केदारनाथ सिंह की दो कविताएं


तीसरे सप्तक के कवि, आलोचक और चिंतक प्रोफेसर केदारनाथ सिंह को हिंदी अकादमी द्वारा 2009-10 के लिए प्रतिष्ठित शलाका सम्मान देने की घोषणा की गई है। बनारस हिंदू विशविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने यहीं से पीएचडी की उपाधि हासिल की। उत्तरप्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में जन्में केदार जी की कुछ प्रमुख कृतियां हैं- अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर आैर अन्य कविताएं, बाघ, ताल्सताय आैर साइकिल

पेश हैं केदारनाथ जी की दो रचनाएं जो मुझे पसंद हैं-

बनारस
इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन

तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़

इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घनटे
शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाँव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है

आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्‍यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं भी है

जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्‍थंभ के
जो नहीं है उसे थामें है
राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्‍थंभ
आग के स्‍थंभ
और पानी के स्‍थंभ
धुऍं के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्‍थंभ

किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर

सार्त्र की कब्र पर

सैकड़ों सोई हुई क़ब्रों के बीच
वह अकेली क़ब्र थी
जो ज़िन्दा थी
कोई अभी-अभी गया था
एक ताज़ा फूलों का गुच्छा रखकर
कल के मुरझाए हुए फूलों की
बगल में

एक लाल फूल के नीचे
मैट्रो का एक पीला-सा टिकट भी पड़ा था
उतना ही ताज़ा
मेरी गाइड ने हँसते हुए कहा--
वापसी का टिकट है
कोई पुरानी मित्र रख गई होगी
कि नींद से उठो
तो आ जाना!

मुझे लगा
अस्तित्व का यह भी एक रंग है
न होने के बाद!

होते यदि सार्त्र
क्या कहते इस पर--
सोचता हुआ होटल लौट रहा था मैं

7 comments:

सागर ने कहा…

आज तो अखबार से लेकर ब्लॉग तक केदारनाथ जी छाए हुए हैं.... लेकिन आपने कुछ अलग फ्लेवर दिया... शुक्रिया...

शरद कोकास ने कहा…

केदार जी की यह कवितायें मुझे भी पसन्द है । यह सन्योग ही है कल मैने भी ब्लॉग पर केदार जी की हाथ वाली कविता दी थी और आज यह सुसमाचार मिला । केदार जी को बधाई ।

शशिभूषण ने कहा…

बड़ी सघन अनुभूतियाँ हैं दोनों कविताओं मे.
मेरी भी बधाई.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

क्या 'कमेन्ट' करूँ !
'' समुझि मनहिं रहिये '' ! आभार !

anand pandey ने कहा…

Sandeep ... dhanyawaad, Kedarnath Sinhji ki kavitaaon ke liye... Banaras ka aisa chitran, kavita mein, shaayad hee kisi aur ne kiya ho... maine apne blog mein issE share kiya hai, aasha hai aap mujhe iski anumati denge... Fir se dhanyawaad.

संदीप पाण्डेय ने कहा…

आनंद जी ये कविता है ही इतनी शानदार, पूर्वांचल का होने के नाते बनारस से गहरा नाता है मेरा। आपने केदारनाथ जी की यह कविता अपने ब्लाग पर लगाई उसके लिए धन्यवाद।

संजय भास्कर ने कहा…

आनंद जी ये कविता है ही इतनी शानदार, पूर्वांचल का होने के नाते बनारस से गहरा नाता है