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मैं सीधी हूँ

श्री यूकेएस चौहान केरल कैडर के आई ऐ एस है और मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहेने वाले हैं केरल में लंबा अरसा गुजारने के बाद दिल्ली लौटे हैं और इस समय नाफेड के एम् डी हैं 
कला और साहित्य में आप की गहरी रूचि और पकड़ है. केरल में अपने कार्यकाल के दौरान आपने मलयाली सीखी और प्रसिद्ध मलयाली कवि उत्तप्पम की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद भी किया जो ज्ञानपीठ से आ रहा है. श्री चौहान पंडित प्रदीप, गुलजार जैसे प्रसिद्ध कवियों गीतकारों के केरल में आयोजित कार्यकमों के दौरान उनकी रचनाओं का मलयाली अनुवाद श्रोताओं को साथ-साथ सुनाते रहे हैं . ..... हाल ही में चुनाव के सिलसिले में वे सीधी गए थे जहाँ उन्होंने ये कविता लिखी............




हंसो कैमूर मेरी दुर्दशा पर
 
क्योंकि मैं सीधी हूँ
 
पडी हूँ लाचार  
 
तुम्हारे विस्तृत आँचल का पल्लू थामे
 
त्यक्ता सुहागन सी
 
भोग कर छोड़ दी गयी हूँ 
 
टुकडा टुकडा दरकने के लिए  

तुम्हारे उन्नत ललाट पर 

हमेशा सिन्दूर मलते रही रेवा नरेश
 
मेरी पथरीली छाती पर

 बेधड़क दौड़ती हैं  

धनपतियों की लम्बी गाडियां  

सूखती जा रही हैं

बनास व सोन की जलधाराएँ  

मेरी कोख से  

निकाला जा रहा है  

बलात मेरा सत्व  

काट दी गयी मेरी कमर भी

अलाग हुई सिंगरौली  

जैसे लुट गयी मेरी खजानों भरी करधनी  

मैं सीधी हूँ न  

इसलिए सब कुछ सहती जाती हूँ चुपचाप  

मुझे अपने जैसा टेढा बनाकर  

तन कर खड़े होने का साहस कब दोगे कैमूर

चित्र गूगल से साभार