इंटरनेट पर फैल रहा है हिंदी का संसार

अंतरजाल से हिंदी मिला रही है कदमताल। अंतरजाल यानी इंटरनेट जिसे आमतौर पर 'नेट के नाम से जाना जाता है, उसने हिंदीभाषियों को एक बेहतरीन तोहफा भेंट किया है। इंटरनेट ने दुनिया भर की कई भाषाओं को समृद्घ किया है और हिंदी भी इसी प्लेटफॉर्म पर सवार होकर विकास की नई रफ्तार पकड़ रही है। जो लोग गला-फाड़ अंदाज में हिंदी के खात्मे की बात करते हैं, इंटरनेट पर हिंदी के प्रसार ने उनकी जुबान बंद करने में मदद की है।

एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक हिंदी बहुत जल्द इंटरनेट पर अंग्रेजी और चीनी (मंदारिन) भाषा के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा बन जाएगी। इसके तेज विकास का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक यह इंटरनेट पर इस्तेमाल की जाने वाली शीर्ष 10 भाषाओं में भी नहीं है। ङ्क्षहदी ने इस नए माध्यम पर कई प्रतिमान स्थापित किए हैं। इंटरनेट पर हिंदी की लोकप्रियता बढ़ाने में ब्लॉगिंग का अहम योगदान रहा है। वर्ष 2003 में जहां ङ्क्षहदी भाषा का पहला ब्लॉग आलोक कुमार नाम के एक तकनीकी विशेषज्ञ ने '9-2-11 नाम से बनाया। आज इनकी संख्या एक लाख से ऊपर निकल चुकी है। इन ब्लॉगों में से 15-20 हजार को सक्रिय और 5 से 6 हजार को अतिसक्रिय की श्रेणी में रखा जा सकता है। ब्लॉगों ने व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के माध्यम से कहीं आगे बढ़कर कई मकसदों के लिए सामाजिक मंच बनने तक की दूरी तय कर ली है। मौजूदा दौर में हिंदी में सामुदायिक ब्लॉगों के अलावा साहित्य, संस्कृति और सिनेमा जैसे विषयों पर कई ब्लॉग सक्रिय हैं। इन ब्लॉगों पर सामाजिक मुद्दों की भी खूब धूम रहती है।


माइक्रोसॉफ्ट मोस्ट वैल्युएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके वरिष्ठï चिठ्ठाकार रविशंकर श्रीवास्तव के मुताबिक दुनिया भर में बड़ी संख्या में हिंदी भाषियों और हिंदी सेवियों की मौजूदगी को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इंटरनेट पर हिंदी का भविष्य उज्जवल है। श्रीवास्तव इंटरनेट पर हिंदी के प्रसार के काम में लगे हैं। यह हिंदी की ताकत ही है जिसने तमाम अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को अपने तमाम अंकों को इंटरनेट पर जारी करने के लिए मजबूर कर दिया है। 'हंस, 'कथादेश, 'तद्भव नया ज्ञानोदय समेत तमाम प्रकाशित होने वाली गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं के ई संस्करणों के अलावा 'अभिव्यक्ति, 'अनुभूति 'रचनाकर, 'हिंदीनेस्ट, 'कविता कोश सहित हिंदी ब्लॉग और वेबसाइटों पर तमाम स्तरीय देशी विदेशी साहित्य महज एक क्लिक की दूरी पर उपलब्घ है।

आमतौर पर वेब पत्रिकाओं में पहले से छपी हुई सामग्री ही पढऩे को मिलती है। इस मिथक को तोड़ते हुए ज्ञानपीठ युवालेखन पुरस्कार से सम्मानित युवा कथाकार चंदन पांडेय ने अपनी नई कहानी 'रिवॉल्वर एक वेब पत्रिका 'सबद पर जारी कर एक नई पहल की।

सोशल नेटवर्किंग और मोबाइल- ऑर्कुट, फेसबुक के अलावा तमाम नेटवर्किंग वेबसाइट पर हिंदी का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।मोबाइल में हिंदी सॉफ्टवेयर की उपलब्धता ने लोगों का काम और अधिक आसान कर दिया है। सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज) ने भी इंटरनेट पर हिंदी के शुरुआती विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। सीएसडीएस के भाषायी विकास कार्यक्रम से जुड़े इतिहासकार रविकांत शर्मा के मुताबिक शुरुआत में इंटरनेट पर हिंदी देखने के लिए जहां किसी भी फॉन्ट की इमेज (पीडीएफ) ही इस्तेमाल की जा सकती थी।

जिस समय इंटरनेट पर हिंदी के लिए काम कर रहे सरकारी संस्थान टीआईडीएल (टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फॉर इंडियन लैंग्वेज) और सी-डैक जैसे सरकारी विभाग तमाम अव्यावहारिक कोशिशें कर रहे थे, उस दौरान सीएसडीएस ने हिंदी के इस्तेमाल से संबंधित तमाम सॉफ्टवेयर बनाकर उनका मुफ्त वितरण शुरू कर दिया था।

हाथ फेर दें और सभी कुछ

आप पुनीत से मिलेंगे तो मेरे इस हंसमुख युवा दोस्त की आँखों में एक अजीब सा खलल दिखेगा आप को। उसका एक मासूम सा सपना है जिसे करोडो आँखें अलग अलग समय में देखती रही हैं । वो इस दुनिया से खुश नहीं है और एक दिन इसे बदल देना चाहता है। पुनीत को पढना अच्छा लगता है। वहबहुत अच्छी कवितायेँ लिखता है, रंगकर्म उसे बहुत प्रिय है। इन दिनों वह मायएफएम इंदौर में स्क्रिप्टराईटर है ।

हाथ फेर दें और सभी कुछ
मिट जाए साधो
अपना दिल है रेत का टीला
थोडे़ है साधो
इस पगडंडी पे निकले है
मुड़ कैसे जाएँ
हमने कितने सारे रस्ते
छोडे़ है साधो
पहले अल्हड़ और मिजाजी
हाथी जैसे थे
अब राजाजी की परेड के
घोडे़ है साधो
सोच रहे है कैसे वापस
चिपका के आएं
उसके लिए जो इतने तारे
तोडे़ है साधो

मुक्तिबोध की पत्‍नी का रायपुर में निधन

रायपुर। कवि मुक्तिबोध की पत्‍नी शांता मुक्तिबोध का निधन गुरुवार रात हो गया। उनकी उम्र 88 वर्ष थी। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रही थीं। शुक्रवार सुबह 11 बजे उनका अंतिम संस्कार रायपुर के देवेंद्र नगर श्मशानघाट में किया गया। वे रमेश, दिवाकर, गिरीश व दिलीप मुक्तिबोध की मां थीं। उन्हें मुखाग्नि उनके कनिष्ठ पुत्र गिरीश मुक्तिबोध ने दी।
हिंदी कविता के शीर्ष गजानन माधव मुक्तिबोध के संघर्ष के दिनों में शांता जी ने उनका हर वक्‍त साथ दिया। इस बात का जिक्र हरिशंकर परसाई, नेमिचंद जैन, अशोक वाजपेयी जैसे साहित्यकारों ने अपने संस्मरणों में किया है। पति के निधन के बाद बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ उनको मुकाम दिलाने में शांता जी ने अहम भूमिका निभायी।
अंतिम संस्कार में छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष व वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर, दैनिक देशबंधु के स्वामी व प्रधान संपादक ललित सुरजन, प्रेस क्लब अध्यक्ष अनिल पुसदकर, सहारा चैनल के छत्तीसगढ़ ब्यूरो प्रमुख रुचिर गर्ग, छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के अध्यक्ष श्याम बैस, ब्रेवरेज कार्पोरेशन के पूर्व अध्यक्ष सच्चिदानंद उपासने, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के कुलपति सच्चिदानंद जोशी, छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के संचालक उमेश द्विवेदी, नवभारत रायपुर के पूर्व संपादक अनल शुक्ल, नई दुनिया रायपुर के महाप्रबंधक मनोज त्रिवेदी, दैनिक भास्कर के केके सिंह, दैनिक नेशनल लुक के संपादक प्रशांत शर्मा, अधिवक्ता व साहित्यकार कनक तिवारी, पत्रकार व साहित्यकार प्रभाकर चौबे, छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम के महाप्रबंधक सुभाष मिश्र, इप्टा छत्तीसगढ़ के महासचिव अरुण काठोटे सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार व गणमान्य नागरिक मौजूद थे।
(साभार : मोहल्ला लाइव )

वकील करो

वकील करो-
अपने हक के लिए लड़ो |
नहीं तो जाओ
मरो |

2

रटो, ऊँचे स्वर में,
बातें ऊँची-ऊँची
न सही दैनिक पत्रों से लेकर,
खादी के उजले मंचों से
दिन के,
तो रेस्तराओं-गोष्ठियों में ही
उन्हें सुनाते पाये जाओ,
बड़े-बड़े नेताओं के नाम
गाते पाए जाओ!

फिर
हो अगर हिम्मत तो
डटो : यानी-के चोर बाजार में
अपनी साख
जमाओ |

खिलाओ हज़ारों, तो
लाखों कमाओ!
और क्या, हाँ, फिर
सट्टे-फ़स्ट क्लास होटेल-
ठेके-या कि एलेक्शन में
पूंजी लगाओ,
और दो... ‘बड़े-बड़ों’ के बीच में बैठकर...
शान से मूँछों पर ताव!
हाँ, कानी उँगली पे अपनी गाँधी-टोपी
नचाए, नचाए, नचाए जाओ!

3

और आर्ट-
क्या है ? औरत
की जवानी के
सौ बहाने : उसके
सौ
‘फ़ॉर्म’:
जो उसपे झूमे, अदा करो
वही पार्ट :
-इसका भी एक बाज़ार है
समझे न ?

ब्यूटी मार्ट |
इसके माने:
नये से नये मरोड़
दो
रंगों को अंगों को
जिस्म-सी
फिसलती
लाइनों को
सीने में घुलते
शेडों को |

इसमें भी, खोजो तो,
गहरे से गहरे
आदिम
नशों का तोड़
है,
समझे इस कला की
फ़िलासफ़ी?
इसी शराब के
दौर चलाओ,
और ‘आगे’
और ‘आगे’
और ‘आगे’
जाओ
-जाओ !

और देश को ले जाओ
(पता नहीं कहाँ !)

समझे, मेरे
अत्याधुनिक भाई ? !

(- शमशेर बहादुर सिंह)

२५ साल का इंतज़ार और नाटकनुमा न्याय


कभी-कभी लगता है की शहर भी अपने लोगों की तरह हमें कर्ज़दार बनाते हैं. आज भोपाल गैस त्रासदी पर अदालत का मज़ाकनुमा फैसला आने के बाद मुझे लग रहा है की भोपाल के गले से लिपट के रो लूँ. शायद उसका मन भी कुछ हल्का हो जाये. १५००० से ज्यादा मौतों और २५ साल के मानसिक संत्रास की सज़ा २ साल. वाह रे न्याय...

दोहराने की जरूरत नहीं की भोपाल गैस त्रासदी उन घटनाओं का नतीज़ा था जिन्हें किसी भी मोड़ पर थोड़ी चौकसी बरत के रोका जा सकता था. उसके लिए किसी खास उपकरण की जरूरत नहीं थी बस थोडा चौकन्ना मानव मस्तिष्क काफी होता.

२/३ दिसंबर की उस दरमियानी रात मौत सफ़ेद बादलों का रूप धर के जिंदादिल भोपाल की रगों में पैबस्त हुई. और शहर चुपचाप नींद में ही मौत की चादर ओढने लगा। युनियन कार्बाइड कारखाने से रिसी जहरीली मिथाइल आइसोसायनेट गैस के कारण हजारों लोग मारे गये अनेक लोग स्थायी रूप से विकलांग हो गये । भोपाल गैस त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है। उस सुबह यूनियन कार्बाइड के प्लांट नंबर ‘सी’ में हुए रिसाव से बने गैस के बादल को हवा के झोंके अपने साथ बहाकर ले जा रहे थे और लोग मौत की नींद सोते जा रहे थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार लोग मारे गये थे। हालांकि गैरसरकारी स्रोत मानते हैं कि ये संख्या करीब तीन गुना ज्यादा थी। मौतों का ये सिलसिला बरसों चलता रहा। इस दुर्घटना के शिकार लोगों की संख्या हजारों तक बतायी जाती है।

फैसले के बाद भोपाल गैस पीड़ितों का मामला उठाने वाले अब्दुल जब्बार ने कहा कि पहले औद्योगिक त्रासदी हुई और अब न्यायिक त्रासदी हो रही है। घटना के बारे में पहली पूर्व चेतावनी देने वाले पत्रकार राजकुमार केसवानी का कहना है की ये न्याय की दिशा में पहल कदम है। पर ये लापरवाही का मामला नहीं बल्कि जनसंहार का मामला है।
भोपाल शहर पर चौथाई सदी पहले बीते उस हादसे के निशाँ ढूँढने आप को बहुत दूर नहीं चलना पड़ता. बुजुर्गों के चेहरों पर, माओं आँखों में और नवजात बच्चों की किस्मत पर वारेन एंडरसन ने जो सियाही पोती थी वो जस की तस है.
भोपाल शहर में दो साल रहा। उसने सच्चे दोस्त दिए. कुछ ऐसे रिश्ते दिए जो आजीवन साथ रहने हैं. लेकिन माफ़ करना भोपाल हम तुम्हारे लिए वो नहीं कर पाए जो कर सकते थे... जो हमें करना चाहिए था.
(लेख में कुछ तथ्यात्मक बातें बीबीसी की वेबसाइट से साभार )

साए में धूप

इससे पहले की आप अपनी रोजाना की जद्दो जहद को अंतिम समझ लें.इन तस्वीरों को गौर से देखिये..ये तस्वीरें मैंने पिछले साल के जाड़ों में इंदौर से ४०-४५ किमी की दूरी पर ली थीं।



यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है

चलो यहाँ चलें और उम्रभर के लिए
न हो कमीज तो पाँवों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफर के लिए








क्या होता अगर कोलंबस भाई की शादी हो गयी होती...

मेल पर आया एक चुटकुला आप सब से साझा कर रहा हूँ। मजेदार है। कृपया इसे बिना किसी वाद के चश्मे के पढ़ें और आनंद उठायें - ब्लॉगर


What If Columbus Had Been Married ?

He might never have discovered
America, because he would have had to answer all the following questions:

· Where are you going?
· With whom?
· Why?
· How are you going?
· To discover what?
· Why only you?
· What do I do when you are not here?
· Can I come with you?
· When will you be back?
· Would you have dinner at home?
· What would you bring for me?
· You deliberately made this plan without me, didnt you?
· You seem to be making a lot of these programs lately...
· Answer me why?
· I want to go to my mothers house.
· I want you to drop me there.
· I dont want to come back ever!
· What do you mean, OK?
· Why arent you stopping me?
· I dont understand what this whole discovery thing is about.
· You always do things like this.
· Last time you also did the same thing!
· Nowadays you always seem to do this kind of stuff.
· I still dont understand what else is left to be discovered!