इश्किया : कमीने के घटिया एक्सटेंशन में ओमकारा की मिक्सिंग


विशाल भारद्वाज के नाम, विद्या बालान की धुंआधार प्रमोशन और गुलजार के कलमबद्ध कुछ खूबसूरत गीतों ने फिल्म इश्किया देखने पर मजबूर तो कर दिया लेकिन मामला कुछ जमा नहीं। इश्किया ठीकठाक फिल्म है लेकिन यह निराश करती है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले को मेनस्ट्रीम सिनेमा की किसी फिल्म के कथानक का केंद्र बनते देखना सुखद है लेकिन इसके आलावा फिल्म का इलाके से कोई जुड़ाव नहीं. भोपाल के रहने वाले दो उठाईगीरे खालू और बब्बन एक डान से बचते बचाते वहां अपने एक पुराने साथी की विधवा कृष्णा के घर शरण लेते हैं। और दोनों ही उसके इशक में गिरफ्तार हो जाते हैं। फिर शुरू होता है खेल एक दूसरे के इस्तेमाल का जिसमें कृष्णा भी शामिल है। पात्रों की क्षेत्रीयता और उनकी कमीनगी ओमकारा और कमीने की याद दिलाते हैं.

टुकड़ों टुकड़ों में अच्छी होने का भ्रम पैदा करती इश्किया दो घंटे की एक छोटी फिल्म है जिसका पहला हाफ जबरदस्त झिलाऊ है। गालियों का तड़का जाने क्यों असरदार नहीं लगता। गालियों से लेकर घटनाओं तक फिल्म में नेचुरल कुछ भी नहीं है। सारी परिस्थितियां और पात्र हर मोड़ पर गढ़े हुए लगते हैं। किरदारों में कमीने का एक्सटेंषन डालने की कोशिश की गई है। एक सवाल यह भी है कि क्या महज चौंकाऊ गालियां डालकर घटनाओं को स्वाभाविक रूप दिया जा सकता है।

इश्किया में पूर्वांचल की जातीय सेना के सन्दर्भ भी न्यायपूर्ण नहीं लगते. क्योंकि वो महज सन्दर्भ हैं भी नहीं. ऐसे में गुलाल जैसी फिल्मों की बेतरह याद आती है.

यह विद्या बालान की फिल्म हो सकती थी लेकिन निर्देशक ने उनके चरित्र के साथ भी ज्यादती की है। कृष्णा का कैरेक्टर क्लाइमेक्स के पहले तक सही जा रहा था लेकिन पति को जिंदा बताकर उसके बरताव में उसमें आदर्षवाद की जो चाषनी डालने की कोशिश की गई है वह मजा खराब कर देती है।

नसीर ने एक बार फिर साबित किया है कि उनका कोई जवाब नहीं। बूढ़े अंतरमुखी आशिक और एक छुटभैये उठाईगीर की भूमिका में उन्होंने जबरदस्त जान फूंकी है। अरशद के मुंह से भोपाली टोन और गालियां गुदगुदाती हैं लेकिन वह सर्किट के किरदार से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।



फिल्म के गाने सुनने में जितने अच्छे हैं देखने में वे उतने असरदार नहीं लगते। फिल्म के गाने सुनने में जितने अच्छे हैं देखने में वे उतने असरदार नहीं लगते। इब्ने बतूता गीत सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की इसी नाम की कविता की याद दिलाता है -


इब्नबतूता
पहन के जूता निकल पड़े तूफान में


थोड़ी हवा नाक में घुस गई


थोड़ी घुस गई कान में


कभी नाक को


कभी कान को


मलते इब्नबतूता

इसी बीच में निकल पड़ा


उनके पैरों का जूता


उड़ते उड़ते उनका जूता


पहुँच गया जापान में


इब्नबतूता खड़े रह गए


मोची की दूकान में

4 comments:

mithilesh ने कहा…

ek badiya aur sawdhan karne wali samiksha.... es sujhaw ke sath ki atiutsah me film na dekhe...

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बढ़िया समीक्षा...

दीपक 'मशाल' ने कहा…

na ji maza na aya...

saloni ने कहा…

मैंने हालाँकि फिल्म नहीं देखि लेकिन आज सुबह मेरी सहेली का फ़ोन आया . कहने लगी पीपल के पेड़ के नीचे बैठ कर टट्टी ....... दरअसल कल रात उसने यह फिल्म देखि जिसका खुमार सुबह तक कायम था. मुझे लगता है की बदल चुकी जीवन शैली फिल्म में है कुछ देसी संवादों के साथ. हम लोग भी तो मन ही मन और कभी खुलेआम छोटी - बड़ी गाली बकते है. इस लिहाज से फिल्म ठीक होगी. आपकी समीक्षा में कुछ अधूरापन लगा, पता नाहे क्या ? फिल्म देख कर ही बता सकुगी. बाकि फिल्म में मजा नाहे आया तो ...... समझ रहे है न की छोटी - मोटे गली देना तो बनती है भाई ...... ही ही ही ही ही ही .....