मैं अब विदा लेता हूँ


पाश की एक कविता जो हम सब के दिलों के बेहद करीब है .....
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हें कभी नहीं आयेगा
जिन्दगी ने जिन्हें बनिया बना दिया
जिस्मों का रिश्ता समझ सकना
खुशी और नफ़रत में कभी लीक न खींचना
जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फ़िदा होना
सहम को चीर कर मिलना और विदा होना
बहुत बहादुरी का काम होता है मेरी दोस्त
मैं अब विदा होता हूँ
तू भूल जाना
मैंने किस तरह तुझे पलकों में पाल कर जवान किया
की मेरी नजरों ने क्या कुछ नही किया
तेरे नक्शों की धार बाँधने में
की मेरे चुम्बनों ने
कितना खूबसूरत कर दिया तेरा चेहरा
मेरे आलिंगनों ने
तेरा मोम जैसा बदन कैसे सांचे में ढाला
तू यह सब कुछ भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके की मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
की मैं गले तक जिन्दगी में डूब जाना चाहता था
मेरे हिस्से कभी जी लेना मेरी दोस्त
मेरे हिस्से का भी जी लेना ....
पाश

1 comments:

परमजीत बाली ने कहा…

सुन्दर रचना प्रेषित की है।बधाई।