मुझे पता था तुम्हारा जवाब


उन दिनों

जब मैं तुम्हें टूटकर प्यार करना चाहता था

लिखता रहा प्रेम कविताएं

ऐसे में चूंकि मुझे पता था तुम्हारा जवाब,

मुझे कवितायेँ तुमसे संवाद का बेहतर जरिया लगीं

मैं बेहद खुश होता तुम्हारे जवाबों से

वह मेरी आजाद दुनिया थी

जहां किसी का दखल नहीं था

किसी का भी नहीं

मेरा दिल एक कमरा था

उस कमरे में एक ही खिड़की थी

खिड़की के बाहर तुम थीं

यूं तो कमरे में हमेशा दो लोगों के लिए पर्याप्त जगह मौजूद थी

लेकिन तुमने खिड़की पर खड़े होकर

उस पार से बतियाना ही ठीक समझा

किसी का होकर भी उसका न हो पाना

ये दर्द कोई मुझसे पूछे

ठीक अभी अभी इस उदास रात में

आसमान में कोई तारा चमका है

शायद तुम खिड़की के बाहर खिलखिलाकर हंसी हो

6 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

खिड़की के बारे में मैं हमेशा जो सोचता रहा हूं वह आज पढ़ने को मिला- किसी का होकर भी उसका न हो पाना/ मेरे हिसाब से खिड़की के उस पार के लोग यही सोचते हैं वहीं उसे निहारने वाला हमेशा अकेला रह जाता है।

कविताएं अक्सर ऐसी बात कह डालती है जो दिल के बेहद करीब होता है। हम अन्य माध्यमों से सपाट ढंग से ऐसी बात कह सकते हैं लेकिन दिल को छू जाए वह काम कविता ही कर सकती है।

मुझे खुशी हुई यह जानकर कि संदीप तुम भी वही कहते हो- मुझे कवितायेँ तुमसे संवाद का बेहतर जरिया लगीं......

संदीप पाण्डेय ने कहा…

शुक्रिया गिरींद्र
कविता तो हम सब के अंदर होती है न दोस्त जरूरत है उसे उतारने की बगैर परवाह किए कि दूसरे क्या सोचेंगे

चन्दन ने कहा…

सुन्दर कविता।

यह पहचानना भी एक खास बात है कि कविता के माध्यम से बात करने की और समझने की योग्यता सामने वाला रखता है कि नहीं। कई बार लोग कविता को लिजलिजेपन की आड़ बना लेते हैं। पात्रता होना और उसे पहचानना दोनो बराबर की योग्यता है।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

वाह बन्धु !
पूरे माहौल को शरीर के साथ उपमित
कर के आपने छोटे में ही बहुत बड़ा कह डाला ..
सुन्दर कविता का आभार ,,,

बेनामी ने कहा…

jakhm gehra hai sandeep ji. marham ko khoj he lijiye varna khali cup ki dastaan to lagbhag har daraj mein chipi hai

aapki benami dost---saloni

अखिलेश चंद्र ने कहा…

Wah! Maza aa gaya!!!