कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

वकील करो

वकील करो-
अपने हक के लिए लड़ो |
नहीं तो जाओ
मरो |

2

रटो, ऊँचे स्वर में,
बातें ऊँची-ऊँची
न सही दैनिक पत्रों से लेकर,
खादी के उजले मंचों से
दिन के,
तो रेस्तराओं-गोष्ठियों में ही
उन्हें सुनाते पाये जाओ,
बड़े-बड़े नेताओं के नाम
गाते पाए जाओ!

फिर
हो अगर हिम्मत तो
डटो : यानी-के चोर बाजार में
अपनी साख
जमाओ |

खिलाओ हज़ारों, तो
लाखों कमाओ!
और क्या, हाँ, फिर
सट्टे-फ़स्ट क्लास होटेल-
ठेके-या कि एलेक्शन में
पूंजी लगाओ,
और दो... ‘बड़े-बड़ों’ के बीच में बैठकर...
शान से मूँछों पर ताव!
हाँ, कानी उँगली पे अपनी गाँधी-टोपी
नचाए, नचाए, नचाए जाओ!

3

और आर्ट-
क्या है ? औरत
की जवानी के
सौ बहाने : उसके
सौ
‘फ़ॉर्म’:
जो उसपे झूमे, अदा करो
वही पार्ट :
-इसका भी एक बाज़ार है
समझे न ?

ब्यूटी मार्ट |
इसके माने:
नये से नये मरोड़
दो
रंगों को अंगों को
जिस्म-सी
फिसलती
लाइनों को
सीने में घुलते
शेडों को |

इसमें भी, खोजो तो,
गहरे से गहरे
आदिम
नशों का तोड़
है,
समझे इस कला की
फ़िलासफ़ी?
इसी शराब के
दौर चलाओ,
और ‘आगे’
और ‘आगे’
और ‘आगे’
जाओ
-जाओ !

और देश को ले जाओ
(पता नहीं कहाँ !)

समझे, मेरे
अत्याधुनिक भाई ? !

(- शमशेर बहादुर सिंह)

हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही जा रही है


हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी
और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो
वरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहीं
और मारे जाओगे

हँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो
सब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त होकर
एक अपनापे की हँसी हँसते हो
जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाए

जितनी देर ऊंचा गोल गुंबद गूंजता रहे, उतनी देर
तुम बोल सकते हो अपने से
गूंज थमते थमते फिर हँसना
क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फंसे
अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे

हँसो पर चुटकलों से बचो
उनमें शब्द हैं
कहीं उनमें अर्थ न हो जो किसी ने सौ साल साल पहले दिए हों

बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे
और ऐसे मौकों पर हँसो
जो कि अनिवार्य हों
जैसे ग़रीब पर किसी ताक़तवर की मार
जहां कोई कुछ कर नहीं सकता
उस ग़रीब के सिवाय
और वह भी अकसर हँसता है

हँसो हँसो जल्दी हँसो
इसके पहले कि वह चले जाएं
उनसे हाथ मिलाते हुए
नज़रें नीची किए
उसको याद दिलाते हुए हँसो
कि तुम कल भी हँसे थे !

-रघुवीर सहाय

स्त्रियां

पढ़ा गया हमें
जैसे पढ़ा जाता है कागज
बच्चों की फटी कापियों का
चनाजोर गरम के लिफाफे बनाने के पहले!
देखा गया हमको जैसे कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलसुबह अलार्म बजने के बाद!
सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर ठसाठस ठुंसी हुई बस में!
भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिशतेदारों के
दुख की तरह!
एक दिन हमने कहा
हम भी इंसान हैं-
हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बीए के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन!
देखो तो एसे
जैसे ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग!
सुनो हमें अनहद की तरह
समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा!
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृशय टहनी से
टिडियां उड़ीं और रंगीन अफवाहें
चीखती हुई चीं चीं
दुष्चरित्र महिलाएं-दुष्चरित्र महिलाएं
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैली
अगरधत्त जंगली लताएं!
खाती-पीतीं सुख से उबी
बेकार बेचैन आवारा महिलाओं का ही
शगल हैं ये कहानियां और कविताएं
फिर ये इन्होंने थोड़े ही लिखी हैं!
(कनखियां इशारे फिर कनखी)
बाकी कहानी बस कनखी है।
हे परमपिताओं, परत पुरुषों
बख्शो बख्शो अब हमें बख्शो
-अनामिका

दुख पालने वाली लड़की



रुलाई धुलाई छोड़कर इधर थोड़ा बैठो
एक एक कर खोलो दुख की पोटली..
दिखाओ अपने छुपाए हुए जख्मों को
कितने दिनों मे ये कितने गहरे हुए

ऐ लड़की सुन रही हो!

बाहर जरा फैला दो यह सब
दुख तुम्हारे बिल्कुल भीग गए हैं
हवा में होती है एक विलक्षण खासियत
कुछ दुखों को उड़ा देती है खुद-ब-खुद

अरे सुन तो रही हो!

दिन!
दिन तो गुजरेंगे ही! दुख पालने वाली लड़की!
सुखने दो सीलन भरी ये जिंदगी
धूप की पीठ पर रोशनी की उमड़ती बाढ़ है
देखो, नाच रहा है सघन वन...

साथ में सुखी हिरन।

ऐ लड़की हंसो,
खुद को देखो गौर से, खुद को प्यार करो

-तसलीमा नसरीन
(कल अंतरराष्ट्रय महिला दिवस है।)
तस्वीर- गूगल से

अधिनायक


इस गणतंत्र दिवस पर मेरे प्रिय कवि रघुवीर सहाय की कविता अधिनायक आप लोगों के लिए

राष्ट्रगीत में भला कौन

वह भारत-भाग्य-विधाता है

फटा सुथन्ना पहने जिसका

गुन हरचरना गाता है।

मखमल टमटम बल्लम तुरही

पगड़ी छत्र चंवर के साथ

तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।

पूरब-पश्चिम से आते

हैं नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,

उनकेतमगे कौन लगाता है।

कौन-कौन है वह जन-गण-मन

अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है

दो संसार


ये कविता मिथिलेश ने लिखी है मेरे साथ इंदौर भास्कर में सेवारत हैं. मिथिलेश खेल डेस्क पर हैं

जहाँ मैं रहता हूँ
वहीँ पास में एक नाला बहता है
नाले के पार एक अलग है दुनिया बसती है
इस पार से एकदम जुदा

इस पार घर नहीं हैं
बंगले हैं
बड़ी कारें हैं
लान हैं
रोज धुलने वाली चहारदीवारी है

नाले के उस पार भी
घर तो नहीं हैं
झोपड़ियाँ हैं एक दूसरे से लगी हुई
लान तो छोडिये
गमले भी नदारद हैं
रखी हैं साइकिल
पास ही एक हाथ ठेला खड़ा है
वह दिन में दुकानदारी के काम आता है
और रात में उसपर
एक दंपत्ति सो जाते हैं
मैं इसे देखने का अभ्यस्त हो गया हूँ

फर्क दीखता है
इस पार और उस पार में

इसपार लोगों के घर इतने ऊंचे हैं की
ऊपर वाले नीचे वालों को जानाते है नहीं
लेकिन दोनों के बीच एक पुल है
जिसे पार कर रोज आती है
सुमी
बर्तन पोंछा करने
उसे रहती है दोनों संसारों की खबर