वह अरसा पहले लिखी इस कविता को शिनाख्त से कमतर मानकर चल रहे थे। यदि उन्होंन गीत के बाजार में आने के साथ ही मूल रचनाकार को याद कर लिया होता तो कोई बात ही नहीं थी। गुलजार इतने संजीदा शख्स हैं कि उनसे कोई सफाई देते भी नहीं बन रही। इस संजीदगी को रचना की आत्मा के साथ हेराफेरी के वक्त भी कायम रखा जाना चाहिए थे।

इब्नेबतूता आम नाम नहीं है। इस नाम में एक लय है एक ताल है। ग्लैमर की दुनिया इसकी कीमत देती है। गुलजार इसे अपनी आत्मा बेचकर हासिल करना चाहते थे। उन्होंने जो किया उसे आप साहित्यिक बाल टेंपरिंग कह सकते हैं.

(प्रभात किरण के इंदौर संस्करण के ६ फरवरी के सम्पादकीय पेज से साभार. लेखक - राहुल ब्रजमोहन )
नोट- मूल लेख को संपादित किया गया है.

एल्विस प्रेस्ली : द किंग ऑफ़ राक एंड रोल


बीसवीं सदी में विश्व संगीत को नयी दिशा देने वाले फनकारों की यदि कोई सूची बनाई जाये तो क्या वह एल्विस प्रेस्ली के जिक्र के बिना पूरी होगी. ८ जनवरी १९३५ को अमेरिका के निहायत गरीब परिवार में जन्मे एल्विस ने आधुनिक संगीत को देश-दुनिया की दीवारों से परे ले जाकर संस्कृति की एक नयी लहर पैदा की. राक एंड रोल संस्कृति.

अपनी मन के बेहद करीब रहे एल्विस का संगीत के प्रति रुझान पैदा हुआ रोजाना की चर्च यात्रा के दौरान. धीरे-धीरे यह सिलसिला चल निकला. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत गोस्पेल संगीत से ही की.

६० का दशक प्रेस्ली का स्वर्णकाल था. यह वह दौर था जब उनके गीत संगीत, फिल्मों और पेर्सोनालिटी का करिश्मा सारी दुनिया के सर चढ़ के बोल रहा था. आई वांट यू, आई नीद यू, आई लव यू, शे इस नोट यू, डोंट बे क्रुएल समेत एल्विस के अनेक गीतों ने धूम मचा कर रखा दी. १९७३ में एल्विस ने लास वेगास में सेटलाईट की मदद से एतिहासिक ग्लोबल लाइव कंसर्ट दिया जिसे दुनिया भर में १.५ अरब लोगों ने देखा.

इस बात पर कौन यकीन करेगा की संगीत के इस बादशाह के पास इस नाजुक विधा की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी. उन्होंने रेडियो और जुकेबोक्स पर संगीत सुन कर अपने अन्दर की काबिलियत को इतना मांजा की उनकी मौत के तीन दशक बाद भी दुनिया उनकी धुनों पर झूम रही है.
देश विदेश में युवाओं को स्टाइल आइकोन माने जाने वाले एल्विस के फैशन की नक़ल करते आज भी देखा जा सकता है.अभी तक पोपुलर म्यूजिक में कोई दूसरा गायक प्रेस्ली के आसपास भी नहीं फटक सका है.

द किंग ऑफ़ राक एंड रोल को उनके जन्मदिन पर दुनिया भर के करोडो संगीत प्रेमियों की याद

अधूरी तमन्नाओं का सफर है बाजार


दोस्तों लंबे अरसे बाद ब्लॉग की दुनिया में लौटा हूं। शहर दिल्ली से इंदौर पहुंचने के बाद ब्लॉगिंग की रफ्तार कुछ कारणों से रूक गई थी लेकिन अब फिर से वापस आ चुका हूं। इस बार पढ़िए पत्रिका- वसुधा के फिल्म विशेषांक में छपे मेरे लेख को।

शुक्रिया
संदीप

सागर सरहदी की सन 1982 में आई फिल्म ‘बाजार’ कई मायनों में अपनी समकालीन अथवा उन पूववर्ती फिल्मों से अलग है जो महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई हैं। पता नहीं वे कौन सी वजहें थीं जिनके चलते इस फिल्म को अलोचकों तक ने जानबूझकर हाशिए पर रखा, नतीजतन फिल्म के अच्छे या बुरे पहलुओं पर उस तरह से चर्चा नहीं हो पाई जिसकी यह हकदार है।



बाजार के पहले और बाद में बनी फिल्मों में महिला चरित्र एकदम स्टीरियोटाइप रहे हैं, उसपर मुस्लिम महिलाओं के चरित्र तो एकदम प्रिडेक्टिबल कहे जा सकते हैं। पुरुशों के वर्चस्व वाली फिल्मी दुनिया ने उन्हें अम्मी, आपा, खाला और बीवी या माशूका जैसे चार पांच किरदारों में कैद कर दिया। यकीनन बाजार भी कुछ मायनों में इनसे अलग नहीं रही लेकिन फिर भी बाजार के महिला किरदारों में एक अनोखी चारित्रिक मजबूती उभरकर सामने आती है।



फिल्म की कहानी भले ही हैदराबाद के पारंपरिक मुस्लिम परिवारों के इर्दगिर्द घूमती हो लेकिन वास्तव में बाजार तमाम भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समुदाय के घरों के अंदरूनी हालात का जायजा लेती हुई फिल्म है। इसने उन तल्ख हकीकतों को उजागर किया जिनका सामना इन घरों की महिलाओं को करना पड़ता है।



सिनेमा से काफी पहले साहित्य में राही मासूम रजा ने अपने चर्चित उपन्यास ‘आधा गांव’ में मुस्लिम परिवारों की दुविधा, उनकी उस मनोस्थिति को सामने लाया गया जिससे मुस्लिम समाज आजादी के दौर में गुजर रहा था।



मुख्य कहानी से इतर उपन्यास में अनेक कहानियां साथ-साथ चलती हैं जिनमें कई केंद्रीय पात्र ऊंचे खानदान से ताल्लुक रखतें हैं और उनका सारा जोर अपनी बेटियों की शादी में हड्डी की शुद्धता कायम रखने पर ही है चाहे भले ही उन घरों में परदे के पीछे नौकरों तक से संबंध कायम किए जाते हों।
स़़्त्री बाजारवाद अथवा उपभोक्तावाद के आगमन से सदियों पहले से उपभोग और बाजार में बेचे जाने वाली वस्तु की तरह व्यवहार में लाई गई है और इस बात को समझने के लिए किसी रिसर्च के अध्ययन की आवष्यकता नहीं।



बाजार के केंद्रीय चरित्रों में से एक नजमा (स्मिता पाटिल) को अपना घर छोड़कर निकलना पड़ता है क्योंकि उसकी मां नवाबी आन बान और शान को बरकरार रखने के लिए उसे जिस्मफरोशी करने को मजबूर कर रही है। उसकी मां के तर्क देखिए- ‘‘ हमारे खानदान में नौकरां रखते हैं बेटी नौकरी नहीं करते।’’



- ‘‘ मान जाओ बेटी किसी को कानों कान खबर नहीं होगी।’’
- ‘‘ इनों कोई काम भी तो नहीं करते नवाब हैं न इज्जत जाती है।’’
हालांकि उसके पास नजमा की इस बात का कोई जवाब नहीं है कि क्या ंिजस्म बेचने से इज्जत नहीं जाती़?



नजमा के शायर सलीम (नसीरुद्दीन शाह) के साथ एक तरह के प्लेटोनिक रिलेशन हैं लेकिन अपनी इज्जत का सौदा करने की बजाय वह एक अन्य शख्स अख्तर (भरत कपूर) के साथ निकल जाती है जो उससे शादी करने का अहद करता है।



फिल्म के एक दृष्य में अख्तर के कमरे में घुसते ही नजमा बिना देखे उसे अपने जिस्म का ग्राहक समझ कर चप्पल तान देती है। वह चप्पल दरअसल सिंबल है उसी प्रतिरोध और नफरत का जो किसी स्त्री के मन में अनचाहे पुरुश के प्रति हो सकती है।



यह और बात है कि तमाम दुश्वारियों का हवाला देकर वह नजमा के साथ शादी तो नहीं करता लेकिन शौहर-बीवी जैसे रिश्ते जरूर कायम करता है। एक जगह सलीम नजमा से कहता भी है- ‘‘ तुम इस बाजार में बिकने वाली शै हो। अपने जिस्म को दुकान के शो केस से बचाने के लिए तुमने अख्तर के घर की सजावट बनना पसंद किया। ’’



जिस समय बाजार रिलीज हुई यह वही समय था जब देश में एक महिला प्रधाानमंत्री का शासन था जिसे काफी पहले विपक्षी नेता तक ‘दुर्गा’ की उपाधि दे चुके थे। कमोबेश यही वह समय था जब समाचार पत्र समूह ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पत्रकार अश्विन सरीन ने ‘कमला’ नामक एक आदिवासी लड़की को खरीदकर यह बात दुनिया के सामने ला दी थी कि देश में अब भी स्त्री देह को खरीदने और बेचने का ध्ंाधा जोरों पर है।



इस एक घटना ने समूचे देश केा स्तब्ध कर दिया था। सुप्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर ने इस थीम पर कमला नामक एक चर्चित नाटक भी रचा था जिसमें उन्होंने दिखाया था कि किस तरह अपनी तरक्की को ध्यान में रखकर पत्रकार वर्ग मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रख चुका है।



कमला की देह पर चढ़कर सरीन ने भले ही तरक्की की सीढ़ियां चढ़ ली हों लेकिन कमला की सुध कितने लोगों को है? कमला को संभवतः न्यायालय के आदेष के बाद किसी नारी निकेतन भेज दिया गया और उसके बाद वह वहां से कहीं चली गई। इससे अधिक जानकारी उसके बारे में इससे अधिक जानकारी मैं भी नहीं जुटा पाया। तो यही हमारे समाज के तथाकथित स्त्री बोध और स्त्री चिंता की हकीकत है।



बााजार का कथानक भी कमसिन लड़कियों की बिक्री को ही केंद्र में रखकर बुना गया है।
फिल्म के दो अन्य केंद्रीय पात्र हैं शबनम (सुप्रिया पाठक) और सज्जो (फारुख शेख) जो कम उम्र होने के बावजूद एक दूसरे के साथ संजीदा मुहब्बत में मुब्तिला हैं।



जिस समय सज्जो और शबनम का प्यार परवान चढ़ रहा होता है उसी समय नजमा अख्तर के दबाव में आकर उसके आका ‘जाकिर’ के लिए दुल्हन तलाश करने वापस अपने घर हैदराबाद आती हैै। एक समारोह में जाकिर की नजर शबनम पर पड़ती है और वह उससे शादी कराने का दबाव नजमा के ऊपर डालता है।



जैसे ही लोगों को पता चलता है कि नजमा किसी बड़े आदमी के लिए दुल्हन की तलाश में आई है इलाके की तमाम इज्जतदार बीवियां अपनी अपनी बच्चियों के रिश्ते की बात करने उसके सामने हाजिर हो जाती हैं। नजमा के सामने एक तरह से कमसिन लड़कियों का बाजार ही सज जाता है।



गौर करने वाली बात है कि जाकिर उसी रवायत का नुमाइंदा बनकर सामने आता है जिसके लिए एक से अधिक औरतों का हरम तैयार करना स्टेटस सिंबल से अधिक कुछ नहीं है। यह वही सदियों पुरानी रस्म है जिसमें एक आदमी की अयाशी सामने वाले की त्रासदी बनकर उभरती है।



यह हकीकत है कि बुर्जुआ क्लास ने हरसंभव तरीके से महिलाओं का शोशण किया । फिल्म में जाकिर बुर्जुआ का ही प्रतिनिधि है जो औरत को हर हाल में केवल और केवल उपभोग की वस्तु समझता है और उसके सारे जतन अपनी इस पोजीशन को मजबूत बनाए रखने के लिए है। वहीं सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधि सज्जो तमाम प्रयासों के बावजूद अपनी मोहब्बत को हासिल नहीं कर पाता क्योंकि पराजय उसकी नियति है।



फिल्म के एक दृश्य में जब शबनम और सज्जो की आखिरी मुलाकात होती है तो सुप्रिया पाठक की कातर आवाज में बोला गया वह संवाद - ‘‘ हमने तुम्हें बरबाद कर डाला न सज्जो। ’’
इस पर सज्जो का जवाब - ‘‘ तुम मेरी जिंदगी को नए मानी दिए। नही ंतो क्या था इसमें’’
और फिर शबनम का ये कहना कि हम तुम अगर गरीब न होते तो हमें कोई भी जुदा नहीं कर सकता था। यह पूरा संवाद फिल्म की थीम को समझने के लिए पर्याप्त है।



पाॅपुलर हिंदी सिनेमा में जैसा कि मैंने ऊपर जिक्र किया है मुस्लिम किरदार या तो रहीम भाई, रहमान चाचा, अथवा अम्मी, आपा के रूप में दिखते हैं या फिर हाल के दिनों में वे टेररिस्ट बनकर सामने आते हैं।



अपने खुशनुमा पलों में इन किरदारों के हिस्से या तो लखनवी नफासत के साथ तहजीबी उर्दू बोलना आता है या फिर गजलों और मुजरों की महफिलें सजाना। अपने बुरे दौर में ये किरदार गोलियां दागते हैं।



हिंदी सिनेमा के मुस्लिम किरदार इन्हीं दो छोरों के दरमियान झूलते रहे हैं लेकिन बाजार ने इस परंपरा को तोड़ा। एक हद तक पारंपरिक होने के बावजूद इसके किरदारों की मजबूती देखने लायक है।
पहले आई तमाम हिंदी फिल्मों के मुस्लिम किरदार दरअसल अरेबियन नाइट्स के किरदारों का ही एक्सटेेंशन हैं हम उन्हें बड़ी आसानी से शीरीं- फरहाद, लैला मजनूं आदि से रिलेट कर सकते हैं उन फिल्मों में वास्तविक मुस्लिम कल्चर अथवा उसका सोशल कंटेक्स्ट नहीं खोजा जा सकता।



बाजार के विशुद्ध मेलोड्रामा होने के बावजूद उसमें रियलिज्म की झलक मिलती है। ठीक उसी तरह जैसे राजकपूर की प्रेेमरोग तमाम नाटकीयता के बावजूद हिंदू समाज की एक मूल समस्या विधवा विवाह की ओर लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब होती है।



बाजार की थीम में महिलांए हैं ये महिलांए गरीब और मुसलमान होने के कारण तिहरी मार झेलती हैं। गरीबी, लाचारी, बेरोजगारी, और झूठे पारिवारिक दंभ के बीच उनका औरत होना उनकी समस्याओं में कई गुना इजाफा कर देता है।



हालांकि बाजार के महिला किरदार चारित्रिक मजबूती का बेहतरीन उदाहरण पेश करते हैं अपनी नियति को समझते हुए भी नजमा का जाकिर से बोला गया संवाद- ‘‘जाकिर भाई, आपके बाजार में सबसे सस्ती अगर कोई चीज है तो वह है औरत।’’



या फिर फिल्म के अंत में शबनम का बोला गया संवाद- ‘‘ हम अगर तुम्हारे न हुए सज्जो तो...। ’’
प्रतिरोध के अंतिम प्रयास में शबनम आत्महत्या को हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है और निकाह के बावजूद जाकिर के हाथ लगने से पहले ही खुद को खत्म कर लेती है वहीं नजमा भी अख्तर को छोड़कर चली जाती है अपनी पहचान की तलाश में।



बाजार का डिप्रेसिव टोन भी फिल्म का महत्वपूर्ण पहलू है। अक्सर इसे भी फिल्म की आलोचना का विशय बनाया गया है। यह डिप्रेसिव टोन उसे रियलिस्टिक टच तो प्रदान करता ही है साथ ही उसे कुछ हद तक नकारात्मक भी बनाता है। यह टोन कई दफा दर्शकों को भी अपनी चपेट में ले लेता है।



फिल्म जहां कई बार रुलाती है वहीं ऐसा भी महसूस होता है कि जैसे अब इसे और आगे नहीं देखा जा सकता। यह माध्यम की सफलता तो है लेकिन कई अवसरों पर यह फिल्म की सीमा भी बन जाता है।
नसीरुद्दीन षाह और स्मिता पाटिल जैसे आला अदाकारों की मौजूदगी में बाजार दरअसल फारुख षेख और सुप्रिया पाठक की फिल्म है। बाजार मंे फारुक षेख की अदाकारी के लिए एक ही षब्द है मेरे पास ‘अद्भुत’। उन्हें पहली बार मैंने देखा था दूरदर्षन के धारावाहिक आखिरी दांव में, जिसमें वह और दीप्ति नवल मुख्य भूमिका में थे।



बाजार मंे फारुख ने गरीब, बेरोजगार मुस्लिम युवा की भूमिका में जो जान फूंकी है वह आज की सिनेमाई युवा की छवि से कोसांे दूर होकर भी कितनी अजीज है। याद कीजिए षबनम के मां बाप से सज्जो का संवाद या फिर षबनम के साथ फिल्म के आखिरी दृष्यांे में से एक।



षबनम की भूमिका मंे सुप्रिया पाठक ने एक कम उम्र घरेलू लड़की की भूमिका निभाते हुए भी परिपक्वता की बुलंदियों को छुआ है। बाजार के सभी कलाकारों को उनकी पूर्णता के लिए सलाम।
बाजार के बाद सागर सरहदी की निर्देशित एक और फिल्म हाल ही में आई है ‘चैसर’ । मैं हमेशा सोचता हूं कि बाजार जैसी सशक्त फिल्म बनाने वाले और कभी-कभी, सिलसिला, कहो न प्यार है जैसी फिल्मों की पटकथा लिखने वाले सागर सरहदी ने इतने लंबे अरसे तक कोई फिल्म क्यों नहीं बनाई। शायद उनकी संवेदना को छूती हुई कोई पटकथा नहीं मिली होगी।



चैसर की कहानी साहित्यिक पत्रिका कथा देश के नवलेखन अंक में कुछ वर्श पहले प्रकाशित रामजनम पाठक की कहानी ’बंदूक’ पर आधारित है। सरहदी ने यह कहानी पढ़ी और उन्हें लगा कि शायद उन्हें ऐसी ही किसी कहानी की तलाश थी।



फिल्म की पटकथा लिखने के लिए उन्होंने हिंदी कवि निलय उपाध्याय को चुना जो उस समय कदाचित कारणों से बेरोजगारी के दौर से गुजर रहे थे। सरहदी चाहते तो फिल्म की पटकथा किसी भी स्थापित नाम से लिखवा सकते थे लेकिन उन्होंने इसके लिए निलय को चुना क्यों़? क्योंकि एक कलाकार दूसरे कलाकार के संकट को उसकी भावनाओं को समझता है उन्हें साझा करता है। सरहदी की यही संवेदना बाजार को इतनी संवेदनषील फिल्म बनाती है कि आप उसे देखते हुए भी नहीं देख पाने के भाव से गुजरते हैं। भूूमिकाओ से यह समानुभूति ही फिल्म की जान है।



फिल्म का संगीत उसके सबसे मजबूत पक्षों में से है। मीर तकी मीर और मोहिनुद्दीन मखदूम की शानदाार गजलें ‘दिखायी दिए यूं ...’और ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की...’आज भी सुनने पर गजल और संगीत की उस जादुई दुनिया की सैर पर ले जाती हैं जहां तसव्वुर सीमाविहीन होकर उड़ान भरता है।



मीर के बारे में तो खैर कहना ही क्या। ये वही मीर हैं जिनके बारे में कभी गालिब ने कहा था- ‘‘रेखते का तू ही उस्ताद नहीं है गालिब कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था।’’



सदियों का फासला हो जाने के बावजूद उनकी गजलें आज भी षीर्श हिंदी सिनेमा का हिस्सा हैं। गुलों में रंग भरे वादे नौबहार चले चले भी आओ की गुलषन का कारोबार चले। उनकी यह गजल मेरी जानकारी में अब तक कम से कम चार अलग अलग फिल्मों में आ चुकी है।



मखदूम मोहिउद्दीन को उनकी विद्रोही तेवर की नजमों के लिए जाना जाता है। तरक्की पसंद षायरी के अगुया षायरों की जमात के मखदूम की गजल फिर छिड़ी बात रात फूलों की रोमांटिक गजलों को नई ऊंचाई पर ले जाने वाली रचना है।



बाजार के संगीत की खूबी है उसके गीतों में लोक संगीत और बेहतरीन गजलों का खूबसूरत मिश्रण। आपको याद होगा आंचलिकता के रंग में रंगा गीत चले आओ सैंया रंगीले मैं हारी रे।
या फिर भूपिंदर की गायी गजल करोगे याद तो हर बात याद आएगी क्या हर किसी को अतीत की हांट करती यादों में नहीं ले जाती।



जगजीत कौर की आवाज में फिल्म का आखिरी गीत जो सुप्रिया पाठक पर फिल्माया गया है - देख लो आज हमको जी भर के। क्या इस धरती के हर प्यार करने वाले की आत्मा की अंतिम पुकार नहीं लगती।

रहामान का जादू वाया स्लमडॉग मिलियनेयर




स्लमडॉग मिलियनेयर की जय जयकार दिगदिगंत में गूँज रही है. फ़िल्म को दस ऑस्कर नोमिनेशन मिले हैं. बॉलीवुड के निर्माता निर्देशक कुढ़ रहे हैं की हम क्यों नही ऐसी फिल्में बना पाते, रहमान ग्लोबल हो गए हैं. इस फ़िल्म में उन्होंने न भूतो न भविष्यति किस्म का संगीत दे दिया है एसा टीवी चैनलों का कहना है.....
मैंने फ़िल्म तो नही देखी इसके गीत जरूर सुने हैं. यकीनन रहमान ने कोई पारलोकिक संगीत नही दिया है. इस फ़िल्म में उनका संगीत अपनी ख़ुद की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं के आसपास भी नही फटकता.
याद कीजिये..........बॉम्बे, रोजा, ताल. स्वदेश, लगान, गुरु, और ऐसी ही अनेक फिल्मों को....
ऐ हैरते आशिकी....नही सामने.....जिया जले.......तू ही रे............ इनमें से कौन सा गाना है जो जय हो से उन्नीस ठहरता है.
तो फ़िर ये जनज्वार किसलिए किसकी मान्यता के लिए भावविभोर हो रहे हैं हम. उस ऑस्कर के लिए जो हॉलीवुड का अंदरूनी पुरस्कार है जिसमें बाहरी फिल्मों के लिए सिर्फ़ एक श्रेणी है, " बेस्ट फोरेन लैंगुएज फ़िल्म "
और फ़िर स्लमडॉग मिलियनेयर तो अपन ने बनाई भी नही यार, फ़िर ये मारामारी किसलिए क्या कभी एसा होगा की हम हॉलीवुड की नक़ल पर रखे नाम बॉलीवुड की जगह कोई असली नाम ढूंढ पाएंगे...................तब तक के लिए हैं ऑस्कर नोमिनेशन पर खुश होना बंद कर देना चाहिए................



तस्वीर साभार -गूगल

सिने जगत का सदाबहार चेहरा देव आनंद

अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर जिले के जाने माने वकील पिछौरीमल आनंद के घर 26 सितम्बर सन 1923 को एक बालक का जन्म हुआ। मां-बाप ने नाम रखा धर्मदेव पिछौरीमल आनंद। वही बालक जो आने वाले समय में देव आनंद के नाम से हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाया।
देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का।
लाहौर के गवर्नमेंट कालेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपना मुकाम बनाने के लिए घर छोड़ दिया और मुंबई चले आए। सन 1946 में आई फिल्म हम एक हैं से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की। पुणे में फिल्म की शूटिंग की शुरुआत के दौरान उनकी मुलाकात हुई बाद के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरुदत्त से जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में अपना स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे।
एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया। अगर देव कभी निर्माता बनेंगे तो उनकी फिल्म का निर्देशन करेंगे गुरुदत्त और अगर गुरुदत्त ने कभी फिल्म बनाई तो उसके नायक होंगे देवानंद। सन 1949 में देवानंद ने नवकेतन बैनर के नाम से फिल्म निर्माण का काम शुरू किया, उन्होंने अपना वादा निभाया और सन 1951 में अपनी फिल्म बाजी का निर्देशन गुरुदत्त को सौंपा। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई।
गायिका -अभिनेत्री सुरैया के साथ देव आनंद का प्रेम प्रसंग जगजाहिर है। दोनों ने एक दूसरे के साथ छह फिल्मों में काम किया। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान नाव पलट जाने पर जब सुरैया डूबने लगीं तो देव ने उन्हें बचाया और यहीं से दोनों एक दूसरे के नजदीक आए। मगर सुरैया की नानी को यह रिश्ता मंजूर नहीं था और नतीजतन दोनों का रिश्ता परवान न चढ़ पाया। सुरैया ने आजीवन विवाह नहीं किया।
आर.के.नारायण के उपन्यास गाइड पर देव आनंद ने इसी नाम से एक फिल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद ने। अंग्रेजी और हिंदी में एक साथ बनी इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया।
देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय हैं। सन 1977 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।
कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाजार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह।
उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया तो वह भी यों ही नहीं था। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था कुछ वर्षो पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गए। आश्चर्य नहीं कि वे आज 86 वर्ष की अवस्था में भी पूरी तरह सक्रिय हैं।
देव आनंद ने एक बार अपनी निरंतर सक्रियता के बारे में कहा था कि वे सपने देखते हैं और फिर उन्हें पर्दे पर उकेरते हैं बिना हिट या फ्लाप की परवाह किए। इन अर्थो में वे सच्चे कर्मयोगी हैं। देव आनंद शतायु हों और जिंदादिली बिखेरते रहें यही उनके प्रशंसकों की कामना है।

सुरों के राही हेमंत दा

अपनी गहरी आवाज और विशिष्ट गायन शैली के साथ संगीत की विविध विधाओं में जबरदस्त ख्याति अर्जित करने वाले गायक-संगीतकार हेमंत कुमार की 26 सितम्बर को पुण्यतिथि थी। ऐसे समय में जब गायकी, कला से ज्यादा व्यवसाय में तब्दील हो चुका हो, रियलिटी शोज ने हर गाने वाले के सामने अवसरों की भरमार पैदा कर दी हो और प्रौद्योगिकी ने हर जुबान रखने वाले को गायक का रुतबा दे दिया हो, सच्ची और मासूम आवाज के धनी हेमंत दा जैसे गायक की याद एक ठंडी हवा के झोंके के समान आती है।
सन 1920 में वाराणसी में एक बंगाली परिवार में जन्मे हेमंत के घरवाले उनके बचपन में ही कोलकाता चले गए। आरंभिक शिक्षा दीक्षा के बाद हेमंत के परिजनों की इच्छा थी कि वे जादवपुर विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करें लेकिन उन्होंने उनसे बगावत करके संगीत में अपना भविष्य चुनने की ठानी। संगीत के प्रति अपनी दीवानगी के बारे में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, "मैं हमेशा गाने का मौका तलाशता रहता था चाहे वो कोई धार्मिक उत्सव हो या पारिवारिक कार्यक्रम। मैं हमेशा चुने हुए गीत गाना पसंद करता था।"
हेमंत दा ने जिस दौर में संगीत को गंभीरता से लेना शुरू किया उसे हिंदी सिनेमा के 'सहगल काल' के नाम से जाना जाता है। यह वह दौर था जब गायकी पर कुंदनलाल सहगल और पंकज मलिक जैसे गायकों का लगभग एकाधिकार था और नए गायकों के लिए सिने जगत में जगह बनाना ख्वाब के समान था। चालीस के दशक के मध्य धुन के पक्के हेमंत 'भारतीय जन नाट्य संघ' (इप्टा) के सक्रिय सदस्य बन गए और वहीं उनकी दोस्ती हुई गीतकार-संगीतकार सलिल चौधरी से।
सन 1948 में हेमंत ने गान्येर बधु (गांव की बहू) शीर्षक वाला एक गीत गाया जो सलिल चौधरी द्वारा लिखा और संगीतबद्ध किया गया था। छह मिनट के इस गीत में बंगाल के एक गांव की बहू के दैनिक जीवन का चित्रण किया गया था। इस गीत ने हेमंत और सलिल दोनों को अपार लोकप्रियता दिलाई। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यही वह गीत था जिसने हेमंत कुमार को अपने समकालीनों के समकक्ष स्थापित किया। इसके बाद सलिल और हेमंत की जुगलबंदी ने बांग्ला संगीत जगत में खूब धूम मचाई।
कुछ बंगाली फिल्मों में संगीत देने के बाद हेमंत मुंबई आ गए और उन्होंने सन 1952 में अपनी पहली हिंदी फिल्म को संगीत दिया जिसका नाम था आनंद मठ। इस फिल्म में लता मंगेशकर के गाए गीत वंदे मातरम ने अभूतपूर्व ख्याति अर्जित की। साथ ही साथ हेमंत ने पाश्र्व गायक के रूप में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। अभिनेता देवानंद की शुरुआती फिल्मों 'जाल' और 'सोलहवां साल' में गाए उनके गीतों 'ये रात ये चांदनी..' और 'है अपना दिल तो आवारा..' आदि ने हेमंत कुमार के लिए अपार लोकप्रियता हासिल की।
जाल, नागिन, अनारकली, सोलहवां साल, बात एक रात की, बीस साल बाद, खामोशी, अनुपमा आदि फिल्मों में हेमंत दा की मधुर आवाज का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा। तुम पुकार लो.., जाने वो कैसे लोग थे.., छुपा लो तुम दिल में प्यार मेरा.., ना तुम हमें जानो.. जैसे सदाबहार गीतों ने श्रोताओं के मन पर अमिट छाप छोड़ी।
तितली के परों की सी कोमल आवाज का मालिक, सुरों का यह राही 26 सितम्बर 1989 को सदा-सदा के लिए सो गया।