अबू आजमी को हीरो मत बनाओ

आज प्रभाष जी नहीं हैं, न कागद कारे जैसा स्तंभ है। उनके रहते हुए लगा ही नहीं कि लिखूं , क्योंकि उन्हें पढकर लगता था मेरी सारी बातें उन्होंने लिख दी हैं. आज उनके नहीं होने के बाद अपने अंदर की बात कहीं पढने को नहीं है सो खुद ही लिखने को मजबूर हूं।
-अजीत कुमार

महाराष्ट विधानसभा में जो भी हुआ उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम होगी। लेकिन भर्त्सना को लेकर हिंदी पत्रों और चैनलों में जिस तरह की गैर जबावदेह और अपरिपक्व तत्परता देखी गई। वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए किसी भी सूरत से विवेक सम्मत नहीं है। कुछेक अखबारों और चैनलों को छोड दिया जाए तो ज्यादातर अखबार और समाचार चैनल अबू आजमी को ऐसे पेश करते दिखे मानोे वह हिंदी और हिंदी पट्टी के मान सम्मान का रखवाला हो। जहां तक महाराष्ट नवनिर्माण सेना और राज ठाकरे की बात है, इन सबों पर हिंदी अखबारों और चैनलों ने इतना कुछ लिख और बोल दिया है कि अब कुछ बचा भी नहीं है।

आखिर गाली देने की भी सीमा होती है। और गाली देना वैसे भी अपनी आदत में नहीं रही है। मुझसे पूछा जाए तो गाली के लिए पत्रकारिता क्या कहीं भी कोई जगह नहींे होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से राज ठाकरे को लेकर हिंदी पत्रों का रवैया गरियाने तक ही सीमित रहा है। एक बात मैं पूछता हूं कि क्या अबू आजमी हिंदी के मान सम्मान के संरक्षक हो सकते हैं। क्या प्रेमचंद और निर्मल वर्मा की हिंदी इतनी गरीब है कि वह इन छिटपुट वाकयातों को लेकर अपमानित हो जाएगी।

मेरे साथियों ,आम जनों की अपेक्षा पत्रकारों से ज्यादा विवेक और जबावदेही की अपेक्षा की जाती है लेकिन अबू आजमी के साथ हिंदी की इज्जत को जोडना कौन सी जिम्मेदारी है। आखिर अबू आजमी का हिंदी का मान सम्मान बढाने में क्या योगदान रहा है। कौन नहीं जानता कि विघटनकारी राजनीति की बिना पर ही आज वे विधानसभा तक पहुंचने में सफल रहे हैं। अब आप ही बताओ कि एमएनएस की विघटनकारी राजनीति की बखिया उधेडने के लिए क्या अबू आजमी को हीरो बनाना जरूरी है। मैं यह कभी मान नही सकता कि अनैतिकता का मुकाबला अनैतिकता से किया सकता है। अनैतिक का मुकाबला नैतिक बनकर ही किया जा सकता है।

मीडिया की जिम्मेदारी तो यह होनी चाहिए थी कि बजाय अबू आजमी को हिंदी के मसीहा के तौर पर प्रस्तुत करने के वह महाराष्ट निव निर्माण सेना, राज ठाकरे और शिवसेना की विघटनकारी राजनीति का विरोध करने के नाम पर वे तमाम राजनेता जो उत्तर भारतीयों के वोट को हथियाने के लिए राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं, भाषा, क्षेत्र, जाति और धर्म की कुत्सित राजनीति कर रहे हैं, को ये एक साथ बेनकाब करते। स्वार्थ और अवसरवादिता की रोटियां सेंकने वाले ये राजनेता कभी नहीं चाहेंगे कि शिवसेना और एमएनएस की घटिया राजनीति कभी बंद हो आखिर इन्हें भी तो अपनी दुकान उन्हीं के सहारे चलानी है। लेकिन इन अनैतिक राजनीतिक कृत्यों और उनको लेकर मीडिया की गैर जबाबदेही का अंजाम क्या होगा। क्या आपने सोचा है। हिंदी मीडिया ने एमएनएस और शिवसेना के विरोध का परचम जिन हाथों में दे दिया है। उसे लेकर आप ही बताओ आम मराठी मानुष आखिर क्या सोचता होगा। क्या अबू आजमी के बारे में भी लोंगों को विशेष बताने की जरूरत है।

आखिर हिंदी मीडिया की इन हरकतों से देश का संघीय ढांचा ही कमजोर होगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से देश के उत्तर पूर्व और कश्मीर, में जो हालात है। वह इसी गैर जबावदेह राजनीति और पत्रकारिता का नतीजा है। जहां जाति, धर्म, क्षेत्र और समुदाय विशेष की परिधि से आज तक भारतीय मीडिया पूरी तरह से नहीं निकल पायी है। वहीं खबरों को एक्सक्लूसिव बनाकर परोसने की आपाधापी ने पत्रकारिक मूल्यों का पूरी तरह से गला घोंट दिया है। ज्यादा निराशा तो तब होती है जब हम पाते हैं कि आज के हिंदी पत्रकारों को पत्रकारिक मुूल्यों से कुछ लेना देना ही नहीं है। लेकिन वे महानुभाव जो पिछले 20-30 सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं, क्यूं भीष्म पितामह की तरह द्रौपदी का चीरहरण चुपचाप देखते को विवश हैं। आप ही सोचो क्या पत्रकारिक मूल्यों से विरत होकर देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता को अक्षुण्ण रखने की बात की जा सकती है। क्या दुनिया भर में अपनी विविधता और बहुलता की दुहाई दी जा सकती है। अलगाव की राजनीति को हतोत्साहित किया जा सकता है।

एक बात और जो मीडिया राज, एमएनएस और शिवसेना को गरियाने से बाज नहीं आ रही है, उसे इन सबों के लिए कांग्रेस को कटघरे में खडा करने की जरूरत कभी शिद्दत से महसूस तक नहीं हुई। भले कभी कभार थोडी रस्म अदायगी कर दी गई हो। सिर्फ और सिर्फ चुनावो में मिली कुछेक सफलताओं के आधार पर कांगे्रस, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के गुणगान से मीडिया को आखिर फुर्सत ही कहां है। किसे नहीं पता कि एमएनएस की घटिया राजनीति का फायदा सबसे ज्यादा किस पार्टी को मिला है। वास्तव में कांगे्रेस अगर एमएनएस और राज की हरकतों पर लगाम लगाने के प्रति गंभीर होती तो मैं कोइ कारण नहीं मानता कि ये लोग आज यहां तक पहुंचे होते। सच में देश के संघीय ढांचे को बर्बाद करने वाली इस तरह की राजनीति के लिए सिर्फ कांग्रेस जिम्मेदार है। अतीत में भी पंजाब, कश्मीर और उत्तर पूर्व में कांग्रेस ने कुछ ऐसा ही किया है।

4 comments:

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

यहां भाषा का सवाल है ही नहीं केवल राजनीति और राजनीतिक हित हैं।
मराठी भाषा के लिए लड़ने-मरने वाले ठाकरे बंधु नहीं जानते कि यहां हर रोज भाषाएं मर रही हैं।

Pooja ने कहा…

आपका कहना सही है सर। देश में जितनी समस्याएं हैं सब कांग्रेस की देन हैं। केंद्र और राज्य दोनों जगह कांग्रेस की सरकार है आखिर वह चाहे तो आसानी से राज ठकारे जैसे टुच्चों से निपट सकती है लेकिन नहीं उसे तो सिर्फ राजनीति करनी है। राज ठाकरे से निपटने के लिए फोर्स नहीं इच्छाशक्ति चाहिए सर

चन्दन ने कहा…
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चन्दन ने कहा…

अजीत जी,
बेहद गम्भीर विषय आपने उठाया है। हमारी मीडिया किसी भी मामूली बात को ऐसे पेश करती है जैसे देश की इज्जत या भाषा का लिहाज खतरे मे पड़ गया है। महान मीडिया का रवैया छोटे मोटे आतंकी घटनाओं को लेकर भी यही रहता है। खेल जैसी मामूली और गैरजरुरी ( राजनीति, शिक्षा, समाज की मूलभूत जरुरतों तथा अधिकारों की लड़ाई के आगे क्रिकेट या हॉकी गैरजरुरी ही है) मैचो मे पराजय को ऐसे पेश करती है जैसे हारना किसी सिक्के का पहलू न होकर कोई अपराध हो।
दूसरी बात पर मेरा यह मानना है कि दोष कांग्रेस का नहीं बल्कि ढ़ांचे का है, भाजपा, भाकपा या सपा, बसपा शिवसेना, टीडीपी या नवोदित मनसे भी वही करती जो कांग्रेस ने किया। दरअसल यह छुद्र जीवन का शिल्प है कि जब आप महत्वपुर्ण मोर्चों पर असफल होते है तो बेकार की बातों मे खुद को य अपने आस्रितों को उलझाये रखते हैं।