
आज अखबार में छपे राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश में रोजाना कम से कम दस युवा असफल प्रेम के चलते जिंदगी से तौबा कर लेते हैं। ये आंकड़ा गरीबी व बेरोजगारी के कारण होने वाली खुदकुशी की घटनाओं की तुलना में कहीं ज्यादा है।
हम तब शायद 5-6 साल के थे। पड़ोस में रहने वाले 22 साल के एक नौजवान ने आत्महत्या कर ली थी। शाम का वक्त था जब उसके घर से पहली चीख गूंजी। उसके बाद तो रुदन की अनवरत धारा बह चली। हमें घर से बाहर निकलने नहीं दिया गया। रात में बाबूजी को अम्मा से कहते सुना बहुत हिकारत भरे स्वर में- “ साले को जवानी चढ़ी थी। आशिकी कर रहे थे जनाब। फिल्म देख देख कर ये लोग मुहब्बत करने लगते हैं। मां-बाप, घर द्वार सब भूलभाल कर ये किस चाह में पड़ जाते हैं कि अपना सबकुछ बौना लगने लगता है।”
वह लड़का हमारे पड़ोस में रहने वाली एक लड़की से प्रेम करता था। उनका अंतरजातीय प्रेम रास नहीं आया परिवार वालों को। बंदिशें बढ़ीं और एक दिन दोनों घर छोड़कर भाग निकले। दो तीन महीने बीते थे कि कहीं से लड़की के घर वालों को उनका ठिकाना मालूम हो गया। बताने की जरूरत नहीं कि लड़की सवर्ण् थी। जीप में भरकर उसके घरवाले गए उन्हें पकड़ने।
अगले दिन मुहल्ले के कुंए पर उस लड़की को सबके सामने नहलाया गया। मेरे मन में महिलाओं की सबसे क्रूर छवि वही है जब चार महिलाएं मिलकर कुंए पर उस लड़की की मांग में लगा सिंदूर धो रही थीं। वह चीख रही थी। चिल्ला रही थी और हर संभव प्रतिरोध कर रही थी. एक महीने बाद आननफानन में उसकी शादी कर दी गई।
‘शादी के कुछ ही दिनों बाद उसका प्रेमी लौट आया। वह बहुत उदास रहता, उसकी आंखों में देखकर लगता वहां आंसुओं की कोई नदी ठहरी हुई है । कुछ दिन बीते और उसने उसी नदी में डूबकर जान दे दी। उसने फांसी लगा ली।
तब बहुत अचरज लगता था कि कैसे कोई अजनबी आपके जीवन में इतनी गहरी पैठ बना लेता है कि आप उसके लिए जीने मरने लगते हैं। प्यार करना बहुत ग्लैमरस काम था उन दिनों। हम अपनी किशोरावस्था में उन साथियों को बड़े रश्क से देखते जिनकी अपनी गलर्फ्रैंड थीं।
हमारे लिए वे नायक थे। हम अपने आपको उनके सामने बौना महसूस करते। हम तो उनके साथ कोई खेल बिना खेले ही हार जाते थे। क्योंकि हमें पता था कि कुछ तो बात है इसमें तभी तो वह खूबसूरत सी लड़की जो मुझे देखती भी नहीं वह इसकी साइकिल पर बैठने में गुरेज नहीं करती इतना ही नहीं इसके लिए चाकलेट तक खरीदकर लाती है। अपनी पाकेट मनी के पैसे से ।
वह लड़की अब भी अपने मायके आती है। उसके दो बच्चे हैं। पता नहीं वह अपने प्रेमी के घर की ओर देखती भी है अथवा नहीं लेकिन उसकी सिक्कों सी खनखनाती हंसी की आवाज अब कभी सुनाई नहीं देती।
--