मृत्युंजय कुमार झा
संसदीय गरिमा को तार- तार कर राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पास हो गया है। बिल पास होने पर एक दुसरे की धुर विरोधी बीजेपी नेता सुषमा स्वराज और सीपीम नेता वृंदा करात ने गले मिलकर खूब जश्न का इजहार किया। ऐसे और भी कई नजारे संसद के गलियारों में देखे गए। बिल के समर्थक राजनीतिक पार्टी से लेकर मीडिया तक ने इस बिल को ऐतहासिक करार दिया। हालांकि इसे लोकसभा और 15 विधानसभाओं में पास होना अभी बाकी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर ये बिल पूरी तरह से पास हो भी जाता है तो क्या आम महिलाएओं के लिए जश्न मनाने वाली बात होगी? इस बिल की पृष्ठभूमि में कई ऐसे अनुत्तरित सवाल हैं जिसका जबाव देने की हिम्मत किसी भी राजनीतिक पार्टी में नहीं है।
कल्पना या फिर कामना कीजिए की ये बिल पास हो जाए। तब क्या इस बात की पूरी गारंटी होगी कि संसद में भगवतिया देवी जैसे चेहरे बहुत दिखेंगे, जिनका कोई राजनितिक पृष्ठभूमि नहीं है? शायद नहीं। तब भी वहीं चेहरे दिखेंगे जो अभी दिख रहे हैं। हां उसका रूप जरूर बदल जाएगा। लालू यादव नहीं तो राबड़ी देवी दिखेंगी, मुलायम सिंह नहीं तो उनकी बहु दिखेंगी, शरद पवार नहीं तो उनकी बेटी दिखेंगी। तो फिर सावाल है कि ऐसे में इस कानून का क्या मतलब रह जाएगा।
अब जरा मौजूदा स्थिति को समझिए। बिल के सबसे बड़े हिमायती कांग्रेस पार्टी ने पिछले लोक सभा चुनाव में देश के सबसे ज़्यादा लोकसभा सीटों वाले(80 सीटें) वाले राज्य उत्तर प्रदेश में महज 6 महिला उम्मीदवार को टिकट दिया। और ये हाल तब है जब कि पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष दोनों महिला हैं। इनमें किसी भी ऐसी महिला को टिकट नहीं मिला जिनका कोई पोलिटिकल कनेक्शन न हो। मसलन रामपुर से बेगम नूर बानो को टिकट मिला जिनके पति नवाब जुल्फिकार अली खुद सांसद थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश सिंह की पुत्री राजकुमारी रत्ना सिंह को टिकट मिला और व जितकर संसद पहुंचीं। पूर्वांचल के जाने माने नेता कल्पनाथ राय की पत्नी सुधा राय को मऊ से टिकट दिया गया। लखनऊ से रीता बहुगुणा जोशी को उम्मीदवार बनाया गया जो दिग्गज कांग्रेसी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी हैं। ये तो चंद उदाहरण हैं। बाकी पार्टियों का भी कमोबेश यही हाल है। तो क्या ऐसे में ये उम्मीद की जा सकती है कि महिला आरक्षण बिल पास होने पर ये तस्वीर बदल जाएगी।
अब जरा बिल पर हाय तौबा मचाने वाले पार्टी की मानसिकता देखिए। बिल के विरोध में हंगामा बरपाने वाले यादव तिकड़ी, लालू, मुलायम, और शरद 35 साल से ज़्यादा से राजनीति में सक्रिय हैं। और करीब 20-25 साल से अपनी पार्टी के सारे मामलों में फैसला करने की स्थिति में भी हैं। क्या पिछले 20-25 सालों में लालू यादव को किसी ने रोका कि व अपनी पार्टी से ज़्यादा से ज़्यादा गरीब पिछड़ी महिला को टिकट न दें। किसने रोका कि राबड़ी देवी की जगह किसी दूसरी महिला को मुख्यमंत्री नहीं बनाइए। मुलायम सिंह को किसने रोका कि डिंपल यादव की जगह किसी दूसरी यादव महिला को टिकट न दें। फिर इसकी क्या गारंटी है कि ‘कोटा के अंदर कोटा’ की इनकी मांग मान ली जाए तो यादव तिकड़ी के कुनबे के अलावा बाकी पिछड़ी महिलाओं का भी सशक्तीकरण होगा। दरअसल ये ‘कोटा के अंदर कोटा’ की मांग इसलिए कर रहे हैं ताकि इनकी राजनीतिक ज़मीन नहीं खिसके।
ऐसे में जरुरत इस बात कि है कि सिर्फ राजनीतिक रोटी सेंकने लिए आरक्षण का हल्ला न मचाया जाए, इसे हर पार्टी अपने व्यवहार में भी लागू करे। सिर्फ महिला राष्टपति या महिला लोकसभा अध्यक्ष का नाम गिना देने भर से महिलाओं का सशक्तीकरण नहीं हो जाएगा। किसी राज्य में अगर दलित महिला मुख्यमंत्री है तो वहां की दलित महिला चांदी की थाली में नहीं खाने लगी है। इसलिए महिला आरक्षण सही मायनों में तभी ऐतिहासिक होगा जब उसका दरवाजा सबके लिए खुलेगा।
(बिहार के अररिया जिले में जन्मे मृत्युंजय कुमार झा फिलहाल ज़ी बिज़नेस न्यूज चैनल में एंकरिंग और रिपोर्टिंग करते हैं।)
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