फ़राज़ का जाना ...

आख़िर अहमद फ़राज़ चले गए , लेकिन उस तरह नही जैसे वो मुशायरों से उठते थे । वे चुपचाप खामोशी से चले गए और उनके इसके साथ ही पाकिस्तानी अदब में बागी तेवर की एक बेहद मुखर आवाज खामोश हो गई।

कहने को तो फ़राज़ का इंतकाल अगस्त की २५ तारिख को हुआ लेकिन वो तो एक अरसा हुआ हमारे आप के दिलों से बहुत दूर जा चुके थे । बिल्कुल उर्दू जुबान की मानिंद ...तभी तो उनके मरने पर हमारे आपके चहेते अखबारों -चैनलों ने छोटी सी ख़बर देना भी मुनासिब नही समझा इक्का-दुक्का को छोड़ कर। और तो और तमाम निजी झगडों को निबटाने का हथियार बनते जा रहे हिन्दी चिट्ठों ने भी फ़राज़ में कोई रूचि नही दिखायी .

मैंने उनकी मौत पर एक पीस लिखना चाहा, सोचा उनके बारे में कुछ बातें उन लोगों से शेयर करूं जिन्हें मैं उर्दू- हिन्दी अदब का नुमाइंदा समझता था , आपको बताऊँ फराज की मौत पर उन्होंने कैसी टिप्पणियां की...

फ़राज़ साहब का इंतकाल तो अरसा पहले हो गया...
कौन फराज? अच्छा वो पाकिस्तानी शायर ...
अच्छा... रंजिश ही सही वाली गजल उनकी लिखी हुई थी...


दोस्तों जनवरी 1931 में जन्मे फराज, बीसवीं सदी के तरक्की पसंद शायरों कैफी आजमी, अली सरदार जाफरी और फैज अहमद फैज की जमात के शायर थे। फराज ने एक बार खुद स्वीकार किया था कि पाकिस्तान में विरोध की कविता दम तोड़ चुकी है। उन्होंने कहा था कि भले ही जनता का विरोध बाकी हो लेकिन शायरी में वह अब देखने को नहीं मिलता।

मीर तकी मीर और मिर्जा गालिब को अपना आदर्श मानने वाले फराज ने अपनी शायरी की शुरुआत तो रुमानियत से की लेकिन जल्द ही उनका रुख आम आदमी के सरोकारों की ओर हो गया। उन्होंने अवाम की रोजमर्रा की परेशानियों से लेकर मुल्क की आला हुकूमत की खिंचाई तक हर उस मसले पर अपनी पैनी कलम चलाई जो किसी न किसी तरह इंसानियत से साबका रखती थी।
'यही कहा था मेरी आंख देख सकती है / तो मुझपे टूट पड़ा सारा शहर नाबीना (नेत्रहीन)', 'शहर वालों की मुहब्बत का मैं कायल हूं मगर / मैंने जिस हाथ को चूमा वही खंजर निकला' जैसे अपने शेरों और गजलों के सहारे उन्होंने अपने दुख, अपनी कोफ्त को सार्वजनिक किया।

उन्होंने पाकिस्तान में फौजी हुकूमत की खुलकर आलोचना की। जनरल जिया उल हक के शासन काल में तो उन्हें एकांत कारावास में डाल दिया गया था। बाद के समय में उन्होंने देश ही छोड़ दिया और एक लंबे अरसे तक यूरोप में स्वनिर्वासित जीवन बिताया। सन 2004 में उन्हें पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान 'हिलाल ए- इम्तियाज' दिया गया था, जिसे उन्होंने बाद में विरोध स्वरूप वापस कर दिया था।

मशहूर पाकिस्तानी गायक मेहंदी हसन ने उनकी एक गजल 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ' को इतनी खूबसूरती से गाया कि यह जमाने में उनकी पहचान बन गई । यहां तक कि खुद एक बार फराज ने कहा था कि यह गजल तो अब मेहंदी हसन की हो चुकी।

फ़राज़ की एक मशहूर नज़्म है- 'खाली हाथों को कभी गौर से देखा है फराज / किस तरह लोग लकीरों से निकल जाते हैं / जाने वाले को न रोको कि भरम रह जाए / तुम पुकारो भी तो कब उसको ठहर जाना है / सिर्फ ये सोच कर तुमसे मुहब्बत करते हैं फराज / मेरा तो कोई नहीं, तुम्हारा तो कोई हुआ / वो जिस के पास रहता था दोस्तों का हुजूम / सुना है फराज, कल रात एहसास-ए- तनहाई में मरा।'
अलविदा फराज, अलविदा।