पत्रकार की छंटनी पर हल्ला क्यों नहीं

मृत्युंजय कुमार झा

अनिल चमड़िया की महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में नियुक्ति रद्द किये जाने को लेकर ब्लॉग पर हाय तौबा मची हुई है। इतना ही नहीं अब इसको लेकर ह्स्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है। अनिल चमड़िया की नियुक्ति वैध थी या अवैध, निकालने का आधार ग़लत था या सही, मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता। बेशक इस पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन हजारों पत्रकारों को आनन- फानन में ही बाहर का रास्ता दिखा जाता है, इस पर हमारी कलम मौन क्यों हो जाती है। ऐसा भी नहीं कि इन पत्रकारों को निकालने का तरीका, या निकालने के पीछे की वजह अनिल चमड़िया की नियुक्ति रद्द किये जाने से भिन्न है। तरीका भी वही, वजह भी वही, फिर चर्चा और विरोध में सौतेलापन क्यों।

मैं यहां पर कुछ उदाहरण पेश करना चाहुंगा। हाल ही में अमर उजाला बरेली से पांच प्रशिक्षु पत्रकारों को स्थानीय संपादक प्रभात सिंह ने सिर्फ इसलिए निकाल दिया कि उनकी नियुक्ति उनके विरोधी संपादक ने की थी। ख़बर है कि अमर उजाला बनारस से भी चार जूनियर पत्रकारों को बाहर निकाल दिया गया है। ये सारी नियुक्तियां अमर उजाला के तत्कालीन ग्रुप एडिटर शशि शेखर ने की थी। अपने आपको प्रतिष्ठत मीडिया संस्थान कहने वाले नेटर्वक 18 ग्रुप ने एक झटके में ही सीएनबीसी और सीएनबीसी आवाज़ चैनेल के करीब 250 पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। voice of india चैनल से एक पत्रकार को सिर्फ इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उन्होंने सैलरी मांगने की गुस्ताखी की। ये महज चंद उदाहरण हैं। मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो या तो इसलिए निकाल दिये गए क्योंकि या तो ये संपादक के चमचों के लॉबी के नहीं थे, या फिर सिर्फ काम करते थे। इनमें से कइयों की पारिवारिक जिम्मेदारी अनिल चमड़िया जी से बहुत ज़्यादा होगी। लेकिन इन मसलों पर या तो बहुत कम कलम चली, या चली भी तो बहुत संतुलित, ख़बर बताने के लहजे में। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जो मीडिया जेट एयरवेज के मैनेजमेंट को बर्खास्त कर्मचारियों को फिर से बहाल करने पर मजबूर कर देता है, अपने ही घर का आग नहीं बुझा पाता।

दरअसल हमारी फितरत ऐसी है कि हम गलेमरस और बोद्धिक मामलों में कूद कर अपनी बौद्दिकता साबित करना चाहते हैं। ऐसे में हम जिस सरकोर का ढिंढोरा पीटते हैं उसके मायने भी बदल दिये जाते हैं। इसलिए अनिल चमड़िया की नियुक्ति रद्द होना हमें बड़ा मुद्दा लगता है, लेकिन नये पत्रकारों को निकाले जाने पर अपनी कलम चलाने में हम अपनी तौहीन समझते हैं। अमर उजाला के नये पत्रकारों को इस आधार पर निकाला जा रहा है कि व योग्य नहीं हैं। आख़िर योगयता का पैमाना क्या है और योग्यता कौन तय करता है, ऐसा व्यक्ति जो ख़ुद अपने विवादित आचरण के चलते उजाला से बाहर निकाला जा चुके हैं! या फिर अगर ये बच्चे योगय नहीं हैं तो नियुक्ति के समय इस बात का ख्याल क्यों नहीं रखा गया। दरअसल अपने नीजी स्वार्थों और वय्क्तिगत दुश्मनी का बदला लेने के लिए इस तरह के नौनिहालों को बलि का बकरा बनाया जाता है।

बिहार के अररिया जिले में जन्मे मृत्युंजय कुमार झा फिलहाल ज़ी बिज़नेस न्यूज चैनल में एंकरिंग और रिपोर्टिंग करते हैं।)

13 comments:

ajeet kumar ने कहा…

Anil chamadia ko lekar ho halla kuacharan aur ayogta ke bavjood jati aur varna ka naam le lekar satta mai apni dalali sunischit aur anivarya karne ki sajish hai

ajeet kumar ने कहा…

rahi baat patrakarita mai shoshan ki to in girohbajon ko giroh banane se phursat hi kahan hai. Aakhir girohbandi ke bal par hi to ye aaj yahan tak pahunche hain. In logon ki patrakarita ke andar ki gandagi ko saf karne mai kabhi koyi roochi ho hi nahi sakti.

Suman ने कहा…

nice

बेनामी ने कहा…

सौ फीसदी सहमत

ajeet kumar ने कहा…

hamare jaise chhote patrakaron ko ayogta ke aadhar par kharij karne ko lekar kya in mahapatrakaron ne kabhi koyi abhiyan chalaya. Lekin inhein jab ayogyata aur badchalani ko lekar nikala jata hai to pahad toot padta hai. Mano ye ayogya aur badchalan ho hi nahi sakte. aakhir ye jo dalit thare. In daliton se poocho prabandhan aur sampadak ki dalali khate huye inlogon ne kitno ko ayogta ke aadhar par nikala/

बेनामी ने कहा…

jo log hastakshar abhiyan chal rale hain unlogo n anil chamidya k paksh sunkar hi ektapha kam kar rahe hain. para maala kaha samjah.
kewal bcom graduatae des university me profosher kaise bane.
gali se huwi niyogi v sudhari jani chahiye.
rahi bat patkaro ki chatni ke liey to ye kaha aur kish dawaje par aapni bat kahne jayege.
sanjay

RAMANUJ SINGH ने कहा…

loktantra ke is chauthe astambh ki buniyad me jab jantantra na ho to aam logon ke liye susashan ki kamna karna bemani hogi.....
aapne sahi pharmaya aapne ghar ko sahi karne ke bad dusre ke ghar ki or dhiyan dena chahiye....aaj ye bade patakar jo dusron ki samasya par khub likhte hai...apne is patrkarita jagat ki samasya najar nahi aati hai...aab hamlogon ko in chutiye patrakaron ke khilaph aawaj buland karni hogi....ham aapke sath hain...

शशिभूषण ने कहा…

मृत्युंजय जी आपकी बातें गौर करने लायक हैं.अजीत जी आपकी बात दुरुस्त है पर अनिल चमडिया के साथ गलत हुआ है.उनका साथ देने का फायदा कौन उठा ले जाएगा इसे हम थोड़ी देर को भूल भी सकते हैं.मेरी तो यह आपत्ति है कि विश्वविद्यालयों में कोई इतना ताक़तवर क्यों हो कि वह लोगों को जब चाहे निकाल या रख सके.

ajeet kumar ने कहा…

shashi bhusan ji ye tantra ki vifalta hai. tamam sarkari sansthanon mai kamobesh yahi halat hai. bagair takat arjit kiye to koyi in sansthanon mai pravesh hi nahi kar sakta. Aur jati, dharm, rajniti to takatwar hone ke hi jariye hai. Jahan tak rahi sarkari aundan prapt uchacha shaikshanik sansthaon ki baat yahan to har koyi satta ke galiyare se hi nikal kar aata hai. VC se lekar chaprasi tak. Hmmm do char masoomon bhi in sansthanon mai rakh liye jate hai taki shaikhshanik santhan hone ka bharam bana rahe.

ajeet kumar ने कहा…

kya anil chamadia ko bina dalit bataye aur vibhuti rai ko bhimihar bataye virodh nahi ho sakta tha. Shashi bhusan ji darasal yahan virodh to masala hai hi nahi. masala to hai anil chamadai ko aage kar jati aur varna ka naam le lekar satta mai apni jamindari khada karna. Is tarah ki jamindari apko patrakarita, sahitya aur rajniti mai dekhne ko mil sakte hai. Lekin jamindari jamindari hoti hai. Chahe daliton ki ho ya brahmnon ki. Shashi ji mujhe virodh is jamindari se hai. Rahi baat gairkanuni dhang se nikalne ki to iska virodh sirf anil chamdaia tak nahi balki bareli aur CNBC tv 18 tak bhi hona chahiye.

बेनामी ने कहा…

Anil chmadaia ko lekar rache gaye path ka sutradhar daliton ka swaghosit massiha mahamandal aisa kar IIMC ko yah sandesh de raha hai ki jagjahir ayogyata aur anaitikta ke wavzood wahan uski naukari par talwar latkane ki koshish nahi ki jaye.

anand ने कहा…

लो भैया, मेरी भी टिप्पणी ले लो। बढ़िया है...।

anand ने कहा…

मृत्युजंय जी ये बहुत ही शर्मनाक है कि युवा पत्रकारों को इस तरह से प्रताडित किया जा रहा है। दरअसल ऐसे घटिया संपादकों को मीडिया में रहने का कोई आधार नहीं, जो योग्यता के बल पर नहीं शायद चाटूकारिता के दम पर मीडिया में टिके हुए है। दरअसल ये लोग आज जहां भी है केवल चाटूकारिता के दम पर है। कम से कम इनको ये तो सोचना चाहिए कि अपनी प्रतिद्धंदिता की लड़ाई में ये युवा पत्रकारों की बलि चढ़ा रहे है। पूरी पत्रकार बिरादरी को ऐसे दो घटिया संपादकों के खिलाफ एक मुहिम चलानी होगी। ताकि ये लोग दोबारा ऐसे कदम उठाने से पहले सोचे।
माननीय संपादक महोदय अगर आप इस कमेंट को पढ़े तो कम से इतना बता दे कि आपको किसने अधिकार दिया युवा पत्रकारों की जिंदगी बर्बाद करने का। मैं आपको बता दू कल यही कही पर संपादक बनेगे। और तब आपको अपने इस फैसले पर ग्लानि महसूस होगी। भगवान आपको सदबुद्धि दे।