मंटो मेरा महबूब अफसानानिगार


मंटो के जन्मदिन पर पिछले साल यह पोस्ट लगाई थी। इस साल नया कुछ नहीं लिख सका सो उसी लेख को थोड़े हेरफेर के साथ लगा रहा हूं- ब्लागर


आज 11 मई है मेरे महबूब अफसाना निगार सआदत हसन मंटो का जन्मदिन। मंटो की एक पंक्ति है-‘‘ मिट्टी के नीचे दफन सआदत हसन मंटो आज भी यह सोचता है कि सबसे बड़ा अफसाना निगार वह खुद है या खुदा। ’’
ये इबारत पढ़कर एकबारगी आपको लगता है कि यह आदमी कितना दंभी और गुरूर में जीने वाला इंसान रहा होगा लेकिन मंटो के चाहने वाले और उन्हें जानने वालों को पता है कि मंटो का व्यक्तित्व दरअसल कैसा था।
मंटो से मेरा परिचय जिस समय हुआ उस समय मेरी उम्र इतनी नहीं थी कि मैं उनके अफसानों उनमें रखे गए विचारों को समझ पाता। उन दिनों मैं मध्यप्रदेश के सीधी जिले में रहता था। मैंने महज 13 की अवस्था में अपने शहर के राजकीय पुस्तकालय से किताब निकलवाई ‘‘ मंटो मेरा दुश्मन’’ जिसे लिखा था उपेंद्रनाथ अश्क ने। अब याद नहीं कि इस किताब को चुनने के पीछे कारण क्या था। शायद इसका उन्वान। इस पुस्तक में मंटो कि कुछ कहानियों के अलावा उनके बारे में अश्क साहब और कृशन चंदर के संस्मरण थे। मंटों की कहानियां उस समय समझ तो नहीं आईं लेकिन उन्होंने जीवन के उस पहलू से परिचय कराया जो कम से कम हमारे समाज में चर्चा के काबिल नहीं समझा जाता। थोड़ा बड़े हुए तो मंटो की कहानियों पर अपने शहर में एक चर्चा आयोजित करवाई जिसका उद्देश्य ही था उनकी कहानियों को समझना। कालेज पहुंचे तो उनकी कहानी टोबा टेक सिंह को आधार बनाकर एक नाटक यूथ फेस्टिवल में खेला गया, उसमें शायद थोड़ा इनपुट खुशवंत सिंह की ट्रेन टु पाकिस्तान से भी लिया था।

बहरहाल यहां इरादा मंटो की जीवनी सुनाने का नहीं है और उनके बारे में बाते करते हुए जाने कितने पन्ने रंगने तो बस उनके जन्मदिन पर लगा कि उन्हें याद कर लिया जाए मेरी ओर से यही उन्हें श्रद्धांजलि।


बीबीसी के सौजन्य से मंटो की कुछ लघु कथाएं


सआदत हसन मंटो की कहानियों की जितनी चर्चा बीते दशक में हुई है उतनी शायद उर्दू और हिंदी और शायद दुनिया के दूसरी भाषाओं के कहानीकारों की कम ही हुई है.
जैसा कि राजेंद्र यादव कहते हैं चेख़व के बाद मंटो ही थे जिन्होंने अपनी कहानियों के दम पर अपनी जगह बना ली यानी उन्होंने कोई उपन्यास नहीं लिखा.
कमलेश्वर उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ कहानीकार बताते हैं.अपनी कहानियों में विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर जितने तीखे कटाक्ष मंटो ने किए उसे देखकर एक ओर तो आश्चर्य होता है कि कोई कहानीकार इतना साहसी और सच को सामने लाने के लिए इतना निर्मम भी हो सकता है लेकिन दूसरी ओर यह तथ्य भी चकित करता है कि अपनी इस कोशिश में मानवीय संवेदनाओं का सूत्र लेखक के हाथों से एक क्षण के लिए भी नहीं छूटता.
प्रस्तुत है उनकी पाँच लघु कहानियाँ -

बेखबरी का फ़ायदा
लबलबी दबी – पिस्तौल से झुँझलाकर गोली बाहर निकली.खिड़की में से बाहर झाँकनेवाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया.लबलबी थोड़ी देर बाद फ़िर दबी – दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली.सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुँह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में हल होकर बहने लगा.लबलबी तीसरी बार दबी – निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई.चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख़ भी न सकी और वहीं ढेर हो गई.पाँचवी और छठी गोली बेकार गई, कोई हलाक हुआ और न ज़ख़्मी.गोलियाँ चलाने वाला भिन्ना गया.दफ़्तन सड़क पर एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया.गोलियाँ चलानेवाले ने पिस्तौल का मुहँ उसकी तरफ़ मोड़ा.उसके साथी ने कहा : “यह क्या करते हो?”गोलियां चलानेवाले ने पूछा : “क्यों?”“गोलियां तो ख़त्म हो चुकी हैं!”“तुम ख़ामोश रहो....इतने-से बच्चे को क्या मालूम?”

करामात
लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरु किए.लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे,कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौक़ा पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि क़ानूनी गिरफ़्त से बचे रहें.एक आदमी को बहुत दिक़्कत पेश आई. उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थी जो उसने पंसारी की दूकान से लूटी थीं. एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा ख़ुद भी साथ चला गया.शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गये. कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं.जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया.लेकिन वह चंद घंटो के बाद मर गया.दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था.रहे रात उस आदमी की क़ब्र पर दीए जल रहे थे.

ख़बरदार
बलवाई मालिक मकान को बड़ी मुश्किलों से घसीटकर बाहर लाए.कपड़े झाड़कर वह उठ खड़ा हुआ और बलवाइयों से कहने लगा :“तुम मुझे मार डालो, लेकिन ख़बरदार, जो मेरे रुपए-पैसे को हाथ लगाया.........!”

निरुपमा के लिए

युवा पत्रकार निरुपमा पाठक की दिल दहलाने वाली हत्या ने हमारे बीच रह रहे छदम प्रगतिशीलों के नकाब उतारदिए हैं. वो अब हत्यारी कौम के पक्ष में खुल कर सामने गए हैं. वो निरुपमा की मौत को अस्पष्ट बताते हुए कानूनी पेंच को इतनी मजबूती से उठा रहे हैं जैसे की इससे बहुत फर्क पड़ने वाला है की कौन लोग उस युवा संभावना के अंत के जिम्मेदार हैं. निरुपमा पर मेरी पिछली पोस्ट पर साथी पुनीत ने कविता के रूप में एक काव्यात्मक टिप्पणी दी. मेरे कहने पर उन्होंने अपनी उस क्षणिक प्रतिक्रिया को पूरी कविता में तब्दील किया- ब्लॉगर

जयती-जयती
के नारो से
धर्म पताकाएं
लहराई ...
भूख-लूट
क्या लाती
उनको
मुद्दो की सड़को पर भला,
जो
धर्म पे लगी
आंच ले आई ....
वाह ! महान संस्था
वाह ! महान बंधनो की
रक्त मे लिपटी कथा ....
हे महान शोध की
प्रयोगशाला
के जनो ,
हे निचुड़ जाने
को तत्पर
देवीरूपी
स्तनो .....
तेरे देवालय के भीतर ,
हुआ है जो भी
आज तलक वो ,
घटा है बाहर
तो पाबंदी ?
खुले आम अब
सींग दिखाकर ,
नाच रहे है
नंगे नंदी ...
प्रेम था तेरे
सदा सनातन ,
अनंतगामी ,
धर्म का खंभा ,
प्रेम मे ठहराव
आता है !
अब ठहर गया वो
उसके भीतर
तो काहे का
तुम्हे अचंभा ....
सोच रहा हूं
मै बस इतना
पावन था वो
पल भी कितना ..
मां ने आंचल मे
जब अपने
लेकर के
दम घोटा होगा ...
मालूम हुआ होगा
उसको ये ,
कि परिवारो
के बरगद का
तना
खोखला
सड़ा था कितना ...
उसके गर्भ मे
रखा था जो कुछ
सबके दिल से
बड़ा था कितना
...

निरूपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं

सोचा नहीं था कि नए लैपटाप पर कुछ लिखते हुए इस तरह हाथ कांपेगा। 29 अप्रैल 2010 वो तारीख थी जिस दिन निरूपमा पाठक नामक एक युवा सपने का असामयिक अंत हुआ था। वो भी किसके हाथों! उसके घरवालों ने उसकी महज इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वह एक लड़के से शादी करना चाहती थी जो विजातीय था। यह कोई छोटा अपराध नहीं था। परिवार की इज्जत बचाने के लिए इतनी कुबार्नी तो दी ही जा सकती है।

फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह अपने परिवार से बेइंतहा प्यार करती थी। जैसा कि उसने अपनी सोशल नेटवर्किंग आईडी पर भी लिख रखा है। वो आई डी जो कभी दोस्तों से मन की बातें साझा करने का जरिया हुआ करती थी अब आरआईपी के संदेशों से अटी पड़ी है लेकिन निरुपमा अब उस पर कभी लाग इन नहीं करेगी। अब उसे पुलिस खंगालेगी। तलाशे जाएंगे कातिल, उस हत्या के सुराग जिसके बारे में सबको पता है कि वो किसने की है।

निरुपमा अगर मीडियाकर्मी न होती तो शायद उसकी मौत भी देश में रोज होने वाली हजारों मौतों की तरह गुम हो जाती। लेकिन उसके साथियों ने ये नहीं होने दिया। ये सोच कर ही नफरत सी होती है कि हम एक हत्यारे समाज में रह रहे हैं। अपने आसपास ही नजर डालकर देखने की जरूरत है, आखिर कितने लोग हैं जो इस घटना के खिलाफ आवाज उठाने को तैयार हैं। उंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद लोगों के अलावा हमारा प्रतिनिधि समाज हत्यारों के साथ है। निरुपमा की हत्या के बाद उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर जिस तरह के घपले रोज सामने आ रहे हैं डर है कि कहीं यह मामला भी आरुषि हत्याकांड की तरह जांच के अनवरत सिलसिले में न बदल जाए। वैसे भी काश एक निरूपमा, एक रूचिका या एक जेसिका को न्याय मिल जाना इस बात की गारंटी हो पाता कि हमें भविष्य में इस तरह की घटना से दो चार नहीं होना पड़ेगा।

निरूपमा की मौत का बोझ कैसे उठाओगे प्रियभांशु

टीवी पर यह कहकर कि तुम्हें निरुपमा के प्रेग्नेंट होने के बारे में कुछ भी पता नहीं था तुमने न केवल अपने प्रेम को लांक्षित किया बल्कि अपनी मर चुकी प्रेमिका को भी कठघरे में खड़ा किया है। हम कैसे मान लें कि तीन महीने का गर्भ पालने का निर्णय उसका खुद का रहा होगा प्रियभांशु। क्या उसने तुम्हें इस बारे में कुछ नहीं बताया था। फिर वो कौन सी मजबूरी है जो तुम्हें साहस के साथ सच को स्वीकारने का हौसला नहीं दे रही कि निरुपमा की कोख में तुम्हारे प्यार का अंश था।

निरूपमा की हत्या दो दिन बाद से ही तुम्हारे खिलाफ तथाकथित शुचितावादी लोगों ने मोर्चा खोल दिया था। बिना तुमसे बात किये, तुम्हारा पक्ष जाने लोगों ने दोषी करार दे दिया। तुम्हें एक खूबसूरत टैलेंटेड लड़की को अपनी प्रेमिका बनाकर दोस्तों के बीच रुआब गांठने वाली फितरत का कायर घोषित कर दिया। लेकिन प्रियभांशु तुम क्यों उन लोगों को सही ठहराने पर उतारू हो। तुमने क्यों इतने विपरीत हालात में उसे अकेली मरने के लिए हत्यारों के बीच भेज दिया। उसके लगातार आ रहे एसएमएस ने तुम्हें कोई आभास नहीं दिया कि उसके साथ क्या कुछ हो सकता है। तुम उसकी मौत का बोझ कैसे उठाओगे ।

टीवी पर निरुपमा के भाई का चेहरा फिल्म एलएसडी की पहली कहानी की नायिका श्रुति के भाई से हूबहू मिलता है। या शायद मुझे ही ऐसा लगा। जिस बच्ची को पालपोस कर इतना बड़ा किया उसका दम घोंटते हुए हाथ उसकी मां के हों या उसके भाइयों या बाप के अब कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी आंखों में अब भी अपने परिवार की इज्जत बचा ले जाने का अभिमान साफ पढ़ा जा सकता है।

निरुपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं हैं। क्योंकि इस विकल्पहीन समय में हम अब भी तुम्हारे हत्यारों के साथ रहेंगे। स्थानीय पुलिस भी तुम्हारे इज्जतदार परिवार का ही साथ देगी शायद और तुम्हारी मौत का कोई निशाँ बाकी नहीं रह जाएगा लोगों के जेहन में। कोर्ट ने तुम्हारी मां को तीन दिन के लिए पैरोल पर छोड़ा है जानती हो क्यों! ताकि वो तुम्हारे अंतिम संस्कार में शामिल हो सके।

नोट: अभी पोस्ट लिखने के दौरान ही टीवी पर खबर आई है कि निरुपमा की मां की याचिका पर प्रियभांशु के खिलाफ शादी का झांसा देकर उसका यौन शोषण करने का मामला दर्ज करने का आदेश कोर्ट ने दे दिया है। अब हमें इंतज़ार करना चाहिए सुप्रीम कोर्ट की किसी नयी व्यवस्था का जिसमें शायद वो गहरे प्रेम करने वाले लोगों को शारीरिक निकटता से बचने का कोई मार्ग सुझाएगा। वर्ना कौन जाने कल को उनका हश्र भी प्रियाभांशु जैसा हो....

मार्क पोलिस का गिटार और चे-ग्वेरा (उदय प्रकाश का साक्षात्कार - 3)

ब्लाग जगत से लंबे समय तक अनुपस्थित रहने पर जो अजीब सी बेचैनी रही उसके बारे में क्या कहूं। हुआ दरअसल ये कि लंबे समय तक वफादार साथी रहा मेरा डेस्कटाप कंप्यूटर अचानक साथ छोड़ गया। ये जो पिछले लगभग १५ दिनों का अंतराल था वह डेस्कटाप की शहादत व नए लैपटाप के आगमन की खुशियों के बीच का अंतराल था। लेकिन अब जबकि लैपटाप का आना एक सप्ताह के लिए मुल्तवी सा है तो उदय प्रकाश के साक्षात्कार को टुकड़ों में पढ़ाने के अपने अपराध को आगे बढ़ा रहा हूं। वादाखिलाफी के लिए माफी क्योंकि साक्षात्कार इस बार भी पूरा नहीं हो पाया- ब्लागर

दिनेश श्रीनेत- उस दौर में जो बाकी लोग हिंदी लिख रहे थे तो वो कौन थे जिन्हें आप पसंद करते थे?
उदय प्रकाश- ईश्वर की आंख जिन्हें मैंने समर्पित की है वह हैं मोहन श्रीवास्तव। मां की मृत्यु के वक्त मेरी उम्र लगभग १२-१३ साल थी मोहन श्रीवास्तव हायर सेकंडरी में अध्यापक थे।वे लगभग संत की तरह रहते थे। उन्हें पता नहीं मेरे प्रति कैसे गहरी सहानुभूति हो गई। उन्हें यह भी पता चल गया कि इनके पिता जी अल्कोहलिक हो गए हैं तो यह लगभग अनाथ है। उन्होंने मुझे मातापिता दोनों का स्नेह दिया मैं तो लगभग उन्हीं के कारण पढ़ पाया। वे खुद भी बहुत अच्छे कवि थे। कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, धूमिल, राजकमल चौधरी लिख रहे थे। एलेन गिन्सबर्ग उन दिनों आए थे। यह पूरा दौर था जब अज्ञेय की नई कविता का प्रभामंडल टूट रहा था, उसका अभिजात्य टूट रहा था।


दिनेश श्रीनेत- क्या उस दौर में नई कहानी के लेखक सामने आ चुके थे?
उदय प्रकाश- नई कहानी की रचनाएं मैं पढ़ रहा था। चीफ की दावत मैंने पढ़ी थी। भीष्म साहनी, अमरकांत, ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह के रचना कर्म से मैं परिचित था। लेकिन मैं मूलत: कवि हूं तो मैं कविता से जी ज्यादा जुड़ा रहता था। उस समय सबको पढ़ा लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित दोस्तोयेवस्की ने किया।


दिनेश श्रीनेत- क्या वह समय राजनीतिक और वैचारिक रूप से भी कहीं आपको उद्वेलित कर रहा था?
उदय प्रकाश- मोहन श्रीवास्तव लेफ्ट थे। बाद में प्रगतिशील लेखक संघ, मध्य प्रदेश के उपाध्यक्ष भी रहे। उन्हीं के कारण मैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में भी शामिल हुआ। एआईएसएफ का मैं फाउंडर हूं अपने जिले का। वो दौर बहुत सोचने समझने का था। सन ७०-७१ की मेरी डायरी का पहला पन्ना खोलें। उन दिनों मैं कालेज में था। चे-ग्वेरा का एक मित्र एल पटागो नामक कवि था।उसकी मौत हुई तो उसकी समाधि पर उसी की एक कविता चे-ग्वेरा ने खड़े होकर लिखवाई। उस कविता से शुरू होती है डायरी। १७ की उम्र में मैं चे व समूचे लैटिन अमेरिकी मूवमेंट को जानता था। हमारे गांव से ११ किमी दूर जमड़ी गांव था। वहां विभूति कुमार आए थे। खुद को गांधीवादी कहते थे। बाद में स्वीडन चले गए। उनके साथ विदेशियों का एक पूरा ग्रुप आया। इंटरनेशनल ग्रुप आफ नानवायलेंस नामक संस्था बनाई।उनके साथ के मार्क पोलिस नामक अमेरिकी लड़के से मेरी दोस्ती हो गई।वह गिटार बहुत अच्छा बजाता था। मैं १७ साल का था वह २०-२१ का। उसके पास चे कि किताब हम होंगे कामयाब थी। वह किताब मैं पूरी पढ़ गया, मैं उसकी बहादुरी से बहुत प्रभावित हुआ। जब मैं सागर आया तो शिवकुमार मिश्र वहां प्रोफेसर थे। उन्हें बहुत अचरज हुआ कि यह लड़का गांव से आया है व चे के बारे में बातें करता है।
जारी-----

यह एंड आफ एनोसेंस है (उदय प्रकाश का साक्षात्कार-2)


दिनेश श्रीनेत- आज की तारीख में या पहले भी आप रचनात्मक स्तर पर कब इतना दबाव महसूस करते हैं कि यह लगने लगे कि अब कुछ लिख ही देना चाहिए।

उदय प्रकाश- मैं तो शायद यह कहूं कि लेखक जो होता है वह 24 घंटे लेखक होता है।अगर कोई एसी व्यवस्था हो... जैसे लुई बुनुएल की बहुत अच्छी आत्मकथा है- माई लास्ट ब्रेथ। उसमें लुई ने कहा था कि 24 घंटे में आदमी को 20 घंटे सोना चाहिए व स्वप्न देखना चाहिए। बाकी चार घंटे उसे काम करना चाहिए। यह सच है कि सृजन एक स्वप्न है। येहूदा आमीखाई ने लेखक के बारे में लिखा है कि बहुत सक्रिय सर निष्क्रिय धड़ पर रखा है। जब भाषा अधिक हो जाए तो वह चैटर में बदल जाती है। हर कोई बोल रहा है। बड़बड़ा रहा है।

साहित्य में भी यह कल्ट आया है। चैटर में सारे, विशेषण, शब्द व अनुप्रास खप जाते हैं। लेकिन गंभीर डिस्कोर्स जिसमें साहित्य भी एक है। वहां भाषा खर्च नहीं हो रही है। हमारे यहां हो यह रहा है कि कोई समाजशास्त्र पर लिख रहा है तो उसे शरद जोशी सम्मान दिया जा रहा है तथा कोई पुलिस डिपार्टमेंट पर लिख कर शमशेर सम्मान पा रहा है। खेती पर लिखने वाले को मुक्तिबोध सम्मान दिया जा रहा है।

दिनेश श्रीनेत- अगर आप यह मानते हैं कि यह हमारे साहित्य का मौजूदा परिदृशय है तो फिर कहीं न कहीं हमें उसके कारणों की तरफ भी तो जाना होगा। आपके मुताबिक वे कौन से कारण हैं।

उदय प्रकाश- दरअसल एसा परिदृष्य रचा जा रहा है जिसमें साहित्यकारों के स्थान पर फेक्स को स्थापित किया जा रहा है। पहले अच्छे रचनाकार गंभीर संकटों में जीवन बिता रहे थे। अचानक साहित्यिक संस्थानों कल्चरल सेंटर के पास भरपूर पैसा आने लगा है तो उसे लपकने वालों की तादाद भी बढ़ रही है। आइडियोलाजी को दरकिनार कर वामपंथ, दक्षिणपंथ, जनवाद, प्रगतिवाद सब का मकसद है किसी तरह संस्था पर कब्जा जमाना व मनमाफिक खर्च करना। अच्छे खासे संस्थानों में हिंदी साहित्यकारों के गिरोह हैं। हालांकि गंभीर साहित्यकार उसमें शामिल नहीं हैं। यह झुंड आपस में पुरस्कार बांटता मौज मस्ती करता है।

बीते १० सालों में सवा लाख किसान आत्महत्या कर लेते हैं तो कम से कम एक लेखक को तो उत्सव नहीं मनाना चाहिए। यह एज एंड आफ एनोसेंस की है। जनता अब बेवकूफ नहीं हैं। मामूली व्यक्ति भी जानता है कि आप क्या कर रहे हैं। लेखक का काम है लिखना वह सचिन नहीं बन सकता। वह हाशिए पर रहने वाला, एकांत में कागज कलम या कम्प्यूटर पर काम करने वाला व्यक्ति है।

-(.... जारी)-

जो कमजोर हैं वो मारे जाएंगे (उदय प्रकाश का साक्षात्कार -1)


हमारे समय के सबसे सशक्त कथाकारों में से एक उदय प्रकाश का यह साक्षात्कार दिनेश श्रीनेत ने लिया है। साक्षात्कार का प्रकाशन संदर्श (अंक-14 2009) में हुआ है। हाल ही में इस पर मेरी नजर पड़ी। उदय प्रकाश की पहली रचना जो मैंने पढ़ी थी वह थी इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी में छपी कहानी पाल गोमरा का स्कूटर। उसके बाद एक सिलसिला चल निकला जो अब तक जारी है। साक्षात्कार बड़ा है अत: उसको संपादित कर आपके लिए पेश कर रहा हूं इस कोशिश के साथ की उसकी आत्मा बरकरार रहे।

दिनेश श्रीनेत- जिस दौर में आप अपने कहानी संग्रह दरियाई घोड़ा की कहानियां लिख रहे थे- तब से लेकर हाल में प्रकाशित मैंगोसिल तक समय के फैलाव में आप क्या बदलाव देखते हैं? क्या आपको लगता है कि बतौर रचनाकार आपके लिए चुनौती उत्तरोत्तर कठिन हुई है? क्या बदलते परिवेश ने आपकी रचनात्मकता पर भी कोई दबाव डाला है?

उदय प्रकाश- कोई भी रचनाकार - कथाकार समय, इतिहास स्मृति के स्तर पर, खासकर टाइम एंड मेमोरी के स्तर पर लिखता है। दरियाई घोड़ा की कहानियां भी उसके प्रकाशन से बहुत पहले लिखी गई थीं। अगर आप इन कहानियों को देखें तो समय इनमें किसी इको की तरह है। लेकिन दरियाई घोड़ा बहुत निजी स्मृति की कहानी है। वह पिता की मृत्यु पर लिखी कहानी है। इंदौर के एक अस्पताल में मेरे पिता की मृत्यु हुई थी-कैंसर से-तो वह उस घटना के आघात से-उसकी स्मृति में लिखी कहानी है। चौरासी में छपा था संग्रह। तब से अब तक दो दशक का समय बड़े टाइम चेंज का समय रहा है। मेरा मानना है कि किसी भी रचनाकार को अपनी संवेदना लगातार बचा कर रखनी चाहिए। अपने आसपास के परिवर्तन के प्रति ग्रहणशीलता लगातार बनी रहनी चाहिए। जिस मोमेंट आप उसे खो देते हैं आपकी संवेदनशीलता खत्म हो जाती है। फिर आपके पास सिर्फ नास्टेल्जिया या स्मृतियां बचती हैं। उनके सहारे आप चिठ्ठी या पर्सनल डायरी तो लिख सकते हैं कोई रचना-कोई कहानी या कविता नहीं लिख सकते।

दिनेश श्रीनेत - लेकिन क्या ये सच नहीं है कि उस समय के रचनाकार के पास आस्था के कुछ केंद्र तो बचे ही थे। भले ही वे अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे थे। मगर क्या ये सच नहीं है कि आज का लेखक एक अराजक किस्म की अनास्था के बीच सृजन कर रहा है?

उदय प्रकाश- आपको याद होगा जिस वक्त मैंने तिरिछ लिखी थी - उसी दौरान इंदिरा की हत्या व राजीव का राज्यारोहण हुआ था। राजीव नया के बड़े समर्थक थे। जैसे हिंदी कहानी में नई कहानी, नया लेखन जैसे फैशन आते-जाते रहे। तो राजीव नई शिक्षा नीति, नई अर्थनीति का नया चेहरा के अगुआ थे। विशव बैंक -अंतरराष्टीय मुद्राकोष के प्रभुत्व व हस्तक्षेप की पृष्ठभूमि बनने लगी थी। निजीकरण शुरू हो गया। लोगों के बीच डि-सेंसेटाइजेशन बढ़ने लगा। मैं दिनमान में काम करता था। जो पानवाल पहले बहुत हंसकर बोलता था अब वह कैजुअल हो गया। जो चपरासी पहले अपने पत्नी बच्चों का दुखड़ा रोता था उसकी जगह आया नया चपरासी काम की बातें करता था बस। लोगों ने निजी बातें बंद कर दीं। तब मैंने तिरिछ लिखी। शुरू में बड़ा विरोध हुआ। अफवाह फैलाई गई कि यह मारक्वेज की ए क्रानकिल डेथ फोरटोल्ड की नकल है। एक कथाकार - आलोचक सज्जन ने मुझे लगभग डराते हुए कहा कि हंस अपने अगले अंक में एक पन्ने पर ओरिजिनल कहानी व दूसरे पर तिरिछ छापने जा रहा है। यकीन कीजिए मैं चुप रहा मुझे हंसी भी आई। मुझे हिंदी समाज से कुछ मिला नहीं है उन्होंने मुझे गाली या अपमान के सिवा कुछ नहीं दिया है। मैं ईमानदारी से कहूं तो घृणा करता हूं इस समाज ठीक उतनी ही जितनी वे मुझसे करते हैं। तिरिछ एक मार्मिक कथा बन पड़ी इसलिए नहीं कि उसमें पिता की मौत हो गई। यह दरअसल सिविलाइजेशन टांजेशन था। मैं कहना चाह रहा था कि अब जो अरबनाइजेशन होगा जो एक पूरी दुनिया बनेगी उसमें एक मनुष्य जो बूढ़ा है कमजोर है जिसके सेंसेज काम नहीं कर रहे। उसकी नियति मृत्यु होगी। वह बचेगा नहीं अनजाने ही मार दिया जाएगा।

दिनेश श्रीनेत- और बाद के दौर में लगभग यही संवेदनहीनता हम सबके सामने आई और यह भयावह भी होता गया।

उदय प्रकाश- बिल्कुल। अगर आप मोहनदास को देखें तो आप पाएंगे कि वह जो ग्राफ है।उत्तरोत्तर बढ़ता गया है। तो दिनेश जी मैं यह कहना चाहूंगा कि मैंने अपने समय के मनुष्य से कभी अपनी आंखें नहीं हटाईं। मेरे पास कोई पावर नहीं, कोई सत्ता नहीं, कोई पत्रिका नहीं निकालता मैं, कहीं का अफसर नही हूं। तो मैंने देखा कि सामान्य जनता के प्रति ब्यूरोक्रेसी का जो व्यवहार होता है। वही साहित्य के अंदर ब्यूरोक्रेट्स मेरे प्रति करते हैं। यदि रविभूषण यह कहते हैं कि इसने पीली छतरी वाली लड़की मे बोर्खेज की नकल की है.. उस समय मैं बीमार था और पहली बार शायद संयम खोया । पहली बार मैंने अदालत में जाने की पहल की तो ये कहने लगे कि उदय मुकदमेबाज है। तो यातो आप नकल करना स्वीकार कर लीजिए या फिर मुकदमेबाज कहलाइए। यू लेफ्ट रिव्यू और क्रिटकिल इंक्वायरी में लिखने वाले अमिताभ कुमार जो संसार के सबसे विशवसनीय माक्र्सवादी आलोचकों में से हैं वो यदि पाल गोमरा का स्कूटर, तिरिछ और मोहनदास की तारीफ करते हैं तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह हिंदीवालों का गैंग क्या करता है।

(साक्षात्कार लंबा है इसका दूसरा हिस्सा अगले कुछ दिनों में ....)

हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही जा रही है


हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी
और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो
वरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहीं
और मारे जाओगे

हँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो
सब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त होकर
एक अपनापे की हँसी हँसते हो
जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाए

जितनी देर ऊंचा गोल गुंबद गूंजता रहे, उतनी देर
तुम बोल सकते हो अपने से
गूंज थमते थमते फिर हँसना
क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फंसे
अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे

हँसो पर चुटकलों से बचो
उनमें शब्द हैं
कहीं उनमें अर्थ न हो जो किसी ने सौ साल साल पहले दिए हों

बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे
और ऐसे मौकों पर हँसो
जो कि अनिवार्य हों
जैसे ग़रीब पर किसी ताक़तवर की मार
जहां कोई कुछ कर नहीं सकता
उस ग़रीब के सिवाय
और वह भी अकसर हँसता है

हँसो हँसो जल्दी हँसो
इसके पहले कि वह चले जाएं
उनसे हाथ मिलाते हुए
नज़रें नीची किए
उसको याद दिलाते हुए हँसो
कि तुम कल भी हँसे थे !

-रघुवीर सहाय