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अथ श्री महाकाल दर्शन कथा



धरम-करम में हालांकि अपनी कोई आस्था नहीं है लेकिन मां बाबूजी खासकर मां बहुत अधिक धार्मिक प्रवृत्ति की है। सो शुक्रवार को उन्हें लेकर महाकाल की नगरी उज्जैन गया था। पता नहीं क्यों बचपन से हर बार ऐसा हुआ है कि जब भी किसी धार्मिक स्थान पर गया हूं विरक्ति थोड़ी ओर बढ़ गई है। मंदिर में प्रवेश के समय हम खुश थे भीड़ बिल्कुल नहीं थी और हम जल्दी ही गर्भगृह के द्वार पर थे। उम्मीद नहीं थी कि इतनी आसानी से दर्शन हो जाएंगे लेकिन जल्द ही अपनी गल्ती का अंदाजा हो गया। गर्भगृह से ऐन पहले हमें रोक दिया गया। वहां ड्यूटी कर रहे सिपाही ने प्रवेश द्वार पर रस्सी लगा दी । क्या तो अभी थोड़ी देर दर्शन नहीं हो सकेंगे।
भाई साहब 10 मिनट बीते, 20 मिनट बीते। सामने लगी स्क्रीन पर दिख रहा है पूजा चल रही है। अंदर। सिपाही जी से फिर पूछा, जवाब मिला अभी अंदर भीड़ है छंटते ही आपको अंदर भेज दिया जाएगा। मां की तबियत खराब रहती है उसे अस्थमा की शिकायत है। वह बेचारी हैरान परेशां घुटनों पर झुकी इंतज़ार कर रही है की प्रभु सुध लें उसकी । एक घंटा होने को था लगा कि उसे लेकर वापस बाहर निकल जाऊं, वापस पीछे मुड़कर क्या देखता हूं कि जहां तक नजर जा सकती है वहां तक लोगों की कतार लगी है। वापस लौटना मुमकिन नहीं।
सामने लगी स्क्रीन पर नजरे गड़ाए हम खड़े थे। तभी टीवी स्क्रीन पर नजर गई कोई जाना पहचाना सा चेहरा है। मैंने मेटल डिटेक्टर लेकर खड़े सिपाहीजी से पूछा ये कौन है। सिपाही भटभटाकर बोला- सुधांशु जी महाराज अंदर पूजा कर रहे हैं।
बात इस तरह खुली कि सुधांशु जी महाराज की विशेष पूजा की कीमत मैं मेरी मां और कई अन्य श्रद्धालु चुका रहे हैं। स्क्रीन पर पूजा चल रही है। सुधांशु जी महाराज अभिषेक कर रहे हैं। दूध मक्खन और जाने क्या क्या अर्पित कर रहे हैं। मंदिर के सारे पुजारी उनकी सेवा टहल में लगे हैं। बाहर खड़े लोगों का इंतजार गुस्से में बदल रहा था।
लगा कि अब लोग रस्सी तोड़कर घुस ही जाएंगे लेकिन तभी ड्यूटी कर रहे सिपाही ने गजब का क्राइसिस मैनेजमेंट किया। अचानक उसके अंदर स्वामी झांसाराम की आत्मा प्रवेश कर गई। वह उसकी आवाज मे 100 किलो चीनी घुल गई। अगली कुछ लाइनें झांसाराम की जुबानी सुनिए
- ये संसार मिथ्या है। केवल ईष्वर ही सत्य है। तन पवित्र सेवा किए धन पवित्र किए दान, मन पवित्र हरिभजन से हो एहि विधि कल्याण।
भक्तों ये तन जो मिट्टी का बना है---
एक और बानगी- बोलो महाकाल की जय, सीता मैया की जय, श्रीरामचंद्र की जय, हनुमान की जय, और बोलो बोलो सुधांशु जी महाराज की जय---

अब बोलो क्या बोलते हो सुधांषू जी महाराज को।
खैर सुधांशु जी महाराज की पूजा खतम हुई और वे पुजारियों को 1000-1000 रुपये के नोट बांटकर बाहर निकले। और हम भक्तों का भी कल्याण हुआ...
शेष फिर कभी ...

क्या अक्षरधाम मन्दिर एक धार्मिक मॉल है


कल शाम मैं अक्षरधाम मन्दिर गया था. लंबे समय से आते-जाते इस मन्दिर को देखता था और इसकी भव्यता मुझे आकर्षित करती थी लेकिन मन्दिर परिसर में जाकर जाने क्यों मुझे उस भव्यता से डर लग रहा था.
किसी परिचित प्रतीक की अनुपस्थिति में आस्था को आसरा नही मिला और उसकी भव्यता, फ़ूड कोर्ट और थिएटर मिलकर किसी धार्मिक मॉल का सा वातावरण तैयार कर रहे थे. मैं वहाँ अपने दो मित्रों के साथ गया था. हमारे बीच बहस की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी.
हम बात कर रहे थे की क्या मन्दिर की भव्यता किसी की आस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है...
हम बात कर रहे थे की क्या छोटे कपडों में बड़ी आस्था समेटे ये बालाएं जिनके हाथ में पेटीस और बत्तरस्कॉच आइसक्रीम का कोने था पिकनिक पर हैं...और क्यों हमारा ध्यान मन्दिर से ज्यादा इनकी हरकतों पर है...
हम बात कर रहे थे की क्यों दूसरे सम्प्रदायों के स्थान हमें अपेक्षाकृत अधिक सम्मोहित करते हैं...
हम बात कर रहे थे की वो कैसी आस्था है जो लोगों को अपने गुरु का जूठा या उनका नहाया हुआ पानी पीने को मजबूर करती है...
खैर अक्षरधाम मुझे मेरे देखे कुछ पुराने भव्य मंदिरों का मॉल संस्करण लगा. मैं सोच रहा था की इस मन्दिर की भव्यता के पीछे कितनी कहानियां दफ़न होंगी, की आने वाली पीढियां इस मन्दिर को कैसे याद रखना चाहेंगी...व्यक्तिगत रूप से मुझे इस खर्च की कोई उपादेयता नही नजर आयी जाने क्यों वो मन्दिर मुझे भयभीत कर रहा था।
तस्वीर - साभार गूगल