तुम्हारा होना...


तुम नहीं हो


तुम्हारी सीट खाली है


दराज में रखा तुम्हारा कप


सोच रहा है कि तुम आओगी


वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है


तुम्हारी सीट पर कोई और बैठेगा


तो कप को बहुत खराब लगेगा


शायद वो मना भी करे


या फिर गिरकर टूट ही जाए


अगर कप टूट गया


तो यहां और भी बहुत कुछ टूटेगा...

सिनेमा और मैं, भाग-३ उर्फ़ जरा माचिस देना भाई

मित्र अखिलेश की जिज्ञासा थी की मैंने कभी वर्जित सिनेमा घरों का रुख किया या नही तो इस बार की पोस्ट उसी अनुभव पर.....



मेरे नए मित्र बन रहे थे और उनकी सोहबत में इन वर्जित सिनेमा घरों में जाने की हसरतें जोर मारने लगी थीं। बाजार आते जाते मैं उन सिनेमा घरों के बाहर लगे पोस्टरों को चोर नजरों से देखता और साथ ही मेरा ध्यान इस बात पर भी रहता कि कहीं कोई परिचित मुझे ऐसा करते हुए देख तो नहीं रहा।


उन पोस्टरों के विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी झूठ न बोलूं तो उन सिनेमा घरों में जाकर फिल्म देखने की इच्छा जोर पकड़ती जा रही थी।
और फिर एक दिन आखिरकार मैंने अपनी सारी नैतिकताओं का गला घोंटा और अपने जिगरी दोस्त के साथ पुष्पराज टाकीज जा पहुंचा जहां जवानी की आग नुमा कोई फिल्म लगी थी जिसके पोस्टर पर मांसल शरीर की मालकिन कुछ लड़कियां आहें टाइप से भर रही थीं।
फिल्म शुरू हो चुकी थी और हम पहले ही लेट हो चुके थे। जैसे तैसे दो खाली सीटें देखकर हम बैठे। फिल्म के आरंभ में एड्स की रोकथाम से संबंधित एक सरकारी विज्ञापन आया। उसके बाद एक दक्षिण भारतीय फिल्म शुरू हुई जिसमें एक नौकर अपनी मालकिन की रंगीन कल्पनाओं में खोया हुआ था। अचानक फिल्म बंद हो गई और परदे पर कोई और रील चलने लगी जिसका फिल्म से कोई लेना देना नहीं था और मेरे खयाल से वहां बैठे दर्शकों को भी उसी की प्रतीक्षा थी क्योंकि उन्होंने सीटियां बजाकर अपनी प्रसन्नता प्रकट की।
मेरा मित्र जवानी को महसूस करने लगा था। उसने जेब से सिगरेट निकाली और अपने पीछे बैठे आगे बैठे सज्जन से माचिस मांगी।
‘‘ जरा माचिस देना भाई साहब’’
आप कल्पना नहीं कर सकते जिस आदमी ने हमें माचिस दी वह उसके पिता थे। मित्र को काटो तो खून नहीं... लेकिन उसके पिता ने न जाने किस समझौते के तहत उसे पहचानने से इंकार कर दिया। हम दोनों तत्काल वहां से निकल भागे।
तीन दिनों बाद मित्र मिला (उस समय मोबाइल नहीं था।) तो उसने मेरी जिज्ञासा शांत करते हुए बताया कि उसकी पिटाई इसलिए की गई क्योंकि वह सिगरेट पीने लगा है...

सिनेमा और मैं भाग- २


मेरे शहर या कहें कस्बे रीवा में पांच टाकीज थीं जिनके नाम थे प्रियदर्शिनी , आकृति, झंकार, पुश्पराज और श्री वेंकट । इनमें से श्री वेंकट और पुश्पराज का तो सार्वजनिक रूप से नाम लेना भी वर्जित था कारण बताने की जरूरत नहीं फिर भी बता देता हूं ये दोनों hall वयस्क प्रधान थे।


कक्षा नौ- दस तक मेरा फिल्मी ज्ञान टेलीविजन तक सीमित था या फिर स्कूल की ओर से दिखाई जाने वाली शिक्षा प्रधान बाल फिल्मों तक। गर्मी की छुट्टियों men मैं अक्सर अपने चाचा के पास सीधी जाया करता था जहां वीडियो हाॅल की भरमार थी। वहां यह वह दौर था जब मिथुन दा गरीबों के मसीहा की भूमिका अख्तियार कर चुके थे।


मैं अक्सर अनिल भैया के साथ वीडियो पार्लर के चक्कर लगाता। वो मुझसे दसेक साल बड़े थे लेकिन हममें जबरदस्त मित्रता थी (है)। भाई साहब राजकुमार के दीवाने थे और बचने के लाख प्रयास के बावजूद यह संक्रमण मुझे भी लग गया। खैर इस पर बात कभी बाद में अभी विषयांतर हो रहा हूं। वीडियो हाल में आलम ये रहता था कि टिकट लेकर घुसने के बाद हाॅल का मैनेजर आता और चार पांच फिल्मों के नाम पुकारता जिस फिल्म के नाम पर दर्शकों का शोर सबसे अधिक तेजी से उभरता उस दिन उसी फिल्म का कैसेट लगाया जाता।


छोटा शहर होने के नाते सभी पार्लर वाले मुझे पहचान गए थे और उन्होंने इशारों इशारों में मुझे यह बता दिया था कि अगर कभी मैं अकेले फिल्म देखने भी आउंगा तो बात मेरे घर तक नही पहुंचेगी।

सिनेमा और मैं, भाग-1


जब से मैं पैदा हुआ मैंने घर में बीबीसी की आवाज ही सुनी है। हमारे घर में लंबे अरसे तक टीवी नहीं था क्योंकि पिताजी की नजर में वो सबसे कम जरूरी चीज थी जिसे घर में होना चाहिए था.


मैं शायद नौ या दस साल का रहा होउंगा॥ रविवार को कौन सी फ़िल्म आ रही है इसकी जानकारी स्कूल में दोस्तों से मिल जाती थी। मन में चिंता समा जाती की कैसे देखूंगा??


पड़ोस में टीवी देखने जाना होता तो एक दिन पहले से ही माहौल बनाना पङता घूम घूम कर खूब पढता ताकि ज्यादातर समय पिताजी की नजर पड़े तो मेरे हाथ में किताब हो। शाम को मां के सामने अर्जी लगाता " मां मैं फलाने के यहाँ टीवी देखने जाऊं... मां पिताजी से सिफारिश करती जाने दीजिये न सुबह से पढ़ रहा है. पिताज़ी की इच्छा पर मेरी एक एक साँस टंगी रहती की वो हाँ कहेंगे या न.....ज्यादातर मौकों पर तो मना ही कर देते. कभी कभी पूछते कौन सी फ़िल्म है........और मैं डरते-डरते नाम बताता.


तो कुछ इस अंदाज में सिनेमा से मेरा पहला परिचय हुआ।
तस्वीर -साभार गूगल

रहामान का जादू वाया स्लमडॉग मिलियनेयर




स्लमडॉग मिलियनेयर की जय जयकार दिगदिगंत में गूँज रही है. फ़िल्म को दस ऑस्कर नोमिनेशन मिले हैं. बॉलीवुड के निर्माता निर्देशक कुढ़ रहे हैं की हम क्यों नही ऐसी फिल्में बना पाते, रहमान ग्लोबल हो गए हैं. इस फ़िल्म में उन्होंने न भूतो न भविष्यति किस्म का संगीत दे दिया है एसा टीवी चैनलों का कहना है.....
मैंने फ़िल्म तो नही देखी इसके गीत जरूर सुने हैं. यकीनन रहमान ने कोई पारलोकिक संगीत नही दिया है. इस फ़िल्म में उनका संगीत अपनी ख़ुद की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं के आसपास भी नही फटकता.
याद कीजिये..........बॉम्बे, रोजा, ताल. स्वदेश, लगान, गुरु, और ऐसी ही अनेक फिल्मों को....
ऐ हैरते आशिकी....नही सामने.....जिया जले.......तू ही रे............ इनमें से कौन सा गाना है जो जय हो से उन्नीस ठहरता है.
तो फ़िर ये जनज्वार किसलिए किसकी मान्यता के लिए भावविभोर हो रहे हैं हम. उस ऑस्कर के लिए जो हॉलीवुड का अंदरूनी पुरस्कार है जिसमें बाहरी फिल्मों के लिए सिर्फ़ एक श्रेणी है, " बेस्ट फोरेन लैंगुएज फ़िल्म "
और फ़िर स्लमडॉग मिलियनेयर तो अपन ने बनाई भी नही यार, फ़िर ये मारामारी किसलिए क्या कभी एसा होगा की हम हॉलीवुड की नक़ल पर रखे नाम बॉलीवुड की जगह कोई असली नाम ढूंढ पाएंगे...................तब तक के लिए हैं ऑस्कर नोमिनेशन पर खुश होना बंद कर देना चाहिए................



तस्वीर साभार -गूगल

मेरा एक सपना है


''मेरा
एक सपना है कि
मेरे बच्चे एक ऐसे समाज में रहें
जहाँ उन्हें उनकी त्वचा के रंग से नही
बल्कि उनके चरित्र से पहचाना जाए.........''
१९ जनवरी को मार्टिन लूथर किंग जूनियर का ८० वां जन्मदिन था ।
तस्वीर-साभार गूगल

असफलताएं



असफलताएं सिर्फ़ तोड़ती नही हैं

बल्कि वो देती हैं


बहुत कुछ जोड़े रखने का साहस


हर बार हम असफल प्रेम से सीख पाते हैं


की गहन दुःख के क्षणों में मुस्कराया कैसे जाता है

इसी तरह हमारे भीतर का अवसाद

निकल कर बिखर जाता है अचानक

जब हम बीच सड़क पर फिसल जाते हैं

अनायास


ठीक ऐसे ही हम कह सकते हैं की


सबसे गहरे और अभिन्न मित्रों के बीच


सबसे मजबूत सेतु की तरह होती हैं


उनकी एक सी असफलताएं