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प्रभाष जी का जनसत्ता सही मायनों में जनतंत्र की प्रयोगशाला ( खंड 3)

प्रभाष जोशी को गुजरे कुछ दिन बीत गए हैं टीवी चैनल बनने की होड़ में शामिल हमारे कुछ साथी अपनी हिटृस व टीआरपी बढने के लिए विवादों की अपनी दुकान दोबारा सजा कर बैठ गए हैं। बहरहाल हम अपने ब्लाग पर प्रभाष जी को अपने साथियों की नजर से याद कर रहे हें इस कड़ी में प्रस्तुत है हमारे साथी अजीत कुमार के आलेख का तीसार भाग-संदीप


लोकतंत्र में लोक को लेकर रधुवीर सहाय की ये पंक्तियां बेतरह याद आ रही है। राष्टगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है, फटा सुथन्ना पहने जिसका गुण हरचरना गाता है। लेकिन लोक के ही तंत्र में लोक की इस हास्यास्पद स्थिति को प्रभाष जोशी कैसे गवारा कर सकते थे। सो उन्होंने फटा सुथन्ना पहनने वाले उस लोक को सही अर्थों में भारत का भाग्य विधाता बनाने का बीडा उठाया। और इसके लिए उन्होंने पत्रकारिता को अपनाया, क्योंकि लोक की आवाज को बुलंद करने का इससे बढकर और कोई जरिया हो ही नहीं सकता था। प्रभाष जी के व्यक्तित्व का बुनाव कैंब्रिज, आॅक्सफोर्ड या दून स्कूल में नहीं हुआ था। अगर होता तो शायद ही प्रभाष जी का यह व्यक्तित्व हमारे सामने होता। उनके व्यक्तित्त्व की बुनाई और गढाई तो नर्मदा मैया की गोद में और मालवा के खेतों, खलिहानों में हुई थी।

रधुवीर सहाय के जन उनके हमजोली रहे। तभी तो ताउम्र उसी जन की पक्षधरता में वे चट्टान की तरह अडिग नजर आए। आािखर प्रभाष जी पत्रकारिता में आए ही थे भारत भाग्य विधाता की आवाज बनकर उसका तकदीर संवारने के लिए। उसका वाजिब हक दिलाने के लिए। लेकिन उस समय की हिंदी प़त्रकारिता में न तो उस लोक से बतियाने की भाषा थी न शिल्प था। तभी तो पत्रकारिता प्रभाष जी के लिए ताउम्र मिशन बनकर रहा लोक की प्रतिष्टा को स्थापित करने का। इस बाबत उन्होंने भाषा और शिल्प के साथ साथ घिसे पिटे तमाम पत्रकारिक रूढियों और लग्गीबंधी को बदल डाला। प्रभाष जी की जनसत्ता से पहले हिंदी में ऐसा कोई दैनिक समाचार पत्र नहीं था जो सही मायने में लोक की भाषा, शिल्प और संवेदना का प्रतिनिधित्व करता हो। आखिर प्रभाष जी से पहले दैनिक हिंदी पत्रकारिता की न तो कोई अपनी भाषा थी न शिल्प और न कोई मुहावरा। अब आप ही बताइए जिस भाषा की पत्रकारिता का न तो कोई अपना शिल्प हो और न भाषा वह खाक जन सरोकार या संवदेना की बात कर सकती है।
वे लोग जो भाषा और शिल्प के नाम पर किसी भी तरह की नैतिकता की खिल्ली उडाने से बाज नहीं आते को मैं स्पष्ट बता दूं कि भाषा इंसान का सबसे बडा आविष्कार है और संवेदना और सरोकारों की अभिव्यक्ति के लिए शिल्प और भाषा के स्तर पर जादुई प्रयोग की अपेक्षा की जाती है। जादुई प्रयोग कभी जटिलता से नहीं आते शौकिया तौर पर व्याकरण तोडने से भी नहीं आते। बल्कि आते है अपन के विशिष्टानुभव की बिना पर। लेकिन कूडा फैलाने, फेंटने और मनचलेपन की बिना पर कोई भाषा और शिल्प का जादूगर नहीं बन सकता। पत्रकारिता से हटकर थोडा साहित्य में झांक लें तो भाषा और शिल्प का यह जादुई प्रयोग आपको प्रेमचंद निराला, मुक्तिबोध और निर्मल वर्मा के यहां मिलेगा। वहीं पत्रकारिता के लिए ठीक ऐसा ही काम किया राजेंद्र माथुर, शरद जोशी और प्रभाष जोशी जैसे लोगंेा ने। इन सबों ने हिंदी पत्रकारिता की भाषा को न सिर्फ जिंदगी प्रदान की बल्कि आम लोगों के दुख दर्द को आवाज देने लायक बनाया। तभी तो मैं कहता हूं जनसत्ता प्रभाष जी के लिए सिर्फ दैनिक समाचार पत्र नहीं बल्कि लोक की प्रतिष्ठा स्थापित करने के मिशन का प्रयोगशाला रहा।
पत्रकारिता को लेकर उनका युगांतकारी प्रयोग हिंदी दैनिक जनसत्ता के रूप में सामने आया। इस पत्र के माध्यम से प्रभाष जी पूरे देश को एक सूत्र में जोडने के लिए प्रयासरत रहे। भाषा, क्षेत्र, रंग, और रूप यानी कहें तो बहुलता और सामासिकता को लेकर उनकी समन्वयवादिता अप्रतिम थी। अपने पत्र को उन्होंने कभी भी प्रचार और एकालाप का जरिया बनने नहीं दिया। देश की एकता, अखंडता और सधीय ढांचे को अतिक्रमित करने वाले विचारों का उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से जमकर विरोध किया। दूसरी तरफ हाशिए पर की आवाजों को भी एक प्रखर सबाल्टर्न की तरह मुख्यधारा में शामिल करने के लिए जद्दोजहद करते रहे।
प्रभाष जी की मेहनत और लगन के चलते जनसत्ता देखते ही देखते मानवीय सरोकारों का मुखपत्र बन गया। समाचारों की सत्यता और निष्पक्षता को लेकर पाठकों का जितना विश्वास जनसत्ता जीतने में सफल रहा, शायद ही हिंदी के किसी दूसरे अखबार को ऐसी उपलब्धि कभी हासिल हुई हो। राजनीति, कला, साहित्य, खेल और व्यापार मामलों के शीर्षस्थ जानकार भी प्रभाष जी के प्रयास के वलते ही जनसत्ता से संबद्व हुए। हिंदी का यह पहला समाचार पत्र बना जिसे बौद्विक और आम जनों के बीच एकसमान लोकप्रियता हासिल हुई। कला, राजनीति, साहित्य और अन्य विषयों को लकर संवाद शुरू करने के मामले में जनसत्ता हमेशा आगे रहा। और संवाद के लिए प्रभाष जी ने हर तरह के परस्पर विरोधी विचारों को आमंत्रित किया।
देश के कई शीर्ष टिप्पणीकार और कला समीक्षक तो आजतक जनसत्ता से जुडे हुए हैं। शास्त्रीय संगीत, चित्रकला, रंगमंच और गंभीर फिल्मों पर तो आज भी जनसत्ता का कवरेज अंग्रेजी सहित किसी अन्य भारतीय भाषा के समाचार पत्रों की तुलना में काफी बेहतर है। कुल मिलाकर कहें तो जनतंत्र के चैथे स्तंभ की भूमिका के निवेहन में न तो प्रभाष जी और न उनकी जनसत्ता कभी पीछे रही। प्रभाष जी इस जहांने फानी से कूच कर गए हैं लेकिन जनसत्ता को देखकर ऐसा नहीं लगता। क्या जनसत्ता से प्रभाष जी कभी विरत हो सकते हैं-------।