इलास्टिक व एक अन्य कविता

पुनीत की दो कविताएं इलास्टिक घूम रहा है अब भी:
उनका परिचय मेरे ब्लाग पर यहां पढ़ें

होते है कई तरह के
रिश्तो के बंधन
कुछ सूत से कच्चे
ज़रा सी हरकत , टूट गए
कुछ लोहे से मज़बूत
जोर लगाओ , पंख पसारो
फर्क नहीं कुछ पड़ता है
हमारा रिश्ता
बंधन है इलास्टिक का
अब न जाने कौन जा रहा है दूर
खिंच रहा है कुछ
गर अब तुमने छोड़ा
मैं सहूंगा
मैंने छोड़ा
तुम सहोगी
और सोचो गर ये टूट गया तो
सहेंगे दोनों
अब कुछ यूँ किया जाए
पास आकर
इस तनाव को कुछ कम किया जाए
इस तरह रहेंगे
सलामत
मैं , तुम
और
इलास्टिक भी




घूम रहा है अब भी


पहिया
युद्ध को जाती
सेना के एक रथ का टूट गया
जगह ले ली
किसी दुसरे पहिये ने उसकी
दूर कही से
किसी ने देखा
उस पहिये को
पास गया कुछ पोछा-झाड़ा
घर ले जाकर ठीक किया
आगन में ले जाकर उसको
रखकर आड़ा
उस पर मिटटी के एक लोंदे को रखकर
उसे घुमाया
घूम रहा है अब भी
पहिया

4 comments:

संजय भास्कर ने कहा…

मैं सहूंगा
मैंने छोड़ा
तुम सहोगी
और सोचो गर ये टूट गया तो
सहेंगे दोनों
अब कुछ यूँ किया जाए
पास आकर
इस तनाव को कुछ कम किया जाए



इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

Udan Tashtari ने कहा…

दोनों रचनायें बहुत प्रभावी.

शशिभूषण ने कहा…

दोनों कविताएँ अच्छी लगीं.

Puneet ने कहा…

बहुत दिनो बाद इस ब्लाग पर आने का मौका मिला...
आपके जवाबो के लिए .... धन्यवाद्