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आधी हकीकत आधा फसाना

गोपाल कृष्ण गांधी
अंग्रेजी का जुमला है ‘फिफ्टी-फिफ्टी,’ लेकिन हिंदी में भी इसका इस्तेमाल इफरात से किया जाता है। सबसे पहले फिफ्टी-फिफ्टी का इस्तेमाल किसने किया होगा? शेक्सपियर? चार्ल्स डिकेंस? मैंने यह जानने के लिए इंटरनेट की शरण ली। लेकिन वह मुझे इस बाबत ज्यादा कुछ नहीं बता पाया, सिवाय इसके कि 80 के दशक में पाकिस्तान में ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ नामक एक लोकप्रिय धारावाहिक प्रसारित किया जाता था, या इस शीर्षक से एक उपन्यास भी छप चुका है, या यह बाइक के एक ब्रांड का नाम है, या थोड़े मीठे-थोड़े नमकीन बिस्किट के एक ब्रांड को ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ कहा जाता है।
इंटरनेट ने मुझे यह भी बताया कि बॉलीवुड में ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ शीर्षक से दो फिल्में बन चुकी हैं, जबकि हॉलीवुड में तो इस शीर्षक से कई फिल्में बनी हैं।बॉलीवुड में ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ शीर्षक से बनी पहली फिल्म में नलिनी जयवंत, डेविड, टुनटुन, गोप और हेलन जैसे कलाकार थे। इसमें मोहम्मद रफी ने एक गीत गाया था : ‘आधी तुम खा लो/आधी हम खा लें/मिल-जुलकर जमाने में/गुजारा कर लें’। दूसरी ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ में नायक राजेश खन्ना और नायिका टीना मुनीम थीं। इसमें फिफ्टी-फिफ्टी के बारे में भी एक गाना था : ‘प्यार का वादा/फिफ्टी-फिफ्टी’। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भारतीय लोकतंत्र पर जो किताब लिखी है, उसमें उन्होंने जॉनी वॉकर के एक डायलॉग का जिक्र किया है। नसरीन मुन्नी कबीर ने मुझे बताया कि यह फिल्म थी ‘मेरे मेहबूब’। फिल्म में राजेंद्र कुमार जॉनी वॉकर से पूछते हैं : ‘तुम आशिक हो या आदमी?’ और जॉनी वॉकर जवाब देते हैं : ‘फिफ्टी-फिफ्टी’।
‘द ग्रेट इंडियन मार्केट’ चौबीस घंटे रोशन रहता है। इस बाजार को एक नाम भी दिया गया है : ‘बूम’। हम एक उच्च मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार की कल्पना कर सकते हैं, जो एक बहुमंजिला अपार्टमेंट में रहता है। दादाजी अपने सेलफोन पर किसी स्टॉक ब्रोकर से बतिया रहे हैं। दादीमां किसी विशेषज्ञ की तरह रिमोट थामे बैठी हैं और टीवी सीरियलों के दरमियान दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में खोई हुई हैं। पापा लैपटॉप पर डेडलाइनों से संघर्ष कर रहे हैं। मम्मी माइक्रोवेव में मार्गेरिता पित्जा गर्म कर रही हैं। बेटा आईफोन पर दोस्त से मोटरबाइकों के बारे में बहस कर रहा है। बेटी आईपॉड में खोई हुई है। दो छोटे बच्चे वीडियो गेम पर ‘ढिशुम-ढिशुम’ कर रहे हैं। और एक नौकरानी धर्य की प्रतिमूर्ति की तरह एक चाइना मेड रैकेट से मक्खियों और मच्छरों को ठिकाने लगा रही है। यह सब किसी एशियन टाइगर द्वारा निर्मित बेहतरीन एयर कंडीशनर की सुख-सुविधा में घटित हो रहा है।
इनमें से नौकरानी को छोड़कर सभी अच्छा खाने-पहनने वाले, उड़नखटोलों में घूमने वाले, फिटनेस क्लब में जाने वाले लोग हैं। यहां अपार्टमेंट का नाम भी याद रखा जाना चाहिए : ‘आशीर्वाद’। इस घर में ‘बूम’ अपने चरम पर है। क्या इस परिवार के साथ कुछ भी फिफ्टी-फिफ्टी हो सकता है? क्या उसने पूरे एक सैकड़े को अर्जित नहीं कर लिया है? अर्धशतक नहीं, शतक। बेशक। आखिर यही तो सौ फीसदी कामयाबी की कहानी है।लेकिन अगर रूपकों की भाषा में बात करें तो खुशहाली की यह सौ फीसदी तस्वीर समूचे भारत की महज पचास फीसदी हकीकत है। यह तस्वीर ‘आधी तुम खा लो’ की भावना से कतई भरी हुई नहीं है। उस खुशहाल घर की नौकरानी के बारे में यह जरूर कहा जा सकता है कि वह बाकी पचास फीसदी हकीकत से जुड़ी होगी।
कल्पना करें कि वह अपार्टमेंट के स्वीपर की पत्नी है। दोनों मूलत: झारखंड के हैं। उनका एक छोटा-सा घर है। रोज जब वे अपना काम खत्म कर चुके होते होंगे तो अपनी शामें किस तरह बिताते होंगे? इतना तो हम मान सकते हैं कि उनके पास भी सेलफोन होंगे। शायद एक छोटा-सा टीवी भी हो। लेकिन इसके अलावा और कुछ नहीं। उन्हें सार्वजनिक नल से पानी लाने के लिए कतार में लगना पड़ता होगा। वे पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करते होंगे। उनके बच्चे पड़ोस के किसी स्कूल में पढ़ते होंगे। दोनों की ही सेहत यकीनन बहुत अच्छी नहीं होगी। जब यह परिवार रात को एकत्र होता होगा तो पूरी संभावना है कि वे साथ बैठकर खाना खाते होंगे, सुबह के लिए बाल्टियों में थोड़ा-सा पानी सहेजकर रखते होंगे और टीवी देखकर सो जाते होंगे।
क्या उनके बच्चे कभी किसी अच्छे कॉलेज या आईआईटी तक पहुंच सकते हैं? नामुमकिन तो नहीं, लेकिन यह तभी संभव है, जब उनके मौजूदा स्कूल उन्हें उम्दा तालीम दें ताकि वे एंट्रेंस टेस्ट में ‘ढिशुम-ढिशुम’ बच्चों को पछाड़ सकें।आशीर्वाद अपार्टमेंट में रहने वाला परिवार भारत की दो ‘फिफ्टीज’ में से एक का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरा परिवार, जिसे हमें ‘प्रतिवाद’ का नाम देना चाहिए, दूसरे ‘फिफ्टी’ का प्रतिनिधित्व करता है। पहला परिवार ग्रेट बूम और आर्थिक तरक्की से जुड़ा हुआ है तो दूसरा परिवार धोबियों, दर्जियों, लोहारों, खोमचेवालों या दूसरे शब्दों में देश की ‘सेल्फ एंप्लाइड’ जीवनरेखा से। दिल्ली के निजामुद्दीन जैसे क्षेत्रों में हम इस जीवनरेखा को देख-सुन सकते हैं। केवल माल-असबाब बेचने वालों के रूप में ही नहीं, बल्कि दुर्लभ सेवाओं के प्रदाताओं के रूप में भी। ये लोग अपने हुनर और कौशल के साथ हमारे दरवाजों पर दस्तक देते हैं। महज कुछ ही समय की बात है और ये दृश्य से बेदखल हो जाएंगे। उनकी जगह ले लेंगे शोरूम और बुटीक, बार और बरिस्ता, जो इन दक्ष स्ट्रीट कॉलर्स को एक शानदार अतीत के पोस्टरों में तब्दील कर देंगे।क्या हमें अब भी कहीं भिश्ती नजर आते हैं? नहीं, क्योंकि हमें अब चमड़े की मश्कों से पानी लेने की जरूरत नहीं।
लेकिन यहां सवाल यह है कि आखिर वे भिश्ती कहां चले गए? इससे भी जरूरी सवाल यह है कि हमारे जेहन में कभी यह सवाल क्यों नहीं उठता कि वे कहां चले गए? धुनकी अब भी कभी-कभार दिख जाते हैं, लेकिन इंटरनेट मुझे बताता है कि आज भारत में रजाइयों के 578 सूचीबद्ध आयातक हैं। इनके सामने धुनकियों की क्या बिसात? फेरीवालों में अब केवल रद्दी-पेपरवाले ही बचे हुए हैं। इन लोगों की लगातार घट रही तादाद एक ऐसी जीवनशैली की ओर इशारा करती है, जो चमकदार दुकानों और मॉलों से इतना सामान उठा ले आती है कि उसे न तो उनका घर संभाल सकता है और न ही उनकी कचरे की टोकरियां।
Source: भास्कर न्यूज

हिंदुस्तान में मौजूद हैं कितने ही गज़ा !

वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार का यह आलेख बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार - ब्लॉगर

दिल्ली से गज़ा तक के सफर में जिस गज़ा की हम कल्पना करते पहुंचे थे, वह कुछ मायनों में उससे बेहतर था और कुछ में बदतर.
एक तो हमलों के निशाने पर बिरादरी, दूसरी तरफ आसपास के कुछ मुस्लिम पड़ोसी देशों की भी हमदर्दी उसके साथ नहीं है. संयुक्त राष्ट्र जितनी राहत करना चाहता है, वह भी इसराइल की समुद्री घेरेबंदी की वजह से मुमकिन नहीं है. लेकिन उम्मीद से बेहतर इस मायने में था कि कई नए मकान और नई इमारतें बनती दिख रहीं थीं और बच्चे स्कूल-कॉलेज जाते हुए भी.

गज़ा में हम एक ऐसे मुहल्ले में गए जहां एक ही कुनबे के 28-29 लोग हवाई हमले में मारे गए थे. पूरा इलाक़ा अब मैदान सा हो गया है और वहीं एक परिवार कच्ची दीवारें खड़ी करके प्लास्टिक की तालपत्री के सहारे जी रहा है. इस बहुत ही ग़रीबी में जी रहे परिवार ने तुरंत ही कॉफ़ी बनाकर हम सबको पिलाई.

परिवार की एक महिला को कसीदाकारी करते देखकर मैंने पूछा कि इसका क्या होता है? पता लगा कि बाजार में उसे बेच देते हैं. मेरी दिलचस्पी और पूछने पर उसने कुछ दूसरे कपड़े दिखाए जिन पर कसीदा पूरा हो गया था. लेकिन कई कपड़े फटे-पुराने दिख रहे थे जो कि इसराइली हवाई हमले में जख्मी हो गए थे.

मैंने ज़ोर डालकर दाम देकर ऐसा एक नमूना लिया. परिवार की महिलाओं की आंखों में आंसू थे और आगे की ज़िंदगी का अंधेरा भी.

यह शहर मलबे के बीच उठते मकानों और इमारतों का है, जिनके ऊपर जाने किस वक़्त बमबारी हो जाए. कहने को फ़लीस्तीनी लोग भी घर पर बनाए रॉकेटों से सरहद पर हमले करते हैं, लेकिन आंकड़े देखें तो फ़लीस्तीनी अगर दर्जन भर को मारते हैं तो इसराइली हजार से अधिक. एक ग़ैरबराबरी की लड़ाई वहां जारी है.

कहाँ है हिंदुस्तान?
फ़लीस्तीनी इलाक़े में अब सिवाय इतिहास के, कोई हिन्दुस्तान की दोस्ती का नाम नहीं जानता था. उनकी आख़िरी यादें इंदिरा गांधी की हैं जिस वक्त यासर अराफ़ात के साथ उनका भाई-बहन सा रिश्ता था. अब तो इस दबे-कुचले ज़ख़्मी देश से भारत का कोई रिश्ता हो, ऐसा गज़ा में सुनाई नहीं पड़ता.


उनकी ज़िंदगी में अब सिर्फ़ यही रंग बचे हुए हैं
गज़ा के इस्लामिक विश्वविद्यालय में एक विचार-विमर्श के बाद, बमबारी के मलबे के बगल खड़े हुए दो युवतियों से भारत के बारे में मैंने पूछा, एक का कहना था इंदिरा गांधी को अराफ़ात महान बहन कहते थे.

दूसरी युवती का कहना था कि वह पढऩे के लिए भारत आना चाहती हैं लेकिन कोई रास्ता नहीं है.

ऐसा भी नहीं कि फ़लीस्तीनी इलाक़े में इंटरनेट नहीं है. तबाही के बीच भी धीमी रफ्तार का इंटरनेट है और नई पीढ़ी ठीक-ठाक अंग्रेज़ी में तक़रीबन रोज़ ही मुझसे लिखकर बात कर लेती है.

लेकिन नई पीढ़ी ने सिर्फ़ ऐसे कारवां को भारत से आते और जाते देखा है. इस कारवां से परे भारत की हमदर्दी का उसे कोई एहसास नहीं है और मुझसे पूछे जाने पर जब जगह-जगह मैंने कहा कि लगभग पूरा हिन्दुस्तान फ़लीस्तीनी लोगों के मुद्दों से नावाकिफ़ है तो इससे वे लोग कुछ उदास जरूर थे.

लेकिन इसके साथ ही हिन्दुस्तान के बारे में कहने के लिए मेरे पास एक दूसरा यह सच भी था कि लगभग पूरा हिन्दुस्तान ख़ुद हिन्दुस्तान के असल मुद्दों से नावाकिफ़ है और सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी के सुख या अपनी जिंदगी के दुख ही अमूमन उसके लिए मायने रखते हैं.

ऐसे में मैं न सिर्फ़ फ़लीस्तीनी नौजवान पीढ़ी बल्कि रास्ते के देशों में राजनीतिक चेतना के साथ उत्तेजित खड़े मिले नौजवानों से भी यह कहता गया कि ऐसी जागरूकता की ज़रूरत हिन्दुस्तान को भी बहुत अधिक है.

गड़बड़ा गया अनुपात
एक अनाथाश्रम बच्चों से भरा हुआ था जहां फेंके गए ज़िंदा बच्चे लाकर बड़े किए जा रहे थे.


फ़लस्तीनी इलाक़े में बड़ी संख्या में बच्चे अनाथालय में रहते हैं
फ़लीस्तीनी समाज में औरत-मर्द का संतुलन गड़बड़ा गया है, मर्द शहीद और औरतें अकेली.

मुस्लिम रीति-रिवाज़ ही क्यों, आज के भारत में ही कौन अकेली मां को उसके बच्चे पैदा करने पर बर्दाश्त कर सकता है? नतीजन ऐसे बहुत से बच्चे यतीमखाने में थे.

समाज में आबादी और पीढ़ी का अनुपात उसी तरह गड़बड़ा गया है जैसे विश्वयुद्धों के बाद कई देशों में गड़बड़ा गया था.

मानवीय सहायता पहुंचाने का मक़सद तो वहां पहुंचकर पूरा हो गया, पूरे रास्ते के देशों को देखना तो हो पाया था लेकिन एक अख़बारनवीस की हैसियत से फ़लीस्तीनी इलाक़ों को देखना बहुत कम हो पाया.

हमारे साथ वहां घूमते कुछ गैरसरकारी नौजवानों के बारे में भी हमारे एक साथी को शक था कि वे सत्तारूढ़ पार्टी हमास के लिए हमारी निगरानी करते हो सकते हैं. इतने कम वक्त में क्या पता चलता है?

हमें वहाँ चार दिन रहना था. और एक बात तय थी कि हमास और सरकार के लोग अपने कार्यक्रमों में हमारा वक़्त बरबाद करके हमें आम लोगों से दूर रखना चाहते थे. हो सकता है कि ख़तरों के बीच चौकन्नापन उनकी आदत बन गई हो.

नई फ़लीस्तीनी पीढ़ी के पास न वहां से बाहर निकलने की राहें हैं, न दुनिया के बहुत अधिक देशों में उनके स्वागत के लिए बाहें फैली हुई हैं.

बगल के देश सीरिया में जो फ़लीस्तीनी शरणार्थी आधी सदी से बसे हैं, वे जरूर दसियों लाख हैं और सीरिया की सरकार उनका ख़्याल रखती है, सरकारी नौकरी देती है.

लेकिन इसराइली घेरेबंदी की वजह से उनको अपनी ही ज़मीन पर आज तक लौटना नसीब नहीं हो पाया. इस तरह फ़लीस्तीनी इलाक़ों के भीतर रह गए लोग भीतर हैं और बाहर चले गए लोग बाहर.

मौतें और ज़ख़्म
जिस इसराइल ने हमारे पूरे कुनबे को मार डाला है, उसके पड़ोस में रहना या उसे पड़ोस में रहने देने का तो सवाल ही नहीं उठता
एक फ़लस्तीनी छात्रा
गज़ा में एक जगह हमलों में हुई मौतों और जख्मों की तस्वीरों की प्रदर्शनी लगी थी. इसमें हमारे साथ की कुछ भारतीय युवतियां बहुत विचलित सी दिखीं.

उनकी तस्वीर लेते हुए जब उनके चेहरों पर राख सी पुती दिखी तो उनका कहना था कि ऐसा नज़ारा उन्होंने कभी नहीं देखा था और ऐसे में मैं उनकी तस्वीर न लूं.

लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि मौतों के ऐसे मंज़र को देखकर तो इंसान विचलित होंगे ही और यह तस्वीर सिर्फ़ उसी को क़ैद कर रही है.

लेकिन अपनी ही साथी इस लड़की से बात करते-करते मैं यह सोचता रहा कि जिस फ़लीस्तीनी इलाक़े में आए वक़्त लोग असल मौतों को न सिर्फ़ देखते हैं बल्कि भुगतते भी हैं, जहां घायलों को उठाते हुए गर्म लहू की तपन हाथों को लगती है, जहां लहू की गंध भी देर तक सांसों में बसी रहती है, वहां की नौजवान पीढ़ी कितनी विचलित होती होगी.

यही वजह थी कि विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में एक हिन्दुस्तानी सवाल के जवाब में एक फ़लीस्तीनी छात्रा का कहना था, "जिस इसराइल ने हमारे पूरे कुनबे को मार डाला है, उसके पड़ोस में रहना या उसे पड़ोस में रहने देने का तो सवाल ही नहीं उठता."

तकलीफ़देह ज़िंदगी
गज़ा में एक कार्यक्रम में ऐसी औरतों और ऐसे बच्चों की भीड़ थी जो इसराइली जेलों में बंद अपने घर वालों की तस्वीरें लिए बंदी थीं.

डेढ़-दो महीने से फ़लीस्तीन के बारे में सोचते-सोचते अब आत्ममंथन से यह भी दिख रहा है कि हिन्दुस्तान के भीतर भी दबे-कुचले तबकों के बेइंसाफी वाले कितने ही फ़लीस्तीनी इलाक़े जगह-जगह बिखरे हुए हैं.अगर यह कारवां गज़ा के ज़ख्मों के देखने के बाद भारत के भीतर के 'फ़लीस्तीनियों' के ज़ख्म देख पाता है तो वह कारवां की कामयाबी होगी
एक कार्यक्रम में लेखक का वक्तव्य
इनमें कुछ ऐसे लोगों के घरवाले भी थे जो इसराइस के साथ युद्ध में मारे गए थे. लेकिन हिन्दुस्तान में भी पंजाब आदि में ऐसी तकलीफ़देह ज़िंदगियाँ होंगीं जिन्हें देखने का अवसर मुझे अब तक नहीं मिल पाया है.

दिल्ली में कश्मीरी पंडि़तों के शरणार्थी शिविरों तक जाना भी अभी नहीं हो पाया है और बस्तर में हिंसा से बेदखल लोगों के बीच में महज़ एक बार मेरा जाना हुआ है.

इसलिए गज़ा में जब एक टेलीविजन कार्यक्रम में मुझसे पूछा गया कि इस कारवां की मैं क्या कामयाबी मानता हूं? तो सोचकर मैंने कहा, "डेढ़-दो महीने से फ़लीस्तीन के बारे में सोचते-सोचते अब आत्ममंथन से यह भी दिख रहा है कि हिन्दुस्तान के भीतर भी दबे-कुचले तबकों के बेइंसाफी वाले कितने ही फ़लीस्तीनी इलाक़े जगह-जगह बिखरे हुए हैं.अगर यह कारवां गज़ा के ज़ख्मों के देखने के बाद भारत के भीतर के 'फ़लीस्तीनियों' के ज़ख्म देख पाता है तो वह कारवां की कामयाबी होगी."

बिना इसराइली बमबारी और गोलीबारी के भी हिन्दुस्तान के कमज़ोर तबकों पर रोज़ हमले हो रहे हैं और बेइंसाफी जारी है.

मतलब यह कि सिर्फ़ अमरीकी या इसराइली हमलों से गज़ा घायल नहीं होता, वह हिन्दुस्तान के भीतर लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों के हमलों से भी घायल होता है और यहां की बाज़ारू ताक़तों के हमलों से भी.

पांच हफ़्तों के इस सफ़र में दूसरों के ज़ख्म देखते हुए अपनों के ज़ख्मों के बारे में भी सोचने का कुछ मौक़ा मिला और शायद कारवां कुछ दूसरी तरफ़ भी जा सकेंगे.

गज़ा और रास्ते के सफ़र से जुड़ी और बातें फिर कभी, किसी और शक्ल में.

समाप्त.
(सुनील कुमार 'छत्तीसगढ़' अख़बार के संपादक हैं और इस पूरी लेख श्रृंखला में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी विचार हैं बीबीसी के नहीं.)

लाल चौक दंतेवाड़ा और तिरंगा झंडा

मुझे नहीं पता इस तथ्य में कितनी सच्चाई है लेकिन अगर यह सच है तो फिर इस पर बात की जानी चाहिए। श्रीनगर के लाल चौक पर जाकर तिरंगा फहराने के लिए जिन लोगों का जी हुड़क रहा है। उनके मातृ संगठन राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भारत देश के महाराष्टï्र राज्य के नागपुर शहर में स्थित है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक उस मुख्यालय पर आज तक एक दफा भी राष्टï्रीय स्वाभिमान का द्योतक तिरंगा झंडा नहीं फहराया गया है। तो भई क्योंन सुधार का यह कार्य अपने घर से ही शुरू किया जाए। छावनी बन चुके जम्मू कश्मीर के किसी भी हिस्से में तिरंगा फहरा देने भर से अगर उसे भारत का अभिन्न अंग साबित किया जाना सुनिश्चित होता है तो फिर क्यों नहीं वे पाक अधिकृत कश्मीर का रुख करते? क्यों नहीं वे दंतेवाड़ा का रुख करते, क्यों नहीं वे पूर्वोत्तर के किसी राज्य का रुख करते, क्यों नहीं वे इरोम शर्मिला चानू के पक्ष में दो शब्द बोलते? क्या महज इसलिए क्योंकि इन इलाकों में से कोई भी मुस्लिम बहुल नहीं है???
दरअसल भाजपा की इस खतरनाक कोशिश के लिए तमाशा या शरारत जैसे शब्द बहुत मासूम पड़ जाते हैं। यह जाहिर तौर पर मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में सांप्रदायिकता का जहर घोलने की बदनीयत ही है जो उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रही है। हर पांचवे साल चुनाव के ऐन पहले मंदिर का बुखार जिस पार्टी को पकड़ लेता हो उसकी इन हरकतों के मंसूबे भला क्या छिपेंगे? इस दुस्साहसी आडंबर का अगर कोई परिणाम होगा भी तो वह निश्चित तौर पर देश की एकता अखंडता के लिए और कश्मीरी अवाम के लिए दुखद ही होगा।

धूमिल याद आते हैं ''क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई और मतलब भी होता है?
निश्चित तौर पर इनकी आजादी के मायने एकदम जुदा हैं।

रायपुर वाले भाई साहब और बिनायक सेन की जाति

डा बिनायक सेन की जाति क्या है? यह कमाल का सवाल पता नहीं अब तक कितने लोगों के जेहन में आया है। बहरहाल, मेरा साबका इस सवाल से आज सुबह पड़ा। मेरी बुआ के बेटे जो कभी आरएसएस के एकनिष्ठ प्रचारक हुआ करते थे। भारत वर्ष के अटलकाल में उन्हें इस निष्ठा का फल मिला। अब उनके पास एक गैस एजेंसी के साथ एक पत्नी व एक संतान भी है। खैर, उनकी तरक्की? पर बात फिर कभी सही अभी कुछ दूसरी बात।

आज सुबह सुबह भाई साहब का फोन आया। "दिल्ली आया हुआ हूं। अक्षरधाम मंदिर से निकला हूं। तुम्हारे घर कैसे आना है बतावो।" हमने हड़बड़ी में कह दिया कि मंगलम के आगे प्रेस अपार्टमेंट आ जावो वहीं मिलता हूं। मैं अभी निकल ही रहा था कि दोबार फोन आ गया। मैं समझ गया कि वो आ चुके हैं। उनकी कार का मुंह प्रेस अपार्टमेंट की तरफ था। मैं उन्हें निराश करता हुआ सामने विनोद नगर की सर्वहारा कालोनी से प्रकट हुआ। खेद सहित उनको सूचित किया कि कार विनोद नगर की तंग गलियों में नहीं जा पाएगी। कुछ अपसेट से दिखते भाई साहब पैदल मेरे साथ घर आए।
अम्मा बाबूजी को दंड प्रणाम करने के बाद उनने हमसे सवाल दागा? क्योंजी "तुम्हारे" बिनायक सेन की जाति क्या है? हमने भी कह दिया आप रायपुर में रहते हो "अपने" पुलिसिया हाकिमों से पूछ लो? ये जवाब उनके रिसीविंग प्रोग्राम में फीड नहीं था यानी अनएक्सपेक्टेड था। मामला संभालते हुए उन्होंने कहा नहीं उसकी बीबी के नाम से लगता है कि वह क्रिस्तान है...
मैं उनकी इस अदा पर मर मिटा लेकिन आगे कुछ कहने का मौका नहीं दिया उन्होंने, तुरत मेरी किताबों की आलमारी से लेनिन की "इंपीरियलिज्म द हाइएस्ट स्टेट आफ कैपिटलिज्म" निकाली। उसे पलटा गहरी आंखों से मेरा जायजा लिया। बाबूजी के पास गए। कुछ देर फुसफुस करने के बाद बोले अपने बियाव करले, बाबू बियाव।
मैं अभी लेनिन की किताब से अपने ब्याह का कनेक्शन जोड़ ही रहा था कि वे पास आ गए। देख बाबू तू अभी बच्चा!! है। हमने भी संगठन में काम किया है लेकिन अंत में यही समझे कि मां बाप की मर्जी से ही जीवन का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
मैंने उनके बियाव लेक्चर को उतनी ही तवज्जो दी जितनी देनी चाहिए थी। दो घंटे की संक्षिप्त यात्रा में उनने क्यूबा से लेकर वेनेजुएला तक व सलवा जुडुम से लेकर मनमोहनामिक्स तक मेरा ज्ञान बढ़ाया। अभी वे गोंडवाना एक्सप्रेस में होंगे... मैंने पक्का किया है कि उनके रायपुर पहुंचते ही उनसे बिनायक सेन की जाति!!!! पूछूंगा पक्का।

डॉ सेन : जरूरी सवाल उठाने की मिली सजा

बहुत खतरनाक समय है। बिनायक सेन सत्ता के दमन के ताज़ा उदाहरण नहीं बल्कि एक और उदाहरण भर रह गए हैं। क्या लिखा जाये? क्या कहा जाये? शर्म आती है यह कहते हुए की देश में लोकतान्त्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार है। डॉ सेन का कुसूर क्या था यह अभी स्थापित होना बाकी है है और उनको हत्यारों अधमों को दी जाने वाली सज़ा सुना दी गयी है। दैनिक भास्कर में आज डॉ सेन पर एमजे अकबर और रामचंद्र गुहा के दो लेख प्रकाशित हुए हैं। उन्हें यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ - ब्लॉगर

जरूरी सवाल उठाने की मिली सजा
रामचंद्र गुहा
1991 में शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी गई। अब उनके साथी बिनायक सेन को आजीवन कैद का पुरस्कार दिया गया है। डॉ सेन ने जीवन में एक गोली भी नहीं दागी है। उन्हें तो यह भी नहीं पता होगा कि बंदूक थामते कैसे हैं।ती स साल पुराने अपने उस कृत्य पर मुझे आज भी खेद होता है, जब मैंने एक महान व्यक्ति को नींद से जगा दिया था। मैं नई दिल्ली में एक कांफ्रेंस में स्वयंसेवी के रूप में मौजूद था। हम छात्रों से कहा गया कि हम धनबाद के सांसद एके रॉय को बुलाकर लाएं, जो उस वक्त विट्ठलभाई पटेल हाउस स्थित अपने क्वार्टर में थे। खनन उद्योग धनबाद की अर्थव्यवस्था की बुनियाद है और इस शहर से रॉय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीते थे। उनके चुनाव प्रचार के लिए खुद खनन श्रमिकों द्वारा राशि जुटाई गई थी। अपनी ईमानदारी के लिए पहचाने जाने वाले श्रमिक नेता रॉय ने दिल्ली के लुटियंस के किसी बंगले या साउथ एवेन्यू के शानदार फ्लैट में रहने के स्थान पर पार्लियामेंट स्ट्रीट पर स्थित इस भवन के एक कमरे में बसेरा बनाना उचित समझा था।हमने रिसेप्शन पर मिस्टर रॉय के कमरे का नंबर पूछा, लिफ्ट से ऊपर पहुंचे और उनके दरवाजे पर दस्तक दी। किसी ने जवाब नहीं दिया। हमने फिर दरवाजा खटखटाया। हमें वहां से लौट आना था और आयोजकों को कह देना था कि सांसद महोदय कमरे में नहीं हैं। लेकिन हम नौजवान थे और अपने उत्साह का प्रदर्शन करना चाहते थे। हम लगातार दरवाजा खटखटाते रहे। आखिर दरवाजा खुला। हमारे सामने खादी का कुर्ता-पायजामा पहने एक व्यक्ति खड़े थे और वे अपनी आंखें मल रहे थे। उन्होंने बड़ी शालीनता से हमारी बातें सुनीं और फिर हमें बताया कि उनके सांसद मित्र और मेजबान रॉय अभी-अभी कहीं बाहर गए हैं।जिन्हें हमने नींद से जगा दिया था, वे शंकर गुहा नियोगी थे और शायद एक लंबी ट्रेन यात्रा के बाद आराम कर रहे थे। गुहा नियोगी मूलत: बंगाल के थे। बाद में वे भिलाई चले आए और असंगठित श्रमिकों के साथ काम करने लगे। शोषण से पीड़ित श्रमिक गुहा नियोगी के नेतृत्व में एकजुट हुए और बेहतर वेतन की मांग करने लगे। गुहा नियोगी की चिंताओं का दायरा केवल आर्थिक मामलों तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने श्रमिकों के लिए अस्पताल और उनके बच्चों के लिए स्कूल खुलवाए। श्रमिकों की पत्नियों की सहायता से नशा विरोधी अभियान चलाया। गुहा नियोगी की गरिमा और उनकी प्रतिबद्धता के चलते मध्यवर्ग के कई पेशेवर उनसे जुड़े। इन्हीं में से एक थे बिनायक सेन। बिनायक सेन ने वैल्लोर विश्वविद्यालय के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से स्वर्ण पदक प्राप्त किया था। 80 के दशक के प्रारंभ में वे छत्तीसगढ़ चले आए थे। वे तभी से छत्तीसगढ़ में हैं और उन्होंने हर पृष्ठभूमि के मरीजों की देखभाल की है। बिनायक सेन ने अपने आदर्श गुहा नियोगी की ही तरह अन्य क्षेत्रों में भी काम किया। वे आदिवासियों के सामाजिक अधिकारों के प्रति सचेत हुए, जो बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे थे और जिनके बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक से महरूम थे।वर्ष 1991 में शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी गई। अब लगभग बीस सालों बाद उनके मित्र और साथी डॉ बिनायक सेन को आजीवन कैद का पुरस्कार दिया गया है। डॉ सेन ने अपने जीवन में कभी एक गोली भी नहीं दागी है। उन्हें तो शायद यह भी पता नहीं होगा कि बंदूक को थामा कैसे जाता है। उन्होंने माओवादियों की हिंसा की स्पष्ट भत्र्सना की है। उन्होंने सशस्त्र क्रांतिकारियों की गतिविधियों को ‘अमान्य और अस्थायी निदान’ भी बताया था। छत्तीसगढ़ सरकार की नजर में डॉ बिनायक सेन का कसूर यह है कि उन्होंने माओवादी विद्रोहियों को नियंत्रित करने के लिए अख्तियार किए जाने वाले भ्रष्ट और क्रूर तरीकों पर सवाल उठाने का साहस किया था। वर्ष 2005 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा गठित की गई सतर्कता सेना ने दंतेवाड़ा, बीजापुर और बस्तर जिलों में कड़ा रुख अख्तियार किया था। नक्सलवाद से निपटने के नाम पर सेना ने घरों और कुछ मौकों पर तो पूरे गांव को फूंक दिया था। उन्होंने आदिवासी महिलाओं के साथ र्दुव्‍यवहार किया और पुरुषों को प्रताड़ना दी। नतीजा यह रहा कि हजारों आदिवासियों को अपना घरबार छोड़कर जाना पड़ा, जिनका माओवादियों से कोई ताल्लुक नहीं था।डॉ बिनायक सेन पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने सतर्कता सेना की ज्यादतियों के बारे में अवगत कराया था। डॉ सेन द्वारा लगाए गए आरोप गलत नहीं थे, क्योंकि मैंने स्वयं कुछ गणमान्यजनों (जिनमें बीजी वर्गीस, हरिवंश जैसे सम्मानीय संपादक और इंफोसिस पुरस्कार विजेता नंदिनी सुंदर भी शामिल हैं) के साथ उस क्षेत्र का दौरा किया था और सरकार के अपराधों को दर्ज किया था। डॉ सेन को एक ऐसे तंत्र द्वारा दोषी ठहराया गया है, जिसे मतिभ्रम के शिकार राजनेताओं द्वारा चंद भ्रमित पुलिस अफसरों की मदद से संचालित किया जाता है। निश्चित ही डॉ बिनायक सेन को सुनाई गई सजा को उच्चतर अदालतों में चुनौती दी जाएगी और ऐसा होना भी चाहिए। डॉ सेन की बहादुर पत्नी ने कहा है कि ‘एक तरफ जहां गैंगस्टर और घपलेबाज आजाद घूम रहे हों, वहां एक ऐसे व्यक्ति को देशद्रोही ठहराया जाना एक शर्मनाक स्थिति है, जिसने देश के गरीबों की तीस साल तक सेवा की है।’ मुझे लगता है सभी प्रबुद्ध भारतीय उनके इस मत से सहमत होंगे।

दोहरे मापदंडों वाला हमारा लोकतंत्र
एम जे अकबर

मैं बिनायक सेन के राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं, लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए। भारत दोहरे मापदंडों वाले लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है। भारत एक अजीब लोकतंत्र बनकर रह गया है, जहां बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है और डकैत खुलेआम ऐशो-आराम की जिंदगी बिताते हैं। सरकारी खजाने पर डाका डालने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए भी सरकार को खासी तैयारी करनी पड़ती है। जब आखिरकार उन पर ‘धावा’ बोला जाता है, तब तक उन्हें पर्याप्त समय मिल चुका होता है कि वे तमाम सबूतों को मिटा दें। आखिर वह व्यक्ति कोई मूर्ख ही होगा, जो तीन साल पहले हुए टेलीकॉम घोटाले के सबूतों को इतनी अवधि तक अपने घर में सहेजकर रखेगा। तीन साल क्या, सबूतों को मिटाने के लिए तो छह महीने भी काफी हैं। क्योंकि इस अवधि में पैसा या तो खर्च किया जा सकता है, या उसे किसी संपत्ति में परिवर्तित किया जा सकता है या विदेशी बैंकों की आरामगाह में भेज दिया जा सकता है। राजनेताओं-उद्योगपतियों का गठजोड़ कानून से भी ऊपर है। अगर भारत का सत्ता तंत्र बिनायक सेन को कारावास में भेजने के बजाय उन्हें फांसी पर लटका देना चाहे, तो वह यह भी कर सकता है। बिनायक ने एक बुनियादी नैतिक गलती की है और वह यह कि वे गरीबों के पक्षधर हैं। हमारे आधिपत्यवादी लोकतंत्र में इस गलती के लिए कोई माफी नहीं है। सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और यकीनन रमन सिंह के लिए इस बार का क्रिसमस वास्तव में ‘मेरी क्रिसमस’ होगा। कांग्रेस और भाजपा दो ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो फूटी आंख एक-दूसरे को नहीं सुहाते। वे तकरीबन हर मुद्दे पर एक-दूसरे से असहमत हैं। लेकिन नक्सल नीति पर वे एकमत हैं। नक्सल समस्या का हल करने का एकमात्र रास्ता यही है कि नक्सलियों के संदेशवाहकों को रास्ते से हटा दो। मीडिया इस गठजोड़ का वफादार पहरेदार है, जो उसके हितों की रक्षा इतनी मुस्तैदी से करता है कि खुद गठजोड़ के आकाओं को भी हैरानी हो। गिरफ्तारी की खबर रातोरात सुर्खियों में आ गई। प्रेस ने तथ्यों की पूरी तरह अनदेखी कर दी। हमें नहीं बताया गया कि बिनायक सेन के विरुद्ध लगभग कोई ठोस प्रमाण नहीं पाया गया था। अभियोजन ने गैर जमानती कारावास के दौरान बिनायक के दो जेलरों को पक्षविरोधी घोषित कर दिया था। सरकारी वकीलों की तरह जेलर भी सरकार की तनख्वाह पाने वाले नुमाइंदे होते हैं। लेकिन दो पुलिसवालों ने भी मुकदमे को समर्थन देने से मना कर दिया। एक ऐसा पत्र, जिस पर दस्तखत भी नहीं हुए थे और जो जाहिर तौर पर कंप्यूटर प्रिंट आउट था, न्यायिक प्रणाली के संरक्षकों के लिए इस नतीजे पर पहुंचने के लिए पर्याप्त साबित हुआ कि बिनायक सेन उस सजा के हकदार हैं, जो केवल खूंखार कातिलों को ही दी जाती है।बिनायक सेन स्कूल में मेरे सीनियर थे। वे तब भी एक विनम्र व्यक्ति थे और हमेशा बने रहे, लेकिन वे अपनी राजनीतिक धारणाओं के प्रति भी हमेशा प्रतिबद्ध रहे। मैं उनके राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं, लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए। भारत धीरे-धीरे दोहरे मापदंडों वाले एक लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है। जहां विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए हमारा कानून उदार है, वहीं वंचित तबके के लोगों के लिए यही कानून पत्थर की लकीर बन जाता है। यह विडंबनापूर्ण है कि बिनायक सेन को सुनाई गई सजा की खबर क्रिसमस की सुबह अखबारों में पहले पन्ने पर थी। हम सभी जानते हैं कि ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को नहीं हुआ था। चौथी सदी में पोप लाइबेरियस द्वारा ईसा मसीह की जन्म तिथि 25 दिसंबर घोषित की गई, क्योंकि उनके जन्म की वास्तविक तिथि स्मृतियों के दायरे से बाहर रहस्यों और चमत्कारों की धुंध में कहीं गुम गई थी। क्रिसमस एक अंतरराष्ट्रीय त्यौहार इसलिए बन गया, क्योंकि वह जीवन को अर्थवत्ता देने वाले और सामाजिक ताने-बाने को समरसतापूर्ण बनाने वाले कुछ महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मूल्य हैं शांति और सर्वकल्याण की भावना, जिसके बिना शांति का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता। सर्वकल्याण की भावना किसी धर्म-मत-संप्रदाय से बंधी हुई नहीं है। क्रिसमस की सच्ची भावना का सबसे अच्छा प्रदर्शन पहले विश्व युद्ध के दौरान कुछ ब्रिटिश और जर्मन सैनिकों ने किया था, जिन्होंने जंग के मैदान में युद्धविराम की घोषणा कर दी थी और एक साथ फुटबॉल खेलकर और शराब पीकर अपने इंसान होने का सबूत दिया था। अलबत्ता उनकी हुकूमतों ने उन्हें जंग पर लौटने का हुक्म देकर उन्हें फिर से उस बर्बरता की ओर धकेल दिया, जिसने यूरोप की सरजमीं को रक्तरंजित कर दिया था।यदि काल्पनिक सबूतों के आधार पर बिनायक सेन जैसों को दोषी ठहराया जाने लगे तो हिंदुस्तान में जेलें कम पड़ जाएंगी। ब्रिटिश राज में गांधीवादी आंदोलन के दौरान ऐसा ही एक नारा दिया गया था। यह संदर्भ सांयोगिक नहीं है, क्योंकि हमारी सरकार भी नक्सलवाद के प्रति साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक रवैया अख्तियार करने लगी है।

जूलियन असांज होने का क्या मतलब है?


चंदन के ब्लाग नई बात पर जूलियन असांज पर एक शानदार पोस्ट है, यह बात वहां फौरी प्रतिक्रिया के तौर पर लिखी थी। यहां उसे थोड़ा विस्तार देने की कोशिश है।


जूलियन पॉल असांज के बारे में बात करने का इससेबेहतर समय नहीं हो सकता। एक ऐसे समय में जबकिदेश का घोटालाकाल और देश में पत्रकारिता जगत केस्वयंभू ) नायकों का पतनकाल पूरे चरम पर है। बरसों बरस में करीने से गढ़ीगई मूर्तियों का ऐसा काला कुरूपसच सामने रहा है कि देखते उबकाई आती है। दुनिया बदलने का सपना लेकर पत्रकारिता की दुनिया में आईएक पूरी पीढ़ी मजबूरन या तो तर्जुमे को जीवन का आखिरी सच मान बैठी है या फिर पीआर एजेंसी से मिलने वालीकैब और उसके सस्ते महंगे तोहफों को जाहिर है। जूलियन असांज नामक का आदमी दरअसल तराशा हुआ ऐसाचकाचौंध आईना है जिसमें हममें से कई अपनी काली शक्लें देखने में डर रहे हैं। सारी दुनिया में गंध मचाने वालेअमेरिका केलिए मेरे पास कोई गाली नहीं है तो यह भी उतना ही सच है कि असांज के जज्बे के बारे में कुछ भीकहने के लिए भी मेरे पास शब्दों का अभाव है। अगर कुछ है तो सिर्फ सम्मान है। असांज के काम को महज खोजीपत्रकारिता या ऐसे ही किसी और सनसनीखेज शब्द में नहीं बांधा जा सकता। उन्होंने जो जीवन स्वेच्छा से चुना हैउसे हममें से अधिकांश मजबूरी में भी जीना नहीं चाहेंगे। शायद यही अंतर उन्हें असांज बनाता है। (

रही बात अमेरिका की तो मुझे नहीं लगता कि उस नामुराद देश के पास इतना धैर्य है कि वह असांज को सजासुनाने के लिए किसी प्रक्रिया की प्रतीक्षा करेगा। किसी भी दिन असांज को गोली लगने या किसी दुर्घटना में उनकीमौत की खबर सकती है और हमें इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा।लेकिन एक फर्क तो आया हैइस दरमियान। दुनिया के किसी कोने में जब भी कभी,शोषण, सच्चाई, साहस की बात होगी तो वह दरअसलजूलियन असांज की बात होगी।हमेशा की तरह एक बार फिर वही चिरपरिचित खेल चालू हो गया है झूठ के साथसच्ची लड़ाई में कथित नैतिकता को हथियार बनाकर सच को परास्त कर देने काखेल। हमें उम्मीद करनी चाहिएकि हर बार की तरह जूलियन असांज एक बार फिर विजेता होकर निकलेंगे और अगर ऐसा नहीं भी होता है तो भीसच्चाई का जो पत्थर वो फेंक चुके हैं वह समय के गर्भ में जाकर ठहरेगा और एक ऐसी पूरी पीढ़ी तैयार करेगा जोझूठ और अन्याय की आंखों में आंखें डालकर उनका प्रतिकार करेगी।

नेहा का मरना खबर नहीं है

रायपुर की 16 साल की नेहा की मौत किसी के लिए खबर नहीं है। आज के अखबारों ने उसे एक कालम जगह बख्शी है। क्योंकि नीरा राडिया, बरखा दत्त एंड कंपनी के सामने नेहा की जान की कोई कीमत नहीं। मेरी इस पोस्ट का मकसद केवल इतना है कि नेहा की मौत की जो वजह है वह शायद हमारे महानगरों में रहने वाले बहुतेरे लोगों की समझ में ही न आए लेकिन मैं चाहता हूं यह खबर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे ताकि वे तय कर पाएं कि उनके अंदर कितनी इंसानियत बाकी है। यह जान लेना बहुत जरूरी है कि नेहा ने अपनी जान क्यों दे दी।

दरअसल रायपुर में रहने वाली 16 साल की नेहा हमारे आपके घर कि किसी भी किशोरी की तरह रही होगी। जिसकी आंखों में सपने होंगे दिल में उम्मीदें लेकिन एक अंतर था। वह देश के 40 करोड़ मध्यम वर्गीय लोगों में से नहीं थी। उसका परिवार बेहद गरीब था। इतना गरीब कि उसके घर में अपना बाथरूम तक नहीं था। नतीजतन नेहा के परिवार को खुले में नहाना पड़ता था। उसके पिता का देहांत हो चुका था। घर में मां के अलावा छोटा भाई था। समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के मुताबिक नेहा के साथ पढ़ने वाले दो छात्र उसे लगातार छेड़ा करते थे जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। बहरहाल समाचार पत्रों में घटना के पीछे दिए गए एक दूसरे कारण को पढ़कर मुझे अपनी बेबसी पर बहुत गुस्सा आया। इन दोनों हरामजादों के साथ साथ पूरे मोहल्ले के मर्दों को रोज सुबह उसी समय छत की सैर का ध्यान आया करता था जिस समय नेहा खुले में नहा रही होती थी। रोज रोज की इस शर्मिंदगी की कीमत नेहा ने अपनी जान देकर चुकाई

क्या कहना चाहते हैं टाटा

समें कोई शक नहीं कि रतन टाटा देश के सबसे प्रतिष्ठिïत उद्योगपतियों में से एक हैं। ऐसे में जब वह कहते हैं कि एक निजी विमानन कंपनी को सरकारी स्वीकृति दिलाने के लिए उन्हें एक केंद्रीय मंत्री को 15 करोड़ रुपये बतौर घूस देने की सलाह दी गई थी तो जाहिर है कि इससे जुड़ा हर व्यक्ति बात को गंभीरता से लेगा। यह कोई हल्की टिप्पणी नहीं है।
बहरहाल दुखद पहलू यह है कि मीडिया के कुछ हलकों में चर्चा है कि यह भ्रष्टाचार को उजागर करने का मामला है, मगर ऐसा कतई नहीं है। अगर टाटा ने उस मंत्री का नाम लिया होता और उस मांग को उसी समय सार्वजनिक कर दिया होता तो जरूर ऐसा माना जा सकता था। टाटा अब भी वैसा कुछ नहीं कर रहे हैं, उनकी कही बात को महज शिकायत के तौर पर लिया जा सकता है जिसके जरिए वह अपना नैतिक स्तर ऊंचा बनाए रखना चाहते हैं।
अगर टाटा संबंधित मंत्री का नाम लेते तो उन्हें इसका श्रेय मिलता और उन छोटे कारोबारियों तथा आम नागरिकों का नैतिक साहस बढ़ता जो रोज ऐसी परिस्थितियों से दो चार होते हैं। मौजूदा सरकार के एक मंत्री से भी टाटा को शिकायत है लेकिन उन्होंने यहां भी उसे सार्वजनिक नहीं करने का फैसला किया। अब अगर टाटा के कद के कारोबारी ऐसे लोगों पर हमला तो करना चाहते हैं मगर चोट खाने से डरते हैं तो फिर आम आदमी से क्या उम्मीद की जाए? इन दिनों अनेक उद्योगपति निजी बातचीत में सार्वजनिक जीवन के भ्रष्टाचार का जिक्र करते हैं लेकिन किसी का नाम लेने से बचते हैं। ऐसे संस्थान जो निजी तौर पर मंत्रियों द्वारा घूस मांगने की शिकायत करते हैं, किसी न किसी तरह उन्हीं मंत्रियों को सम्मानित कर गौरवान्वित महसूस करते हैं। हर घूस लेने वाले को आखिर कोई न कोई तो घूस देता ही है। वह भी समान रूप से दोषी है। आम लोगों के मामले में तो यह बात समझ में आती है कि सत्ता में बैठे लोगों से डर लगता है लेकिन कम से कम प्रभावी और ताकतवर अग्रणी कारोबारी तो बिना किसी भय अथवा पक्षपात के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ बिगुल फूंक ही सकते हैं। अगर प्रमुख कारोबारी मिलकर यह निर्णय ले लें कि वे रिश्वत नहीं देंगे और रिश्वत मांगने वालों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करेंगे तो शायद इसका रिश्वत लेने और देने वाले लोगों पर असर पड़ता। उदाहरण के लिए अगर टाटा समय पर संबंधित मंत्री का नाम ले लेते और उसके बाद अपनी निजी विमानन कंपनी लाते तो इससे ऐसे दूसरे मंत्रियों को रोकने में मदद मिलती जो करदाता के पैसों से दूसरों को अनुचित लाभ पहुंचाकर किसी तरह बच निकले होंगे। खामोश रहकर टाटा ने न तो कोई बहादुरी का काम किया, न ही बेहतर प्रशासन की दिशा में कोई मदद पहुंचाई। इस सप्ताह उनकी ऊपरी तौर पर की गई टिप्पणी और उसके बाद सफाइयां भी आई हैं, इससे उनका कद छोटा हुआ है।भ्रष्टाचार के हालिया खुलासों और उसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कुछ निर्णायक कदमों ने देश के लोगों में प्रशासनिक पारदर्शिता की इच्छा जगा दी है। देश के मध्यवर्ग में क्रोध की लहर चल रही है। सार्वजनिक जीवन और ऊंचे स्तर पर भ्रष्टाचार की बात उजागर होने पर और कई लोगों की गरदन नप सकती है। वक्त आ गया है कि भारतीय उद्योग जगत से जुड़े प्रमुख लोग जो बेहतर प्रशासन में यकीन रखते हैं, मुंह खोलें और सरकार में उन लोगों का हाथ मजबूत करें जो कार्रवाई तो करना चाहते हैं लेकिन उनके पास इसके लिए जरूरी सूचना नहीं होती। भ्रष्टाचार उजागर करने के मामले में श्री टाटा जैसे उद्योगपतियों को अब निर्भय होकर स्पष्ट रुख अपना लेना चाहिए।
संपादकीय
बिजनेस स्टैंडर्ड

मुक्तिबोध की पत्‍नी का रायपुर में निधन

रायपुर। कवि मुक्तिबोध की पत्‍नी शांता मुक्तिबोध का निधन गुरुवार रात हो गया। उनकी उम्र 88 वर्ष थी। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रही थीं। शुक्रवार सुबह 11 बजे उनका अंतिम संस्कार रायपुर के देवेंद्र नगर श्मशानघाट में किया गया। वे रमेश, दिवाकर, गिरीश व दिलीप मुक्तिबोध की मां थीं। उन्हें मुखाग्नि उनके कनिष्ठ पुत्र गिरीश मुक्तिबोध ने दी।
हिंदी कविता के शीर्ष गजानन माधव मुक्तिबोध के संघर्ष के दिनों में शांता जी ने उनका हर वक्‍त साथ दिया। इस बात का जिक्र हरिशंकर परसाई, नेमिचंद जैन, अशोक वाजपेयी जैसे साहित्यकारों ने अपने संस्मरणों में किया है। पति के निधन के बाद बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ उनको मुकाम दिलाने में शांता जी ने अहम भूमिका निभायी।
अंतिम संस्कार में छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष व वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर, दैनिक देशबंधु के स्वामी व प्रधान संपादक ललित सुरजन, प्रेस क्लब अध्यक्ष अनिल पुसदकर, सहारा चैनल के छत्तीसगढ़ ब्यूरो प्रमुख रुचिर गर्ग, छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के अध्यक्ष श्याम बैस, ब्रेवरेज कार्पोरेशन के पूर्व अध्यक्ष सच्चिदानंद उपासने, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के कुलपति सच्चिदानंद जोशी, छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के संचालक उमेश द्विवेदी, नवभारत रायपुर के पूर्व संपादक अनल शुक्ल, नई दुनिया रायपुर के महाप्रबंधक मनोज त्रिवेदी, दैनिक भास्कर के केके सिंह, दैनिक नेशनल लुक के संपादक प्रशांत शर्मा, अधिवक्ता व साहित्यकार कनक तिवारी, पत्रकार व साहित्यकार प्रभाकर चौबे, छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम के महाप्रबंधक सुभाष मिश्र, इप्टा छत्तीसगढ़ के महासचिव अरुण काठोटे सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार व गणमान्य नागरिक मौजूद थे।
(साभार : मोहल्ला लाइव )