"मैं बेसब्री से सिनेमा के अंत की प्रतीक्षा कर रहा हूं"


जब मैं आलोचक था तब भी स्वयं को फिल्मकार मानता रहा।
आज मैं स्वयं को आलोचक मानता हूं , एक प्रकार से हूं भी,
बल्कि पहले से कहीं अधिक मुखर।
अब मैं समीक्षा लिखने के बजाय फिल्म बनाता हूं,
आलोचनात्मकता इसमें समा गई है।
मैं खुद को एक एसा निबंधकार मानता हूं,
जो उपन्यास शैली में निबंध लिखता है व निबंध शैली में उपन्यास।
लिखने की बजाय मैं उन्हें फिल्म देता हूं।
यदि कभी सिनेमा न रहा
तो मैं इस नियति को सहजता से स्वीकार कर लूंगा तथा
टेलीविजन की तरफ मुड़ जाउंगा।
यदि टेलीविजन न रहा तो मैं कागज-कलम थाम लूंगा।
अभिव्यक्ति के सभी रूपों में स्पष्ट निरंतरता है।
वे एक ही हैं।
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मैं बेसब्री से सिनेमा के अंत की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
ज्यां लुक गोदार
(गोदार आैर गोदार में)

स्त्रियां

पढ़ा गया हमें
जैसे पढ़ा जाता है कागज
बच्चों की फटी कापियों का
चनाजोर गरम के लिफाफे बनाने के पहले!
देखा गया हमको जैसे कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलसुबह अलार्म बजने के बाद!
सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर ठसाठस ठुंसी हुई बस में!
भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिशतेदारों के
दुख की तरह!
एक दिन हमने कहा
हम भी इंसान हैं-
हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बीए के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन!
देखो तो एसे
जैसे ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग!
सुनो हमें अनहद की तरह
समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा!
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृशय टहनी से
टिडियां उड़ीं और रंगीन अफवाहें
चीखती हुई चीं चीं
दुष्चरित्र महिलाएं-दुष्चरित्र महिलाएं
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैली
अगरधत्त जंगली लताएं!
खाती-पीतीं सुख से उबी
बेकार बेचैन आवारा महिलाओं का ही
शगल हैं ये कहानियां और कविताएं
फिर ये इन्होंने थोड़े ही लिखी हैं!
(कनखियां इशारे फिर कनखी)
बाकी कहानी बस कनखी है।
हे परमपिताओं, परत पुरुषों
बख्शो बख्शो अब हमें बख्शो
-अनामिका

इलास्टिक व एक अन्य कविता

पुनीत की दो कविताएं इलास्टिक घूम रहा है अब भी:
उनका परिचय मेरे ब्लाग पर यहां पढ़ें

होते है कई तरह के
रिश्तो के बंधन
कुछ सूत से कच्चे
ज़रा सी हरकत , टूट गए
कुछ लोहे से मज़बूत
जोर लगाओ , पंख पसारो
फर्क नहीं कुछ पड़ता है
हमारा रिश्ता
बंधन है इलास्टिक का
अब न जाने कौन जा रहा है दूर
खिंच रहा है कुछ
गर अब तुमने छोड़ा
मैं सहूंगा
मैंने छोड़ा
तुम सहोगी
और सोचो गर ये टूट गया तो
सहेंगे दोनों
अब कुछ यूँ किया जाए
पास आकर
इस तनाव को कुछ कम किया जाए
इस तरह रहेंगे
सलामत
मैं , तुम
और
इलास्टिक भी




घूम रहा है अब भी


पहिया
युद्ध को जाती
सेना के एक रथ का टूट गया
जगह ले ली
किसी दुसरे पहिये ने उसकी
दूर कही से
किसी ने देखा
उस पहिये को
पास गया कुछ पोछा-झाड़ा
घर ले जाकर ठीक किया
आगन में ले जाकर उसको
रखकर आड़ा
उस पर मिटटी के एक लोंदे को रखकर
उसे घुमाया
घूम रहा है अब भी
पहिया

सिर्फ आरक्षण से क्या होगा?

मृत्युंजय कुमार झा
संसदीय गरिमा को तार- तार कर राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पास हो गया है। बिल पास होने पर एक दुसरे की धुर विरोधी बीजेपी नेता सुषमा स्वराज और सीपीम नेता वृंदा करात ने गले मिलकर खूब जश्न का इजहार किया। ऐसे और भी कई नजारे संसद के गलियारों में देखे गए। बिल के समर्थक राजनीतिक पार्टी से लेकर मीडिया तक ने इस बिल को ऐतहासिक करार दिया। हालांकि इसे लोकसभा और 15 विधानसभाओं में पास होना अभी बाकी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर ये बिल पूरी तरह से पास हो भी जाता है तो क्या आम महिलाएओं के लिए जश्न मनाने वाली बात होगी? इस बिल की पृष्ठभूमि में कई ऐसे अनुत्तरित सवाल हैं जिसका जबाव देने की हिम्मत किसी भी राजनीतिक पार्टी में नहीं है।
कल्पना या फिर कामना कीजिए की ये बिल पास हो जाए। तब क्या इस बात की पूरी गारंटी होगी कि संसद में भगवतिया देवी जैसे चेहरे बहुत दिखेंगे, जिनका कोई राजनितिक पृष्ठभूमि नहीं है? शायद नहीं। तब भी वहीं चेहरे दिखेंगे जो अभी दिख रहे हैं। हां उसका रूप जरूर बदल जाएगा। लालू यादव नहीं तो राबड़ी देवी दिखेंगी, मुलायम सिंह नहीं तो उनकी बहु दिखेंगी, शरद पवार नहीं तो उनकी बेटी दिखेंगी। तो फिर सावाल है कि ऐसे में इस कानून का क्या मतलब रह जाएगा।
अब जरा मौजूदा स्थिति को समझिए। बिल के सबसे बड़े हिमायती कांग्रेस पार्टी ने पिछले लोक सभा चुनाव में देश के सबसे ज़्यादा लोकसभा सीटों वाले(80 सीटें) वाले राज्य उत्तर प्रदेश में महज 6 महिला उम्मीदवार को टिकट दिया। और ये हाल तब है जब कि पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष दोनों महिला हैं। इनमें किसी भी ऐसी महिला को टिकट नहीं मिला जिनका कोई पोलिटिकल कनेक्शन न हो। मसलन रामपुर से बेगम नूर बानो को टिकट मिला जिनके पति नवाब जुल्फिकार अली खुद सांसद थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश सिंह की पुत्री राजकुमारी रत्ना सिंह को टिकट मिला और व जितकर संसद पहुंचीं। पूर्वांचल के जाने माने नेता कल्पनाथ राय की पत्नी सुधा राय को मऊ से टिकट दिया गया। लखनऊ से रीता बहुगुणा जोशी को उम्मीदवार बनाया गया जो दिग्गज कांग्रेसी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी हैं। ये तो चंद उदाहरण हैं। बाकी पार्टियों का भी कमोबेश यही हाल है। तो क्या ऐसे में ये उम्मीद की जा सकती है कि महिला आरक्षण बिल पास होने पर ये तस्वीर बदल जाएगी।

अब जरा बिल पर हाय तौबा मचाने वाले पार्टी की मानसिकता देखिए। बिल के विरोध में हंगामा बरपाने वाले यादव तिकड़ी, लालू, मुलायम, और शरद 35 साल से ज़्यादा से राजनीति में सक्रिय हैं। और करीब 20-25 साल से अपनी पार्टी के सारे मामलों में फैसला करने की स्थिति में भी हैं। क्या पिछले 20-25 सालों में लालू यादव को किसी ने रोका कि व अपनी पार्टी से ज़्यादा से ज़्यादा गरीब पिछड़ी महिला को टिकट न दें। किसने रोका कि राबड़ी देवी की जगह किसी दूसरी महिला को मुख्यमंत्री नहीं बनाइए। मुलायम सिंह को किसने रोका कि डिंपल यादव की जगह किसी दूसरी यादव महिला को टिकट न दें। फिर इसकी क्या गारंटी है कि ‘कोटा के अंदर कोटा’ की इनकी मांग मान ली जाए तो यादव तिकड़ी के कुनबे के अलावा बाकी पिछड़ी महिलाओं का भी सशक्तीकरण होगा। दरअसल ये ‘कोटा के अंदर कोटा’ की मांग इसलिए कर रहे हैं ताकि इनकी राजनीतिक ज़मीन नहीं खिसके।

ऐसे में जरुरत इस बात कि है कि सिर्फ राजनीतिक रोटी सेंकने लिए आरक्षण का हल्ला न मचाया जाए, इसे हर पार्टी अपने व्यवहार में भी लागू करे। सिर्फ महिला राष्टपति या महिला लोकसभा अध्यक्ष का नाम गिना देने भर से महिलाओं का सशक्तीकरण नहीं हो जाएगा। किसी राज्य में अगर दलित महिला मुख्यमंत्री है तो वहां की दलित महिला चांदी की थाली में नहीं खाने लगी है। इसलिए महिला आरक्षण सही मायनों में तभी ऐतिहासिक होगा जब उसका दरवाजा सबके लिए खुलेगा।

(बिहार के अररिया जिले में जन्मे मृत्युंजय कुमार झा फिलहाल ज़ी बिज़नेस न्यूज चैनल में एंकरिंग और रिपोर्टिंग करते हैं।)

दुख पालने वाली लड़की



रुलाई धुलाई छोड़कर इधर थोड़ा बैठो
एक एक कर खोलो दुख की पोटली..
दिखाओ अपने छुपाए हुए जख्मों को
कितने दिनों मे ये कितने गहरे हुए

ऐ लड़की सुन रही हो!

बाहर जरा फैला दो यह सब
दुख तुम्हारे बिल्कुल भीग गए हैं
हवा में होती है एक विलक्षण खासियत
कुछ दुखों को उड़ा देती है खुद-ब-खुद

अरे सुन तो रही हो!

दिन!
दिन तो गुजरेंगे ही! दुख पालने वाली लड़की!
सुखने दो सीलन भरी ये जिंदगी
धूप की पीठ पर रोशनी की उमड़ती बाढ़ है
देखो, नाच रहा है सघन वन...

साथ में सुखी हिरन।

ऐ लड़की हंसो,
खुद को देखो गौर से, खुद को प्यार करो

-तसलीमा नसरीन
(कल अंतरराष्ट्रय महिला दिवस है।)
तस्वीर- गूगल से

राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनता रंगपंचमी


मालवा की होली का रंग देश के अन्य इलाकों की होली से जुदा है। देश के ज्यादातर इलाकों में जहां यह रंगीला त्योहार एक दिवसीय कोरम बनकर रह गया है वहीं मालवा निमाड़ अंचल में अभी भी लोग पांच दिन तक रंगों में डूबे रहते हैं। धुलंडी से लेकर रंगपंचमी तक मालवा फगुआ में सराबोर रहता है। इंदौर में होली के अवसर पर यह मेरा पहला साल था। यहां रंगपंचमी को होली पर निश्चित रूप से बढ़त हासिल है। लेकिन यह देखना दुखद है कि किस तरह यहां रंगपर्व का राजनीतिक दुरुपयोग होता है।


होली का त्योहार मालवा यहां नवान्न सेवन से शुरू होता है। गांव के जिन घरों में कोई गमी हो गई हो वहां होली नहीं मनाई जाती। उन परिवारों का दुख बांटने, उन्हें होली के पर्व में शामिल करने के लिए गेर बनाकर लोग उनके घरों को जाते हैं। गेर यानी लोगों का एक समूह जो फाग व भजन गाते हुए उन घरों को जाता है जहां होली नहीं मनाई जा रही।


यहां की होली में पहला दिन होता है होलिका दहन, दूसरा धुलेंडी यानी अबीर गुलाल की मस्ती का आलम, तीसरे-चौथे दिन यही खुमार जारी रहता है। पांचवे यानी रंगपंचमी के दिन यहां पानी और रंग की होली खेली जाती है।


हम बात कर रहे थे गेर की। मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि जीवन के इस उत्सव का ठीक अन्य उत्सवों की भांति राजनीतिक अपहरण हो चुका है। दिन में जब राजवाड़ा पहुंचा तो सांस्कृतिक संगठनों के बैनर तले हजारों की संख्या में राजनीतिक कार्यकर्ता जमा हो चुके थे। जबरदस्त गाने बजाने के साथ पहले से तय मार्ग पर गेर की यात्रा निकली। होली की इस यात्रा में शामिल वाहनों में पानी के टैंकर, रंग गुलाल से भरे ड्रम, अश्लील व फूहड़ नाच गाना।


आम आदमी की न्यूनतम भागीदारी वाले इस उत्सव का शातिर इस्तेमाल सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने के लिए यहां सक्रिय दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ कर रहे हैं। जिन्हें इस काम में नशे की आदी बनती जा रही या बनाई जा रही युवा पीढ़ी का जबरदस्त साथ मिलता है ।


साल भर पानी के लिए तरसने वाले उस शहर में जहां पानी के लिए लोग एक दूसरे का खून तक करने में गुरेज नहीं करते वहां रंगपंचमी की गेर में लाखों लीटर पानी सड़कों पर यूं ही बहा दिया जाता है। यह देखना दुखद है कि कैसे आम लोगों के प्रेम का प्रतीक यह त्योहार राजनीतिक विजय जुलूस में तब्दील होता जा रहा है।


केदारनाथ सिंह की दो कविताएं


तीसरे सप्तक के कवि, आलोचक और चिंतक प्रोफेसर केदारनाथ सिंह को हिंदी अकादमी द्वारा 2009-10 के लिए प्रतिष्ठित शलाका सम्मान देने की घोषणा की गई है। बनारस हिंदू विशविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने यहीं से पीएचडी की उपाधि हासिल की। उत्तरप्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में जन्में केदार जी की कुछ प्रमुख कृतियां हैं- अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर आैर अन्य कविताएं, बाघ, ताल्सताय आैर साइकिल

पेश हैं केदारनाथ जी की दो रचनाएं जो मुझे पसंद हैं-

बनारस
इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन

तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़

इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घनटे
शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाँव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है

आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्‍यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं भी है

जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्‍थंभ के
जो नहीं है उसे थामें है
राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्‍थंभ
आग के स्‍थंभ
और पानी के स्‍थंभ
धुऍं के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्‍थंभ

किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर

सार्त्र की कब्र पर

सैकड़ों सोई हुई क़ब्रों के बीच
वह अकेली क़ब्र थी
जो ज़िन्दा थी
कोई अभी-अभी गया था
एक ताज़ा फूलों का गुच्छा रखकर
कल के मुरझाए हुए फूलों की
बगल में

एक लाल फूल के नीचे
मैट्रो का एक पीला-सा टिकट भी पड़ा था
उतना ही ताज़ा
मेरी गाइड ने हँसते हुए कहा--
वापसी का टिकट है
कोई पुरानी मित्र रख गई होगी
कि नींद से उठो
तो आ जाना!

मुझे लगा
अस्तित्व का यह भी एक रंग है
न होने के बाद!

होते यदि सार्त्र
क्या कहते इस पर--
सोचता हुआ होटल लौट रहा था मैं