निरूपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं

सोचा नहीं था कि नए लैपटाप पर कुछ लिखते हुए इस तरह हाथ कांपेगा। 29 अप्रैल 2010 वो तारीख थी जिस दिन निरूपमा पाठक नामक एक युवा सपने का असामयिक अंत हुआ था। वो भी किसके हाथों! उसके घरवालों ने उसकी महज इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वह एक लड़के से शादी करना चाहती थी जो विजातीय था। यह कोई छोटा अपराध नहीं था। परिवार की इज्जत बचाने के लिए इतनी कुबार्नी तो दी ही जा सकती है।

फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह अपने परिवार से बेइंतहा प्यार करती थी। जैसा कि उसने अपनी सोशल नेटवर्किंग आईडी पर भी लिख रखा है। वो आई डी जो कभी दोस्तों से मन की बातें साझा करने का जरिया हुआ करती थी अब आरआईपी के संदेशों से अटी पड़ी है लेकिन निरुपमा अब उस पर कभी लाग इन नहीं करेगी। अब उसे पुलिस खंगालेगी। तलाशे जाएंगे कातिल, उस हत्या के सुराग जिसके बारे में सबको पता है कि वो किसने की है।

निरुपमा अगर मीडियाकर्मी न होती तो शायद उसकी मौत भी देश में रोज होने वाली हजारों मौतों की तरह गुम हो जाती। लेकिन उसके साथियों ने ये नहीं होने दिया। ये सोच कर ही नफरत सी होती है कि हम एक हत्यारे समाज में रह रहे हैं। अपने आसपास ही नजर डालकर देखने की जरूरत है, आखिर कितने लोग हैं जो इस घटना के खिलाफ आवाज उठाने को तैयार हैं। उंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद लोगों के अलावा हमारा प्रतिनिधि समाज हत्यारों के साथ है। निरुपमा की हत्या के बाद उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर जिस तरह के घपले रोज सामने आ रहे हैं डर है कि कहीं यह मामला भी आरुषि हत्याकांड की तरह जांच के अनवरत सिलसिले में न बदल जाए। वैसे भी काश एक निरूपमा, एक रूचिका या एक जेसिका को न्याय मिल जाना इस बात की गारंटी हो पाता कि हमें भविष्य में इस तरह की घटना से दो चार नहीं होना पड़ेगा।

निरूपमा की मौत का बोझ कैसे उठाओगे प्रियभांशु

टीवी पर यह कहकर कि तुम्हें निरुपमा के प्रेग्नेंट होने के बारे में कुछ भी पता नहीं था तुमने न केवल अपने प्रेम को लांक्षित किया बल्कि अपनी मर चुकी प्रेमिका को भी कठघरे में खड़ा किया है। हम कैसे मान लें कि तीन महीने का गर्भ पालने का निर्णय उसका खुद का रहा होगा प्रियभांशु। क्या उसने तुम्हें इस बारे में कुछ नहीं बताया था। फिर वो कौन सी मजबूरी है जो तुम्हें साहस के साथ सच को स्वीकारने का हौसला नहीं दे रही कि निरुपमा की कोख में तुम्हारे प्यार का अंश था।

निरूपमा की हत्या दो दिन बाद से ही तुम्हारे खिलाफ तथाकथित शुचितावादी लोगों ने मोर्चा खोल दिया था। बिना तुमसे बात किये, तुम्हारा पक्ष जाने लोगों ने दोषी करार दे दिया। तुम्हें एक खूबसूरत टैलेंटेड लड़की को अपनी प्रेमिका बनाकर दोस्तों के बीच रुआब गांठने वाली फितरत का कायर घोषित कर दिया। लेकिन प्रियभांशु तुम क्यों उन लोगों को सही ठहराने पर उतारू हो। तुमने क्यों इतने विपरीत हालात में उसे अकेली मरने के लिए हत्यारों के बीच भेज दिया। उसके लगातार आ रहे एसएमएस ने तुम्हें कोई आभास नहीं दिया कि उसके साथ क्या कुछ हो सकता है। तुम उसकी मौत का बोझ कैसे उठाओगे ।

टीवी पर निरुपमा के भाई का चेहरा फिल्म एलएसडी की पहली कहानी की नायिका श्रुति के भाई से हूबहू मिलता है। या शायद मुझे ही ऐसा लगा। जिस बच्ची को पालपोस कर इतना बड़ा किया उसका दम घोंटते हुए हाथ उसकी मां के हों या उसके भाइयों या बाप के अब कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी आंखों में अब भी अपने परिवार की इज्जत बचा ले जाने का अभिमान साफ पढ़ा जा सकता है।

निरुपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं हैं। क्योंकि इस विकल्पहीन समय में हम अब भी तुम्हारे हत्यारों के साथ रहेंगे। स्थानीय पुलिस भी तुम्हारे इज्जतदार परिवार का ही साथ देगी शायद और तुम्हारी मौत का कोई निशाँ बाकी नहीं रह जाएगा लोगों के जेहन में। कोर्ट ने तुम्हारी मां को तीन दिन के लिए पैरोल पर छोड़ा है जानती हो क्यों! ताकि वो तुम्हारे अंतिम संस्कार में शामिल हो सके।

नोट: अभी पोस्ट लिखने के दौरान ही टीवी पर खबर आई है कि निरुपमा की मां की याचिका पर प्रियभांशु के खिलाफ शादी का झांसा देकर उसका यौन शोषण करने का मामला दर्ज करने का आदेश कोर्ट ने दे दिया है। अब हमें इंतज़ार करना चाहिए सुप्रीम कोर्ट की किसी नयी व्यवस्था का जिसमें शायद वो गहरे प्रेम करने वाले लोगों को शारीरिक निकटता से बचने का कोई मार्ग सुझाएगा। वर्ना कौन जाने कल को उनका हश्र भी प्रियाभांशु जैसा हो....

13 comments:

Fauziya Reyaz ने कहा…

iam feel like crying...what the hell...sabke chehre ek se dikh rahe hain

honesty project democracy ने कहा…

इस स्वार्थी दुनिया में कोई किसी का नहीं है और इन देश के गद्दार टायप भ्रष्ट मंत्रियों ने लोगों की दो वक्त की रोटी के संघर्ष को इतना मुश्किल बना दिया है , की स्थिति और भयावह हो गयी है /

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

नकली दुनिया में असली जिन्दगी जीने वालों के साथ यही होता है। उसे विदा कर दिया जाता है और फिर लोग शान से नकली जिन्दगी जीने लगते हैं।

addictionofcinema ने कहा…

ham log kis kone me chhipein aur kaise jhuthla dein is sach ko ki is mamle mein agar koi karrvai hui hai to wah itni hi ki Pryabhanshi ke khilaaf mamla darj ho chuka hai.
kaash ye ham dainasor yug me paida hue hote, kuchh aisa hota to dainasorn ko dosh de pate...ab to sab saaf saaf dikh raha hai ki ham sab doshi hain........ghrit aur jaghanya

UdIt Goel ने कहा…

आपके लिखे इस पोस्ट लगता है कि हम मीडिया वाले लोग हकीकत तो लोगों के सामने लाते है पर जब कोई अपना साथी इस तरह मौत के लम्हों में सो जाता है तो लगता है कि काश ऐसा किसी के साथ न हो। क्या अब प्यार करना भी एक गुनाह बन गया है अब तो हर कोई इंसान प्यार करने से पहले सोचने लगा कि प्यार करे या नही।

सुशीला पुरी ने कहा…

bahut dukhad hai ye......

श्वेतकेतु ने कहा…

मुझे अच्छा लगता है आपके ब्लॉग पर आकर | इस पोस्ट के साथ ही खास तौर पर उदय प्रकाश के साक्षात्कार की शानदार कड़ियों के लिए मेरी तरफ से आपको बधाई | अच्छी रचनाएं पढने को आगे मिलती रहेंगी इस उम्मीद में फिर मिलता हूँ |

Ritesh Purohit ने कहा…

achha likha hai sandeep. but abhi kisi to pata nahi hai ki sach kya hai. itne jaldi maa-baap ko bhi katghare me khada karna sahi nahi. jo khabrein media me aati hain, wo 100 percent sach nahi hoti.

Puneet ने कहा…

मां ने आंचल मे
जब अपने
लेकर के
दम घोटा होगा ...
मालूम हुआ होगा
उसको ये
कि परिवारो
के बरगद का
तना
खोखला
सड़ा था कितना ...
उसके गर्भ मे
रखा था जो कुछ
सबके दिल से
बड़ा था कितना

Rohit ने कहा…

संदीप जी आपने बिलकुल दुरुस्त लिखा है| कितनी शर्म की बात है सिर्फ प्यार के लिए क़त्ल ? कैसे कोई माँ बाप इतना क्रूर हो सकता है? बुरा तो इस बात का लग रहा है कि जो लोग कुछ करने की हैसियत में हैं वो हमेशा चुप रहकर तमाशा देखते हैं कैसे लोग हैं ये और कहाँ जा रहे हैं हम शायद किसी को नहीं मालूम ...

aneeta ने कहा…

Sandeep ji aap ka lekh kafi prabhavit karne wala hai.., aap ka andesha bhi sahi lagta hai ki kahni ye case bhi tamasha baan kr na rah jaye..,kyunki har baar aise hi mamle badi teji se uthte hai aur dhire-dhire kahan gum ho jate hai pata hi nahi chalta.

बेनामी ने कहा…

aakhir kab tak sache prem ko ka gala ghota jata rahega..kab tak. ek taraf hame bachpan me hame pyar karna sikhaya jata hai bade hokar jab ham pyar karne lag jate hai tab wahi gunah ban jata hai...

saloni ने कहा…

संदीप जी
आपकी प्रतिक्रिया के साथ पुनीत की कविता भी दिल को छु गयी.