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२५ साल का इंतज़ार और नाटकनुमा न्याय


कभी-कभी लगता है की शहर भी अपने लोगों की तरह हमें कर्ज़दार बनाते हैं. आज भोपाल गैस त्रासदी पर अदालत का मज़ाकनुमा फैसला आने के बाद मुझे लग रहा है की भोपाल के गले से लिपट के रो लूँ. शायद उसका मन भी कुछ हल्का हो जाये. १५००० से ज्यादा मौतों और २५ साल के मानसिक संत्रास की सज़ा २ साल. वाह रे न्याय...

दोहराने की जरूरत नहीं की भोपाल गैस त्रासदी उन घटनाओं का नतीज़ा था जिन्हें किसी भी मोड़ पर थोड़ी चौकसी बरत के रोका जा सकता था. उसके लिए किसी खास उपकरण की जरूरत नहीं थी बस थोडा चौकन्ना मानव मस्तिष्क काफी होता.

२/३ दिसंबर की उस दरमियानी रात मौत सफ़ेद बादलों का रूप धर के जिंदादिल भोपाल की रगों में पैबस्त हुई. और शहर चुपचाप नींद में ही मौत की चादर ओढने लगा। युनियन कार्बाइड कारखाने से रिसी जहरीली मिथाइल आइसोसायनेट गैस के कारण हजारों लोग मारे गये अनेक लोग स्थायी रूप से विकलांग हो गये । भोपाल गैस त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है। उस सुबह यूनियन कार्बाइड के प्लांट नंबर ‘सी’ में हुए रिसाव से बने गैस के बादल को हवा के झोंके अपने साथ बहाकर ले जा रहे थे और लोग मौत की नींद सोते जा रहे थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार लोग मारे गये थे। हालांकि गैरसरकारी स्रोत मानते हैं कि ये संख्या करीब तीन गुना ज्यादा थी। मौतों का ये सिलसिला बरसों चलता रहा। इस दुर्घटना के शिकार लोगों की संख्या हजारों तक बतायी जाती है।

फैसले के बाद भोपाल गैस पीड़ितों का मामला उठाने वाले अब्दुल जब्बार ने कहा कि पहले औद्योगिक त्रासदी हुई और अब न्यायिक त्रासदी हो रही है। घटना के बारे में पहली पूर्व चेतावनी देने वाले पत्रकार राजकुमार केसवानी का कहना है की ये न्याय की दिशा में पहल कदम है। पर ये लापरवाही का मामला नहीं बल्कि जनसंहार का मामला है।
भोपाल शहर पर चौथाई सदी पहले बीते उस हादसे के निशाँ ढूँढने आप को बहुत दूर नहीं चलना पड़ता. बुजुर्गों के चेहरों पर, माओं आँखों में और नवजात बच्चों की किस्मत पर वारेन एंडरसन ने जो सियाही पोती थी वो जस की तस है.
भोपाल शहर में दो साल रहा। उसने सच्चे दोस्त दिए. कुछ ऐसे रिश्ते दिए जो आजीवन साथ रहने हैं. लेकिन माफ़ करना भोपाल हम तुम्हारे लिए वो नहीं कर पाए जो कर सकते थे... जो हमें करना चाहिए था.
(लेख में कुछ तथ्यात्मक बातें बीबीसी की वेबसाइट से साभार )

साए में धूप

इससे पहले की आप अपनी रोजाना की जद्दो जहद को अंतिम समझ लें.इन तस्वीरों को गौर से देखिये..ये तस्वीरें मैंने पिछले साल के जाड़ों में इंदौर से ४०-४५ किमी की दूरी पर ली थीं।



यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है

चलो यहाँ चलें और उम्रभर के लिए
न हो कमीज तो पाँवों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफर के लिए








निरुपमा के लिए

युवा पत्रकार निरुपमा पाठक की दिल दहलाने वाली हत्या ने हमारे बीच रह रहे छदम प्रगतिशीलों के नकाब उतारदिए हैं. वो अब हत्यारी कौम के पक्ष में खुल कर सामने गए हैं. वो निरुपमा की मौत को अस्पष्ट बताते हुए कानूनी पेंच को इतनी मजबूती से उठा रहे हैं जैसे की इससे बहुत फर्क पड़ने वाला है की कौन लोग उस युवा संभावना के अंत के जिम्मेदार हैं. निरुपमा पर मेरी पिछली पोस्ट पर साथी पुनीत ने कविता के रूप में एक काव्यात्मक टिप्पणी दी. मेरे कहने पर उन्होंने अपनी उस क्षणिक प्रतिक्रिया को पूरी कविता में तब्दील किया- ब्लॉगर

जयती-जयती
के नारो से
धर्म पताकाएं
लहराई ...
भूख-लूट
क्या लाती
उनको
मुद्दो की सड़को पर भला,
जो
धर्म पे लगी
आंच ले आई ....
वाह ! महान संस्था
वाह ! महान बंधनो की
रक्त मे लिपटी कथा ....
हे महान शोध की
प्रयोगशाला
के जनो ,
हे निचुड़ जाने
को तत्पर
देवीरूपी
स्तनो .....
तेरे देवालय के भीतर ,
हुआ है जो भी
आज तलक वो ,
घटा है बाहर
तो पाबंदी ?
खुले आम अब
सींग दिखाकर ,
नाच रहे है
नंगे नंदी ...
प्रेम था तेरे
सदा सनातन ,
अनंतगामी ,
धर्म का खंभा ,
प्रेम मे ठहराव
आता है !
अब ठहर गया वो
उसके भीतर
तो काहे का
तुम्हे अचंभा ....
सोच रहा हूं
मै बस इतना
पावन था वो
पल भी कितना ..
मां ने आंचल मे
जब अपने
लेकर के
दम घोटा होगा ...
मालूम हुआ होगा
उसको ये ,
कि परिवारो
के बरगद का
तना
खोखला
सड़ा था कितना ...
उसके गर्भ मे
रखा था जो कुछ
सबके दिल से
बड़ा था कितना
...

निरूपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं

सोचा नहीं था कि नए लैपटाप पर कुछ लिखते हुए इस तरह हाथ कांपेगा। 29 अप्रैल 2010 वो तारीख थी जिस दिन निरूपमा पाठक नामक एक युवा सपने का असामयिक अंत हुआ था। वो भी किसके हाथों! उसके घरवालों ने उसकी महज इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वह एक लड़के से शादी करना चाहती थी जो विजातीय था। यह कोई छोटा अपराध नहीं था। परिवार की इज्जत बचाने के लिए इतनी कुबार्नी तो दी ही जा सकती है।

फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह अपने परिवार से बेइंतहा प्यार करती थी। जैसा कि उसने अपनी सोशल नेटवर्किंग आईडी पर भी लिख रखा है। वो आई डी जो कभी दोस्तों से मन की बातें साझा करने का जरिया हुआ करती थी अब आरआईपी के संदेशों से अटी पड़ी है लेकिन निरुपमा अब उस पर कभी लाग इन नहीं करेगी। अब उसे पुलिस खंगालेगी। तलाशे जाएंगे कातिल, उस हत्या के सुराग जिसके बारे में सबको पता है कि वो किसने की है।

निरुपमा अगर मीडियाकर्मी न होती तो शायद उसकी मौत भी देश में रोज होने वाली हजारों मौतों की तरह गुम हो जाती। लेकिन उसके साथियों ने ये नहीं होने दिया। ये सोच कर ही नफरत सी होती है कि हम एक हत्यारे समाज में रह रहे हैं। अपने आसपास ही नजर डालकर देखने की जरूरत है, आखिर कितने लोग हैं जो इस घटना के खिलाफ आवाज उठाने को तैयार हैं। उंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद लोगों के अलावा हमारा प्रतिनिधि समाज हत्यारों के साथ है। निरुपमा की हत्या के बाद उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर जिस तरह के घपले रोज सामने आ रहे हैं डर है कि कहीं यह मामला भी आरुषि हत्याकांड की तरह जांच के अनवरत सिलसिले में न बदल जाए। वैसे भी काश एक निरूपमा, एक रूचिका या एक जेसिका को न्याय मिल जाना इस बात की गारंटी हो पाता कि हमें भविष्य में इस तरह की घटना से दो चार नहीं होना पड़ेगा।

निरूपमा की मौत का बोझ कैसे उठाओगे प्रियभांशु

टीवी पर यह कहकर कि तुम्हें निरुपमा के प्रेग्नेंट होने के बारे में कुछ भी पता नहीं था तुमने न केवल अपने प्रेम को लांक्षित किया बल्कि अपनी मर चुकी प्रेमिका को भी कठघरे में खड़ा किया है। हम कैसे मान लें कि तीन महीने का गर्भ पालने का निर्णय उसका खुद का रहा होगा प्रियभांशु। क्या उसने तुम्हें इस बारे में कुछ नहीं बताया था। फिर वो कौन सी मजबूरी है जो तुम्हें साहस के साथ सच को स्वीकारने का हौसला नहीं दे रही कि निरुपमा की कोख में तुम्हारे प्यार का अंश था।

निरूपमा की हत्या दो दिन बाद से ही तुम्हारे खिलाफ तथाकथित शुचितावादी लोगों ने मोर्चा खोल दिया था। बिना तुमसे बात किये, तुम्हारा पक्ष जाने लोगों ने दोषी करार दे दिया। तुम्हें एक खूबसूरत टैलेंटेड लड़की को अपनी प्रेमिका बनाकर दोस्तों के बीच रुआब गांठने वाली फितरत का कायर घोषित कर दिया। लेकिन प्रियभांशु तुम क्यों उन लोगों को सही ठहराने पर उतारू हो। तुमने क्यों इतने विपरीत हालात में उसे अकेली मरने के लिए हत्यारों के बीच भेज दिया। उसके लगातार आ रहे एसएमएस ने तुम्हें कोई आभास नहीं दिया कि उसके साथ क्या कुछ हो सकता है। तुम उसकी मौत का बोझ कैसे उठाओगे ।

टीवी पर निरुपमा के भाई का चेहरा फिल्म एलएसडी की पहली कहानी की नायिका श्रुति के भाई से हूबहू मिलता है। या शायद मुझे ही ऐसा लगा। जिस बच्ची को पालपोस कर इतना बड़ा किया उसका दम घोंटते हुए हाथ उसकी मां के हों या उसके भाइयों या बाप के अब कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी आंखों में अब भी अपने परिवार की इज्जत बचा ले जाने का अभिमान साफ पढ़ा जा सकता है।

निरुपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं हैं। क्योंकि इस विकल्पहीन समय में हम अब भी तुम्हारे हत्यारों के साथ रहेंगे। स्थानीय पुलिस भी तुम्हारे इज्जतदार परिवार का ही साथ देगी शायद और तुम्हारी मौत का कोई निशाँ बाकी नहीं रह जाएगा लोगों के जेहन में। कोर्ट ने तुम्हारी मां को तीन दिन के लिए पैरोल पर छोड़ा है जानती हो क्यों! ताकि वो तुम्हारे अंतिम संस्कार में शामिल हो सके।

नोट: अभी पोस्ट लिखने के दौरान ही टीवी पर खबर आई है कि निरुपमा की मां की याचिका पर प्रियभांशु के खिलाफ शादी का झांसा देकर उसका यौन शोषण करने का मामला दर्ज करने का आदेश कोर्ट ने दे दिया है। अब हमें इंतज़ार करना चाहिए सुप्रीम कोर्ट की किसी नयी व्यवस्था का जिसमें शायद वो गहरे प्रेम करने वाले लोगों को शारीरिक निकटता से बचने का कोई मार्ग सुझाएगा। वर्ना कौन जाने कल को उनका हश्र भी प्रियाभांशु जैसा हो....

अथ श्री महाकाल दर्शन कथा



धरम-करम में हालांकि अपनी कोई आस्था नहीं है लेकिन मां बाबूजी खासकर मां बहुत अधिक धार्मिक प्रवृत्ति की है। सो शुक्रवार को उन्हें लेकर महाकाल की नगरी उज्जैन गया था। पता नहीं क्यों बचपन से हर बार ऐसा हुआ है कि जब भी किसी धार्मिक स्थान पर गया हूं विरक्ति थोड़ी ओर बढ़ गई है। मंदिर में प्रवेश के समय हम खुश थे भीड़ बिल्कुल नहीं थी और हम जल्दी ही गर्भगृह के द्वार पर थे। उम्मीद नहीं थी कि इतनी आसानी से दर्शन हो जाएंगे लेकिन जल्द ही अपनी गल्ती का अंदाजा हो गया। गर्भगृह से ऐन पहले हमें रोक दिया गया। वहां ड्यूटी कर रहे सिपाही ने प्रवेश द्वार पर रस्सी लगा दी । क्या तो अभी थोड़ी देर दर्शन नहीं हो सकेंगे।
भाई साहब 10 मिनट बीते, 20 मिनट बीते। सामने लगी स्क्रीन पर दिख रहा है पूजा चल रही है। अंदर। सिपाही जी से फिर पूछा, जवाब मिला अभी अंदर भीड़ है छंटते ही आपको अंदर भेज दिया जाएगा। मां की तबियत खराब रहती है उसे अस्थमा की शिकायत है। वह बेचारी हैरान परेशां घुटनों पर झुकी इंतज़ार कर रही है की प्रभु सुध लें उसकी । एक घंटा होने को था लगा कि उसे लेकर वापस बाहर निकल जाऊं, वापस पीछे मुड़कर क्या देखता हूं कि जहां तक नजर जा सकती है वहां तक लोगों की कतार लगी है। वापस लौटना मुमकिन नहीं।
सामने लगी स्क्रीन पर नजरे गड़ाए हम खड़े थे। तभी टीवी स्क्रीन पर नजर गई कोई जाना पहचाना सा चेहरा है। मैंने मेटल डिटेक्टर लेकर खड़े सिपाहीजी से पूछा ये कौन है। सिपाही भटभटाकर बोला- सुधांशु जी महाराज अंदर पूजा कर रहे हैं।
बात इस तरह खुली कि सुधांशु जी महाराज की विशेष पूजा की कीमत मैं मेरी मां और कई अन्य श्रद्धालु चुका रहे हैं। स्क्रीन पर पूजा चल रही है। सुधांशु जी महाराज अभिषेक कर रहे हैं। दूध मक्खन और जाने क्या क्या अर्पित कर रहे हैं। मंदिर के सारे पुजारी उनकी सेवा टहल में लगे हैं। बाहर खड़े लोगों का इंतजार गुस्से में बदल रहा था।
लगा कि अब लोग रस्सी तोड़कर घुस ही जाएंगे लेकिन तभी ड्यूटी कर रहे सिपाही ने गजब का क्राइसिस मैनेजमेंट किया। अचानक उसके अंदर स्वामी झांसाराम की आत्मा प्रवेश कर गई। वह उसकी आवाज मे 100 किलो चीनी घुल गई। अगली कुछ लाइनें झांसाराम की जुबानी सुनिए
- ये संसार मिथ्या है। केवल ईष्वर ही सत्य है। तन पवित्र सेवा किए धन पवित्र किए दान, मन पवित्र हरिभजन से हो एहि विधि कल्याण।
भक्तों ये तन जो मिट्टी का बना है---
एक और बानगी- बोलो महाकाल की जय, सीता मैया की जय, श्रीरामचंद्र की जय, हनुमान की जय, और बोलो बोलो सुधांशु जी महाराज की जय---

अब बोलो क्या बोलते हो सुधांषू जी महाराज को।
खैर सुधांशु जी महाराज की पूजा खतम हुई और वे पुजारियों को 1000-1000 रुपये के नोट बांटकर बाहर निकले। और हम भक्तों का भी कल्याण हुआ...
शेष फिर कभी ...

तीस मिनट का वजन कितना होता है...



यह जानकारी क्या रूह को कंपा देने के लिए काफी नहीं है कि देश में औसतन हर तीस मिनट पर एक किसान आत्महत्या कर रहा है। तीस मिनट कितना समय होता है लगभग उतना जितना मैं शायद अक्सर अपने दोस्त से मोबाइल पर बात करने में बिता देता हूं या फिर आफिस की कैंटीन में चाय पीते हुए... वो तीस मिनट जिसमें एक किसान आत्महत्या कर लेता है या फिर उसके आसपास के कुछ और मिनट कितने भारी होते होंगे उस एक शख्स के लिए। क्या उस समय उसके दिमाब पर पड़ रहे बोझ के वजन को मापने के लिए कोई पैमाना है?

मौत के बारे में आंकड़ों में बात करना चीजों को थोड़ा आसान कर देता है। जैसे हैती में भूकंप से लाखों मरे, मुंबई हमले में 218 या फिर देश में 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्या की। ऐसा लगता हैयह किसी प्लाज्मा टीवी के निहायत किफायती माडल की कीमत है 16196 रुपये मात्र। दरअसल यह अश्लील आंकड़ा भी अखबार के उसी पन्ने पर छपा है जिसमें गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर सोनी के लैपटाप पर 12000 रुपये की छूट का विज्ञापन है। ये अखबार वालों को क्या होता जा रहा है?

किसी को ऐसा भी लग सकता है कि चलो देश की आबादी तो डेढ़ अरब पहुंच रही है 16000 मर भी गए तो क्या फर्क पड़ता है। छुट्टी करो यार.

आंकड़ों से थोड़ा और खेला जाए, हूं... लीजिए जनाब 1997 से अब तक देश में तकरीबन 2 लाख किसान आत्महत्या कर चुके। बिलकुल ठीक ठीक गिनें तो 199,132 । 2 लाख यह संख्या किस जुबानी मुहावरे के करीब है???? हां याद आया 2 लाख यानी टाटा की दो लखटकिया कारें। अकेले महाराष्ट्र में बीते 12 सालों में सर्वाधिक 41,404 किसानों ने आत्महत्या की है यह तो संख्या तो एक हीरोहोंडा स्प्लेंडर मोटरसाइकिल की कीमत से भी कम है। क्या यार ??? इन किसानों को हुआ क्या है कोई समझाओ भाई!

(आंकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो और हिन्दू में प्रकाशित पी साईनाथ के लेख से)


दो संसार


ये कविता मिथिलेश ने लिखी है मेरे साथ इंदौर भास्कर में सेवारत हैं. मिथिलेश खेल डेस्क पर हैं

जहाँ मैं रहता हूँ
वहीँ पास में एक नाला बहता है
नाले के पार एक अलग है दुनिया बसती है
इस पार से एकदम जुदा

इस पार घर नहीं हैं
बंगले हैं
बड़ी कारें हैं
लान हैं
रोज धुलने वाली चहारदीवारी है

नाले के उस पार भी
घर तो नहीं हैं
झोपड़ियाँ हैं एक दूसरे से लगी हुई
लान तो छोडिये
गमले भी नदारद हैं
रखी हैं साइकिल
पास ही एक हाथ ठेला खड़ा है
वह दिन में दुकानदारी के काम आता है
और रात में उसपर
एक दंपत्ति सो जाते हैं
मैं इसे देखने का अभ्यस्त हो गया हूँ

फर्क दीखता है
इस पार और उस पार में

इसपार लोगों के घर इतने ऊंचे हैं की
ऊपर वाले नीचे वालों को जानाते है नहीं
लेकिन दोनों के बीच एक पुल है
जिसे पार कर रोज आती है
सुमी
बर्तन पोंछा करने
उसे रहती है दोनों संसारों की खबर