तुम्हारा होना...


तुम नहीं हो


तुम्हारी सीट खाली है


दराज में रखा तुम्हारा कप


सोच रहा है कि तुम आओगी


वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है


तुम्हारी सीट पर कोई और बैठेगा


तो कप को बहुत खराब लगेगा


शायद वो मना भी करे


या फिर गिरकर टूट ही जाए


अगर कप टूट गया


तो यहां और भी बहुत कुछ टूटेगा...

7 comments:

अनिल कान्त : ने कहा…

मन की बातें अच्छी लगी ...


मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

अखिलेश चंद्र ने कहा…

इसे तो मैं अनेक बार सुन चूका हूँ. यहाँ देखकर बहुत अच्छा लगा.
कहाँ खोये -खोये रहते हो! दो-चार दिन के लिए पहले वाले दिखे वाले दिखे थे फिर लेकिन ............????!!!

अखिलेश चंद्र ने कहा…

इसे तो मैं अनेक बार सुन चूका हूँ. यहाँ देखकर बहुत अच्छा लगा.
कहाँ खोये -खोये रहते हो! दो-चार दिन के लिए पहले वाले दिखे थे फिर ............????!!!

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छी रचना है।

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

मुझे कभी-कभी गुस्सा आता है टिप्पणियों पर। यार, ये कोई टिप्पणी है- वाह, कमाल ..अच्छी रचना..आदि-आदि।
यदि आपको अच्छी लगी तो क्या लगी ये बताइए न..इसी कारण मैं ज्यादा टिप्पणी नहीं कर सकता। इस कविता पर देर से टिप्पणी करने की पीछे कारण यह है कि मैंने इसे महसूस किया है।
संदीप अच्छी कविता है। खासकर जब आप बोलते हैं कि ...तुम्हारी सीट पर कोई और बैठेगा तो कप को बहुत खराब लगेगा..
आपेन बेलाग कहा है इसी कारण अच्छा लगा और हां मन उस समय और भी सेंटी टाइप हो जा ता है है जब आप कहते हैं-
अगर कप टूट गय़ा तो यहां और भी बहुत कुछ टूटेगा....

Jaya gupta ने कहा…

tutne ka dard apki kavita me dikha, ak kamal kariye jara jodane ka ahsaas bhi le aaiye apni agli rachana main.
tub hi lagega ki jeevan gatimaan hai.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

तो कप अभी तक साबुत है