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मरघट मे हंसने का मादृा


बात
-बात पर रस लेता हूं

मरघट
में भी हंस लेता हूं

बिन
पूछे ही ठस लेता हूं

अपनी
यारी हुई राम से

लोग
कहें मैं गया काम से---


जब भी मन हो नाचूं गाउं
चौराहे पर ढोल बजाउं
नए-पुराने खेल दिखाउं
गरियाउं भी नाम से
लोग कहें मैं गया काम से---
ओम द्विवेदी

लंबे समय से ब्लाग पर लिखना छूटा हुआ है। कुछ व्यस्तताएं कुछ काहिली इसके पीछे वजह रही हैं। लेकिन आज जब यह नई पोस्ट लिख रहा हूं तो लग रहा है कि नए साल में नई शुरुआत के लिए क्या इससे बेहतर पोस्ट कोई हो सकती थी। पत्रकारिता जगत में बीते पांच साल के अनुभवों में साहित्य की राजनीति को देखना भी शामिल रहा है। शेयर बाजार की तरह रचनाकारों को कभी उपर तो कभी नीचे जाते देखा तो पुरस्कार के लिए अपने आत्म सम्मान को अपने ही पैरों तले रौंदते भी देखा। लेकिन जब कभी ओम द्विवेदी यानी हमारे ओम भाई और उनकी रचनाएं याद आती हैं तो कहीं कहीं लगता है कि उम्मीद खत्म नहीं हुई है।
ओम भाई का नया संग्रह ताना मारे जिंदगी अभी हाल ही में आया है। दोहों, गजलों और गीतों का यह संग्रह जब मिला तो कब उसे पढ़ना शुरू किया और कब वह खत्म हुआ पता ही नहीं चला। इस बीच एक-एक रचना से गुजरते हुए रीवा और ओम भाई से जुड़े तमाम अनुभव याद आते रहे। ओम भाई यानी हमारे जीवन का पहला नायक। मंच पर अपने शानदार अभिनय से मंत्रमुग्ध करते ओम भाई, सिरमौर चौराहे पर चाय के किसी ठेले पर उम्र जाए बीत फकीरे/ अब दुनिया को जीत फकीरे जैसे अपने गीतों से हम भटके हुए बेरोजगारों को हौसला देते ओम भाई, अपनी कलम से शहर के तथाकथित दिग्गजों की खबर लेते ओम भाई, हमारे यकीन का दूसरा नाम हैं ओम भाई। ये संयोग ही है कि थोड़ा बहुत थिएटर करने से लेकर रेडियो अनाउंसर बनने, पत्रकारिता में आने कविताएं लिखने तक जीवन ओम भाई से अजीब तरीके से जुड़ा रहा। पहले भोपाल उसके बाद दिल्ली आने पर उनसे संपर्क टूट सा गया था। दो साल पहले जब दैनिक भास्कर इंदौर काम करने पहुंचा तो शहर में जिन तीन लोगों को जानता था उनमें से एक ओम भाई थे। संबंधों की यह नई शुरुआत थी।

ओम पर लिखने का ख्याल मन में तब आया जब मैंने फेसबुक पर कई मित्रों को अदम गोंडवी, दुष्यंत कुमार, मुकुट बिहारी सरोज आदि तमाम रचनाकारों के सरोकारी रचना कर्म पर चर्चा करते देखा। मन में खयाल आया कि इन तमाम रचनाकारों के बारे में तो लोग जानते हैं, उनके काम से परिचित हैं लेकिन उन कवियों का क्या जो चुपचाप लेकिन बड़ी शिदृत से अपना काम कर रहे हैं। मुझे लगा कि बड़ा कवि क्या वही है जिसे दो-चार पुरस्कार मिल चुके हैं या फिर जो मठाधीशी की साहित्यिक परंपरा में किसी मठ का विप्र है। मित्र कथाकार शशिभूषण ने अपनी फेसबुक वाल पर सही लिखा है कि ओम भाई अदम गोंडवी की परंपरा के कवि हैं। ओम उस परंपरा के कवि हैं, जिनके पास जीवन के अनुभवों का वह खजाना है जो उन्हें चालू चलन के मुताबिक प्रेम से इतर कविताई करने का मादृा देता है। यहां मेरा मकसद प्रेम कविता या इस धारा के कवियों की आलोचना करना भर नहीं है बल्कि मैं ओम के रचना कर्म को रेखांकित करने का प्रयास कर रहा हूं। उनकी कविता में मां, बाबा, बेटे से लेकर भूख मोबाइल तक सब शामिल हैं। उनके अनुभव के दायरे की एक बानगी देखिए-
मोबाइल ने कर दिया, सब कितना आसान
जाकर घर से दूर भी घर का रखता ध्यान
मोबाइल हर हाथ में राजा हो या रंक
सारे रिश्ते रह गए अब तो केवल अंक

या फिर
रोटी कपड़े के लिए रहे दौड़ते पांव
बचपन रोया लिपट के जब भी पहुंचे गांव
धीरे धीरे गए, शहरों वाले दांव
दिल्ली के हाथों बिका दादाजी का गांव

होली पर ये दोहा
रंग तोड़ने लग गए सावन का कानून
लाल-लाल पानी हुआ काला-काला खून

रोटी के संग्राम में लगे हुए हैं राम
रावण से करना पड़ा उनको युद्ध विराम

नोट: यह कोई पुस्तक समीक्षा है, किसी तरह का प्रचार-प्रसार। यह ओम भाई के प्रति मेरा स्नेह है, आदर है, इसे प्रकट करने का यही तरीका मुझे समझ में आया तो यही सही।


ओम द्विवेदी नई दुनिया इंदौर में कार्यरत हैं, उनसे संपर्क- मोबाइल 09425363642] ईमेल-om.aaryan1@gmail.com

ओम द्विवेदी का ब्लाग- http://meetheemirchee.blogspot.com/

1 comments:

ओम द्विवेदी ने कहा…

भाई संदीपजी,
आपने जिस अपनापे के साथ यह टिप्पणी लिखी है, उस पर अगर मैं शुक्रिया अदा करुंगा तो आपका स्नेह छोटा हो जाएगा। आपने जिस शिद्दत से रीवा और इंदौर के समय को याद किया है, मेरी कविताई और रंगकर्म को याद किया है, वह आप जैसा संवेदनशील कवि और दोस्त ही कर सकता है। यह तो आपका बड़प्पन है कि आपने इस नाचीज को कभी नायक समझा था और जमाने के सामने कुबूल कर लिया, वरना तो इस निर्दयी समय में नायक को खलनायक बनाने में देर नहीं लगती। दोस्त को दुश्मन की तरह मारने में वक़्त नहीं लगता। मैं रीवा में रहते हुए जितना कर सका, उसमें आप जैसे दोस्तों का साथ था, सपनीली आंखें थीं, दिल में मचलते हुए शोले थे। कुछ दुश्मन थे, जो लगातार मांजते रहते थे, लगातार मजबूत होने के लिए उकसाते रहते थे। आज भी अगर कोई सोच, कोई कविता, कोई व्यंग्य, कोई नाटक अपने पास तक आता है तो यकीन मानिये आप जैसे दोस्तों के जरिये ही आता है। कभी अच्छा बनता है तो कभी बुरा। भाई शशिभूषण ने जब अदम के साथ मेरा नाम जोड़ा था तब भी मैने यही कहा था कि उस जनकवि के साथ मेरा नाम जोड़कर मेरे सिर पर जिम्मेदारियों का पहाड़ रख दिया है। अपनी कोशिश तो यह है कि जिनको पढ़कर बड़े हुए हैं, जिस समाज में जीकर बड़े हुए हैं, उसका कुछ ऋण अगर उतार सकें तो उतार दें। आपकी दृष्टि में अगर मेरे दोहे और मेरी कविता कहीं कुछ अपील करने लायक हैं, तो यही अपनी सार्थकता है। यह कविता केवल मेरी नहीं है, हमारे-आपके संघर्षों की कविता है। आप अगर कुरेदते रहेंगे, चिकोटी काटते रहेंगे, जगाते रहेंगे तो मुमकिन है कि मेरे भीतर की रचनात्मकता बची रहेगी।
आपका
ओम द्विवेदी