अभी आंखों में ताव है बाकी
अभी आंखों में ताव है बाकी
जिन्दगी से लगाव है बाकी //
तुम न जाना मेरे रुक जाने पर
फिर चलूंगा कि पांव हैं बाकी //
कोइ आंखों में ख्वाब है बाकी
उम्र का हर पड़ाव है बाकी //
खेल बाकी है अभी चलने दो
अभी तो मेरा दाव है बाकी।
हिंदुस्तान में मौजूद हैं कितने ही गज़ा !
दिल्ली से गज़ा तक के सफर में जिस गज़ा की हम कल्पना करते पहुंचे थे, वह कुछ मायनों में उससे बेहतर था और कुछ में बदतर.
एक तो हमलों के निशाने पर बिरादरी, दूसरी तरफ आसपास के कुछ मुस्लिम पड़ोसी देशों की भी हमदर्दी उसके साथ नहीं है. संयुक्त राष्ट्र जितनी राहत करना चाहता है, वह भी इसराइल की समुद्री घेरेबंदी की वजह से मुमकिन नहीं है. लेकिन उम्मीद से बेहतर इस मायने में था कि कई नए मकान और नई इमारतें बनती दिख रहीं थीं और बच्चे स्कूल-कॉलेज जाते हुए भी.
गज़ा में हम एक ऐसे मुहल्ले में गए जहां एक ही कुनबे के 28-29 लोग हवाई हमले में मारे गए थे. पूरा इलाक़ा अब मैदान सा हो गया है और वहीं एक परिवार कच्ची दीवारें खड़ी करके प्लास्टिक की तालपत्री के सहारे जी रहा है. इस बहुत ही ग़रीबी में जी रहे परिवार ने तुरंत ही कॉफ़ी बनाकर हम सबको पिलाई.
परिवार की एक महिला को कसीदाकारी करते देखकर मैंने पूछा कि इसका क्या होता है? पता लगा कि बाजार में उसे बेच देते हैं. मेरी दिलचस्पी और पूछने पर उसने कुछ दूसरे कपड़े दिखाए जिन पर कसीदा पूरा हो गया था. लेकिन कई कपड़े फटे-पुराने दिख रहे थे जो कि इसराइली हवाई हमले में जख्मी हो गए थे.
मैंने ज़ोर डालकर दाम देकर ऐसा एक नमूना लिया. परिवार की महिलाओं की आंखों में आंसू थे और आगे की ज़िंदगी का अंधेरा भी.
यह शहर मलबे के बीच उठते मकानों और इमारतों का है, जिनके ऊपर जाने किस वक़्त बमबारी हो जाए. कहने को फ़लीस्तीनी लोग भी घर पर बनाए रॉकेटों से सरहद पर हमले करते हैं, लेकिन आंकड़े देखें तो फ़लीस्तीनी अगर दर्जन भर को मारते हैं तो इसराइली हजार से अधिक. एक ग़ैरबराबरी की लड़ाई वहां जारी है.
कहाँ है हिंदुस्तान?
फ़लीस्तीनी इलाक़े में अब सिवाय इतिहास के, कोई हिन्दुस्तान की दोस्ती का नाम नहीं जानता था. उनकी आख़िरी यादें इंदिरा गांधी की हैं जिस वक्त यासर अराफ़ात के साथ उनका भाई-बहन सा रिश्ता था. अब तो इस दबे-कुचले ज़ख़्मी देश से भारत का कोई रिश्ता हो, ऐसा गज़ा में सुनाई नहीं पड़ता.
उनकी ज़िंदगी में अब सिर्फ़ यही रंग बचे हुए हैं
गज़ा के इस्लामिक विश्वविद्यालय में एक विचार-विमर्श के बाद, बमबारी के मलबे के बगल खड़े हुए दो युवतियों से भारत के बारे में मैंने पूछा, एक का कहना था इंदिरा गांधी को अराफ़ात महान बहन कहते थे.
दूसरी युवती का कहना था कि वह पढऩे के लिए भारत आना चाहती हैं लेकिन कोई रास्ता नहीं है.
ऐसा भी नहीं कि फ़लीस्तीनी इलाक़े में इंटरनेट नहीं है. तबाही के बीच भी धीमी रफ्तार का इंटरनेट है और नई पीढ़ी ठीक-ठाक अंग्रेज़ी में तक़रीबन रोज़ ही मुझसे लिखकर बात कर लेती है.
लेकिन नई पीढ़ी ने सिर्फ़ ऐसे कारवां को भारत से आते और जाते देखा है. इस कारवां से परे भारत की हमदर्दी का उसे कोई एहसास नहीं है और मुझसे पूछे जाने पर जब जगह-जगह मैंने कहा कि लगभग पूरा हिन्दुस्तान फ़लीस्तीनी लोगों के मुद्दों से नावाकिफ़ है तो इससे वे लोग कुछ उदास जरूर थे.
लेकिन इसके साथ ही हिन्दुस्तान के बारे में कहने के लिए मेरे पास एक दूसरा यह सच भी था कि लगभग पूरा हिन्दुस्तान ख़ुद हिन्दुस्तान के असल मुद्दों से नावाकिफ़ है और सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी के सुख या अपनी जिंदगी के दुख ही अमूमन उसके लिए मायने रखते हैं.
ऐसे में मैं न सिर्फ़ फ़लीस्तीनी नौजवान पीढ़ी बल्कि रास्ते के देशों में राजनीतिक चेतना के साथ उत्तेजित खड़े मिले नौजवानों से भी यह कहता गया कि ऐसी जागरूकता की ज़रूरत हिन्दुस्तान को भी बहुत अधिक है.
गड़बड़ा गया अनुपात
एक अनाथाश्रम बच्चों से भरा हुआ था जहां फेंके गए ज़िंदा बच्चे लाकर बड़े किए जा रहे थे.
फ़लस्तीनी इलाक़े में बड़ी संख्या में बच्चे अनाथालय में रहते हैं
फ़लीस्तीनी समाज में औरत-मर्द का संतुलन गड़बड़ा गया है, मर्द शहीद और औरतें अकेली.
मुस्लिम रीति-रिवाज़ ही क्यों, आज के भारत में ही कौन अकेली मां को उसके बच्चे पैदा करने पर बर्दाश्त कर सकता है? नतीजन ऐसे बहुत से बच्चे यतीमखाने में थे.
समाज में आबादी और पीढ़ी का अनुपात उसी तरह गड़बड़ा गया है जैसे विश्वयुद्धों के बाद कई देशों में गड़बड़ा गया था.
मानवीय सहायता पहुंचाने का मक़सद तो वहां पहुंचकर पूरा हो गया, पूरे रास्ते के देशों को देखना तो हो पाया था लेकिन एक अख़बारनवीस की हैसियत से फ़लीस्तीनी इलाक़ों को देखना बहुत कम हो पाया.
हमारे साथ वहां घूमते कुछ गैरसरकारी नौजवानों के बारे में भी हमारे एक साथी को शक था कि वे सत्तारूढ़ पार्टी हमास के लिए हमारी निगरानी करते हो सकते हैं. इतने कम वक्त में क्या पता चलता है?
हमें वहाँ चार दिन रहना था. और एक बात तय थी कि हमास और सरकार के लोग अपने कार्यक्रमों में हमारा वक़्त बरबाद करके हमें आम लोगों से दूर रखना चाहते थे. हो सकता है कि ख़तरों के बीच चौकन्नापन उनकी आदत बन गई हो.
नई फ़लीस्तीनी पीढ़ी के पास न वहां से बाहर निकलने की राहें हैं, न दुनिया के बहुत अधिक देशों में उनके स्वागत के लिए बाहें फैली हुई हैं.
बगल के देश सीरिया में जो फ़लीस्तीनी शरणार्थी आधी सदी से बसे हैं, वे जरूर दसियों लाख हैं और सीरिया की सरकार उनका ख़्याल रखती है, सरकारी नौकरी देती है.
लेकिन इसराइली घेरेबंदी की वजह से उनको अपनी ही ज़मीन पर आज तक लौटना नसीब नहीं हो पाया. इस तरह फ़लीस्तीनी इलाक़ों के भीतर रह गए लोग भीतर हैं और बाहर चले गए लोग बाहर.
मौतें और ज़ख़्म
जिस इसराइल ने हमारे पूरे कुनबे को मार डाला है, उसके पड़ोस में रहना या उसे पड़ोस में रहने देने का तो सवाल ही नहीं उठता
एक फ़लस्तीनी छात्रा
गज़ा में एक जगह हमलों में हुई मौतों और जख्मों की तस्वीरों की प्रदर्शनी लगी थी. इसमें हमारे साथ की कुछ भारतीय युवतियां बहुत विचलित सी दिखीं.
उनकी तस्वीर लेते हुए जब उनके चेहरों पर राख सी पुती दिखी तो उनका कहना था कि ऐसा नज़ारा उन्होंने कभी नहीं देखा था और ऐसे में मैं उनकी तस्वीर न लूं.
लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि मौतों के ऐसे मंज़र को देखकर तो इंसान विचलित होंगे ही और यह तस्वीर सिर्फ़ उसी को क़ैद कर रही है.
लेकिन अपनी ही साथी इस लड़की से बात करते-करते मैं यह सोचता रहा कि जिस फ़लीस्तीनी इलाक़े में आए वक़्त लोग असल मौतों को न सिर्फ़ देखते हैं बल्कि भुगतते भी हैं, जहां घायलों को उठाते हुए गर्म लहू की तपन हाथों को लगती है, जहां लहू की गंध भी देर तक सांसों में बसी रहती है, वहां की नौजवान पीढ़ी कितनी विचलित होती होगी.
यही वजह थी कि विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में एक हिन्दुस्तानी सवाल के जवाब में एक फ़लीस्तीनी छात्रा का कहना था, "जिस इसराइल ने हमारे पूरे कुनबे को मार डाला है, उसके पड़ोस में रहना या उसे पड़ोस में रहने देने का तो सवाल ही नहीं उठता."
तकलीफ़देह ज़िंदगी
गज़ा में एक कार्यक्रम में ऐसी औरतों और ऐसे बच्चों की भीड़ थी जो इसराइली जेलों में बंद अपने घर वालों की तस्वीरें लिए बंदी थीं.
डेढ़-दो महीने से फ़लीस्तीन के बारे में सोचते-सोचते अब आत्ममंथन से यह भी दिख रहा है कि हिन्दुस्तान के भीतर भी दबे-कुचले तबकों के बेइंसाफी वाले कितने ही फ़लीस्तीनी इलाक़े जगह-जगह बिखरे हुए हैं.अगर यह कारवां गज़ा के ज़ख्मों के देखने के बाद भारत के भीतर के 'फ़लीस्तीनियों' के ज़ख्म देख पाता है तो वह कारवां की कामयाबी होगी
एक कार्यक्रम में लेखक का वक्तव्य
इनमें कुछ ऐसे लोगों के घरवाले भी थे जो इसराइस के साथ युद्ध में मारे गए थे. लेकिन हिन्दुस्तान में भी पंजाब आदि में ऐसी तकलीफ़देह ज़िंदगियाँ होंगीं जिन्हें देखने का अवसर मुझे अब तक नहीं मिल पाया है.
दिल्ली में कश्मीरी पंडि़तों के शरणार्थी शिविरों तक जाना भी अभी नहीं हो पाया है और बस्तर में हिंसा से बेदखल लोगों के बीच में महज़ एक बार मेरा जाना हुआ है.
इसलिए गज़ा में जब एक टेलीविजन कार्यक्रम में मुझसे पूछा गया कि इस कारवां की मैं क्या कामयाबी मानता हूं? तो सोचकर मैंने कहा, "डेढ़-दो महीने से फ़लीस्तीन के बारे में सोचते-सोचते अब आत्ममंथन से यह भी दिख रहा है कि हिन्दुस्तान के भीतर भी दबे-कुचले तबकों के बेइंसाफी वाले कितने ही फ़लीस्तीनी इलाक़े जगह-जगह बिखरे हुए हैं.अगर यह कारवां गज़ा के ज़ख्मों के देखने के बाद भारत के भीतर के 'फ़लीस्तीनियों' के ज़ख्म देख पाता है तो वह कारवां की कामयाबी होगी."
बिना इसराइली बमबारी और गोलीबारी के भी हिन्दुस्तान के कमज़ोर तबकों पर रोज़ हमले हो रहे हैं और बेइंसाफी जारी है.
मतलब यह कि सिर्फ़ अमरीकी या इसराइली हमलों से गज़ा घायल नहीं होता, वह हिन्दुस्तान के भीतर लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों के हमलों से भी घायल होता है और यहां की बाज़ारू ताक़तों के हमलों से भी.
पांच हफ़्तों के इस सफ़र में दूसरों के ज़ख्म देखते हुए अपनों के ज़ख्मों के बारे में भी सोचने का कुछ मौक़ा मिला और शायद कारवां कुछ दूसरी तरफ़ भी जा सकेंगे.
गज़ा और रास्ते के सफ़र से जुड़ी और बातें फिर कभी, किसी और शक्ल में.
समाप्त.
(सुनील कुमार 'छत्तीसगढ़' अख़बार के संपादक हैं और इस पूरी लेख श्रृंखला में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी विचार हैं बीबीसी के नहीं.)
धोबी घाट... मुंबई डायरीज, एक जल्दबाज समीक्षा

आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म धोबी घाट... मुंबई डायरीज के बारे में हर कोई कह रहा है कि यह चार पात्रों अरुण, मुन्ना शाई और यास्मीन की कहानी है। हालांकि मेरे देखे इस फिल्म में एक और पात्र है जो इन चारों के साथ-साथ हर जगह मौजूद है। वह है मुंबई शहर। मुंबई के बारे में मेरी जानकारी पूरी तरह फिल्मों पर आधारित है। मैं या तो उसकी कल्पना बॉलीवुड के ठिकाने के तौर पर कर पाता हूं या फिर अंडरवल्र्ड के भाई लोगों को अपनी याददाश्त में पैदा करके मैं मुंबई का चित्र अपनी आंखों में उतार पाता हूं। बहरहाल,धोबी घाट फिल्म में मुंबई बतौर एक जिंदा शख्स कहानी के साथ-साथ हर मोड़ पर चलती है। यह एक दूसरा मुंबई है या कहें यह हर वो शहर है जो हम अपने-अपने बलिया, रीवा, भोपाल या बनारस से अपने साथ लेकर किसी भी दूसरे महानगर में जाते हैं। कई दफा वह महानगर के महासागर में मिल जाता है तो कई बार वह हमारे पास ही रह जाता है।
यास्मीन और अरुण - धोबीघाट की शुरुआत होती है यास्मीन नामक उस लड़की की आवाज से जो अपने बेजार पति की गैरमौजूदगी को दूर करने के लिए वीडियो कैमरे के जरिए अपने छोटे भाई से बातें करती है। वह मुंबई और अपने आस पड़ोस के साथ-साथ छोटे भाई से अपनी बातचीत को डिजिटल चिठ्ठïी के रूप में कैसेट में उतारती है लेकिन वह उन्हें कभी कहीं भेज नहीं पाती और आखिरकार वे चिठ्ठिïयां उस कमरे के नए किराए दर अरुण पेंटर (आमिर खान) के हाथ लगती हैं। वह इन वीडियोज को देखता है और यास्मीन के अनुभवों पर एक शानदार पेंटिंग तैयार करता है और इस तरह यास्मीन का मजबूरी भरा एकांत, अरुण के स्वैच्छिक एकांत से मिलकर एक बिकाऊ कला में तब्दील होता है।
शाई- अमेरिका से आई इन्वेस्टमेंट बैंकर और शौकिया फोटोग्राफर शाई जिसके लिए शारीरिक अंतरंगता कोई बोझ नहीं है, वह अरुण के साथ एक रात के संबंध के बाद अपने धोबी मुन्ना (प्रतीक) के जरिए उसकी तलाश करती है। एक रात की बातचीत में और संसर्ग के बाद अल्ल सुबह अरुण द्वारा स्पष्टï सीमा रेखा खींचे जाने के बाद भी वह अरुण के प्रति दीवानी नहीं तो भी जबरदस्त तरीके से आकर्षित जरूर है। इस काम में उसकी मदद करता है मुन्ना धोबी। शाई के खुले व्यवहार से खुद मुन्ना भी उसकी ओर आकर्षित जरूर है लेकिन वह अपनी सीमाएं शराब के नशे में भी पहचानता है। उसके लिए तो मानो शाई का एक बार गले लगा लेना ही काफी है और वह मोम की तरह पिघल जाता है क्योंकि इससे ज्यादा तो वह बेचारा खुद भी सोच नहीं सकता।
मुन्ना- किसी भी किशोर की तरह मुन्ना की अपनी आकांक्षाएं हैं। उसकी खोली की दीवार पर चिपकी सलमान खान की तस्वीर और बॉडी बिल्डिंग का उसका शौक यह बताता है कि वह एक्टर बनना चाहता है। शाई उसके लिए पोर्टफोलियो तैयार करती है जिसके बदले वह उसके लिए अरुण से बार बार मुलाकात या उसकी तलाश का जरिया बनता है। हालांकि एक रात शाई द्वारा मुंबई की सड़कों पर चूहे मारते देख लिए जाने के बाद मुन्ना उससे बचने की भरपूर कोशिश करता है।
गैलरी क्यूरेटर वत्सला का अरुण के घर आकर उससे अंतरंग होने की कोशिश करना और असफल होने पर यह कहना कि आज मूड नहीं है क्या? यह साफ करता है कि तलाकशुदा अरुण (जिसकी पत्नी बेटे के साथ आस्ट्रेलिया में रहती है) यौन संबंधों को लेकर किसी शुचिता में यकीन नहीं करता लेकिन जैसा कि वह शाई से कह चुका होता है। वह किसी कमिटमेंट से बचना चाहता है। वह उपभोग में यकीन करता है लेकिन जिम्मेदारियों में नहीं। वही अरुण यास्मीन की आत्महत्या की कल्पना करके रोता भी है हालांकि आखिर वह यास्मीन भी उसके लिए एक बिकाऊ पेंटिंग ही है।
शाई की घरेलू मेड जो खुद संभवत: कन्वर्टेड क्रिश्चियन है वह उसे मुन्ना से दूर रहने की सलाह देती है। एक बहुत ही हास्यास्पद दृश्य में वह मुन्ना के लिए कांच के गिलास जबकि शाई के लिए कप में चाय लेकर आती है। ये छोटे-छोटे दृश्य बहुत कुछ कह जाते हैं।
फिल्म देखते हुए कुछ पर्सनल सवाल भी तारी हुए। मसलन, क्या यास्मीन का दूसरी औरत वाला दृश्य फिल्माने के दौरान किरण राव और आमिर खान के मन में एक पल के लिए आमिर की पहली पत्नी रीना की याद नहीं आई होगी?ï किरण ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने आमिर से शादी की क्योंकि वह दूसरी गर्लफ्रैंड का दर्जा नहीं चाहती थीं...विडंबना
लाल चौक दंतेवाड़ा और तिरंगा झंडा
दरअसल भाजपा की इस खतरनाक कोशिश के लिए तमाशा या शरारत जैसे शब्द बहुत मासूम पड़ जाते हैं। यह जाहिर तौर पर मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में सांप्रदायिकता का जहर घोलने की बदनीयत ही है जो उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रही है। हर पांचवे साल चुनाव के ऐन पहले मंदिर का बुखार जिस पार्टी को पकड़ लेता हो उसकी इन हरकतों के मंसूबे भला क्या छिपेंगे? इस दुस्साहसी आडंबर का अगर कोई परिणाम होगा भी तो वह निश्चित तौर पर देश की एकता अखंडता के लिए और कश्मीरी अवाम के लिए दुखद ही होगा।
धूमिल याद आते हैं ''क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई और मतलब भी होता है?
निश्चित तौर पर इनकी आजादी के मायने एकदम जुदा हैं।
रायपुर वाले भाई साहब और बिनायक सेन की जाति
आज सुबह सुबह भाई साहब का फोन आया। "दिल्ली आया हुआ हूं। अक्षरधाम मंदिर से निकला हूं। तुम्हारे घर कैसे आना है बतावो।" हमने हड़बड़ी में कह दिया कि मंगलम के आगे प्रेस अपार्टमेंट आ जावो वहीं मिलता हूं। मैं अभी निकल ही रहा था कि दोबार फोन आ गया। मैं समझ गया कि वो आ चुके हैं। उनकी कार का मुंह प्रेस अपार्टमेंट की तरफ था। मैं उन्हें निराश करता हुआ सामने विनोद नगर की सर्वहारा कालोनी से प्रकट हुआ। खेद सहित उनको सूचित किया कि कार विनोद नगर की तंग गलियों में नहीं जा पाएगी। कुछ अपसेट से दिखते भाई साहब पैदल मेरे साथ घर आए।
अम्मा बाबूजी को दंड प्रणाम करने के बाद उनने हमसे सवाल दागा? क्योंजी "तुम्हारे" बिनायक सेन की जाति क्या है? हमने भी कह दिया आप रायपुर में रहते हो "अपने" पुलिसिया हाकिमों से पूछ लो? ये जवाब उनके रिसीविंग प्रोग्राम में फीड नहीं था यानी अनएक्सपेक्टेड था। मामला संभालते हुए उन्होंने कहा नहीं उसकी बीबी के नाम से लगता है कि वह क्रिस्तान है...
मैं उनकी इस अदा पर मर मिटा लेकिन आगे कुछ कहने का मौका नहीं दिया उन्होंने, तुरत मेरी किताबों की आलमारी से लेनिन की "इंपीरियलिज्म द हाइएस्ट स्टेट आफ कैपिटलिज्म" निकाली। उसे पलटा गहरी आंखों से मेरा जायजा लिया। बाबूजी के पास गए। कुछ देर फुसफुस करने के बाद बोले अपने बियाव करले, बाबू बियाव।
मैं अभी लेनिन की किताब से अपने ब्याह का कनेक्शन जोड़ ही रहा था कि वे पास आ गए। देख बाबू तू अभी बच्चा!! है। हमने भी संगठन में काम किया है लेकिन अंत में यही समझे कि मां बाप की मर्जी से ही जीवन का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
मैंने उनके बियाव लेक्चर को उतनी ही तवज्जो दी जितनी देनी चाहिए थी। दो घंटे की संक्षिप्त यात्रा में उनने क्यूबा से लेकर वेनेजुएला तक व सलवा जुडुम से लेकर मनमोहनामिक्स तक मेरा ज्ञान बढ़ाया। अभी वे गोंडवाना एक्सप्रेस में होंगे... मैंने पक्का किया है कि उनके रायपुर पहुंचते ही उनसे बिनायक सेन की जाति!!!! पूछूंगा पक्का।
डॉ सेन : जरूरी सवाल उठाने की मिली सजा
जरूरी सवाल उठाने की मिली सजा
रामचंद्र गुहा
1991 में शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी गई। अब उनके साथी बिनायक सेन को आजीवन कैद का पुरस्कार दिया गया है। डॉ सेन ने जीवन में एक गोली भी नहीं दागी है। उन्हें तो यह भी नहीं पता होगा कि बंदूक थामते कैसे हैं।ती स साल पुराने अपने उस कृत्य पर मुझे आज भी खेद होता है, जब मैंने एक महान व्यक्ति को नींद से जगा दिया था। मैं नई दिल्ली में एक कांफ्रेंस में स्वयंसेवी के रूप में मौजूद था। हम छात्रों से कहा गया कि हम धनबाद के सांसद एके रॉय को बुलाकर लाएं, जो उस वक्त विट्ठलभाई पटेल हाउस स्थित अपने क्वार्टर में थे। खनन उद्योग धनबाद की अर्थव्यवस्था की बुनियाद है और इस शहर से रॉय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीते थे। उनके चुनाव प्रचार के लिए खुद खनन श्रमिकों द्वारा राशि जुटाई गई थी। अपनी ईमानदारी के लिए पहचाने जाने वाले श्रमिक नेता रॉय ने दिल्ली के लुटियंस के किसी बंगले या साउथ एवेन्यू के शानदार फ्लैट में रहने के स्थान पर पार्लियामेंट स्ट्रीट पर स्थित इस भवन के एक कमरे में बसेरा बनाना उचित समझा था।हमने रिसेप्शन पर मिस्टर रॉय के कमरे का नंबर पूछा, लिफ्ट से ऊपर पहुंचे और उनके दरवाजे पर दस्तक दी। किसी ने जवाब नहीं दिया। हमने फिर दरवाजा खटखटाया। हमें वहां से लौट आना था और आयोजकों को कह देना था कि सांसद महोदय कमरे में नहीं हैं। लेकिन हम नौजवान थे और अपने उत्साह का प्रदर्शन करना चाहते थे। हम लगातार दरवाजा खटखटाते रहे। आखिर दरवाजा खुला। हमारे सामने खादी का कुर्ता-पायजामा पहने एक व्यक्ति खड़े थे और वे अपनी आंखें मल रहे थे। उन्होंने बड़ी शालीनता से हमारी बातें सुनीं और फिर हमें बताया कि उनके सांसद मित्र और मेजबान रॉय अभी-अभी कहीं बाहर गए हैं।जिन्हें हमने नींद से जगा दिया था, वे शंकर गुहा नियोगी थे और शायद एक लंबी ट्रेन यात्रा के बाद आराम कर रहे थे। गुहा नियोगी मूलत: बंगाल के थे। बाद में वे भिलाई चले आए और असंगठित श्रमिकों के साथ काम करने लगे। शोषण से पीड़ित श्रमिक गुहा नियोगी के नेतृत्व में एकजुट हुए और बेहतर वेतन की मांग करने लगे। गुहा नियोगी की चिंताओं का दायरा केवल आर्थिक मामलों तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने श्रमिकों के लिए अस्पताल और उनके बच्चों के लिए स्कूल खुलवाए। श्रमिकों की पत्नियों की सहायता से नशा विरोधी अभियान चलाया। गुहा नियोगी की गरिमा और उनकी प्रतिबद्धता के चलते मध्यवर्ग के कई पेशेवर उनसे जुड़े। इन्हीं में से एक थे बिनायक सेन। बिनायक सेन ने वैल्लोर विश्वविद्यालय के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से स्वर्ण पदक प्राप्त किया था। 80 के दशक के प्रारंभ में वे छत्तीसगढ़ चले आए थे। वे तभी से छत्तीसगढ़ में हैं और उन्होंने हर पृष्ठभूमि के मरीजों की देखभाल की है। बिनायक सेन ने अपने आदर्श गुहा नियोगी की ही तरह अन्य क्षेत्रों में भी काम किया। वे आदिवासियों के सामाजिक अधिकारों के प्रति सचेत हुए, जो बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे थे और जिनके बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक से महरूम थे।वर्ष 1991 में शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी गई। अब लगभग बीस सालों बाद उनके मित्र और साथी डॉ बिनायक सेन को आजीवन कैद का पुरस्कार दिया गया है। डॉ सेन ने अपने जीवन में कभी एक गोली भी नहीं दागी है। उन्हें तो शायद यह भी पता नहीं होगा कि बंदूक को थामा कैसे जाता है। उन्होंने माओवादियों की हिंसा की स्पष्ट भत्र्सना की है। उन्होंने सशस्त्र क्रांतिकारियों की गतिविधियों को ‘अमान्य और अस्थायी निदान’ भी बताया था। छत्तीसगढ़ सरकार की नजर में डॉ बिनायक सेन का कसूर यह है कि उन्होंने माओवादी विद्रोहियों को नियंत्रित करने के लिए अख्तियार किए जाने वाले भ्रष्ट और क्रूर तरीकों पर सवाल उठाने का साहस किया था। वर्ष 2005 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा गठित की गई सतर्कता सेना ने दंतेवाड़ा, बीजापुर और बस्तर जिलों में कड़ा रुख अख्तियार किया था। नक्सलवाद से निपटने के नाम पर सेना ने घरों और कुछ मौकों पर तो पूरे गांव को फूंक दिया था। उन्होंने आदिवासी महिलाओं के साथ र्दुव्यवहार किया और पुरुषों को प्रताड़ना दी। नतीजा यह रहा कि हजारों आदिवासियों को अपना घरबार छोड़कर जाना पड़ा, जिनका माओवादियों से कोई ताल्लुक नहीं था।डॉ बिनायक सेन पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने सतर्कता सेना की ज्यादतियों के बारे में अवगत कराया था। डॉ सेन द्वारा लगाए गए आरोप गलत नहीं थे, क्योंकि मैंने स्वयं कुछ गणमान्यजनों (जिनमें बीजी वर्गीस, हरिवंश जैसे सम्मानीय संपादक और इंफोसिस पुरस्कार विजेता नंदिनी सुंदर भी शामिल हैं) के साथ उस क्षेत्र का दौरा किया था और सरकार के अपराधों को दर्ज किया था। डॉ सेन को एक ऐसे तंत्र द्वारा दोषी ठहराया गया है, जिसे मतिभ्रम के शिकार राजनेताओं द्वारा चंद भ्रमित पुलिस अफसरों की मदद से संचालित किया जाता है। निश्चित ही डॉ बिनायक सेन को सुनाई गई सजा को उच्चतर अदालतों में चुनौती दी जाएगी और ऐसा होना भी चाहिए। डॉ सेन की बहादुर पत्नी ने कहा है कि ‘एक तरफ जहां गैंगस्टर और घपलेबाज आजाद घूम रहे हों, वहां एक ऐसे व्यक्ति को देशद्रोही ठहराया जाना एक शर्मनाक स्थिति है, जिसने देश के गरीबों की तीस साल तक सेवा की है।’ मुझे लगता है सभी प्रबुद्ध भारतीय उनके इस मत से सहमत होंगे।
दोहरे मापदंडों वाला हमारा लोकतंत्र
एम जे अकबर
मैं बिनायक सेन के राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं, लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए। भारत दोहरे मापदंडों वाले लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है। भारत एक अजीब लोकतंत्र बनकर रह गया है, जहां बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है और डकैत खुलेआम ऐशो-आराम की जिंदगी बिताते हैं। सरकारी खजाने पर डाका डालने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए भी सरकार को खासी तैयारी करनी पड़ती है। जब आखिरकार उन पर ‘धावा’ बोला जाता है, तब तक उन्हें पर्याप्त समय मिल चुका होता है कि वे तमाम सबूतों को मिटा दें। आखिर वह व्यक्ति कोई मूर्ख ही होगा, जो तीन साल पहले हुए टेलीकॉम घोटाले के सबूतों को इतनी अवधि तक अपने घर में सहेजकर रखेगा। तीन साल क्या, सबूतों को मिटाने के लिए तो छह महीने भी काफी हैं। क्योंकि इस अवधि में पैसा या तो खर्च किया जा सकता है, या उसे किसी संपत्ति में परिवर्तित किया जा सकता है या विदेशी बैंकों की आरामगाह में भेज दिया जा सकता है। राजनेताओं-उद्योगपतियों का गठजोड़ कानून से भी ऊपर है। अगर भारत का सत्ता तंत्र बिनायक सेन को कारावास में भेजने के बजाय उन्हें फांसी पर लटका देना चाहे, तो वह यह भी कर सकता है। बिनायक ने एक बुनियादी नैतिक गलती की है और वह यह कि वे गरीबों के पक्षधर हैं। हमारे आधिपत्यवादी लोकतंत्र में इस गलती के लिए कोई माफी नहीं है। सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और यकीनन रमन सिंह के लिए इस बार का क्रिसमस वास्तव में ‘मेरी क्रिसमस’ होगा। कांग्रेस और भाजपा दो ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो फूटी आंख एक-दूसरे को नहीं सुहाते। वे तकरीबन हर मुद्दे पर एक-दूसरे से असहमत हैं। लेकिन नक्सल नीति पर वे एकमत हैं। नक्सल समस्या का हल करने का एकमात्र रास्ता यही है कि नक्सलियों के संदेशवाहकों को रास्ते से हटा दो। मीडिया इस गठजोड़ का वफादार पहरेदार है, जो उसके हितों की रक्षा इतनी मुस्तैदी से करता है कि खुद गठजोड़ के आकाओं को भी हैरानी हो। गिरफ्तारी की खबर रातोरात सुर्खियों में आ गई। प्रेस ने तथ्यों की पूरी तरह अनदेखी कर दी। हमें नहीं बताया गया कि बिनायक सेन के विरुद्ध लगभग कोई ठोस प्रमाण नहीं पाया गया था। अभियोजन ने गैर जमानती कारावास के दौरान बिनायक के दो जेलरों को पक्षविरोधी घोषित कर दिया था। सरकारी वकीलों की तरह जेलर भी सरकार की तनख्वाह पाने वाले नुमाइंदे होते हैं। लेकिन दो पुलिसवालों ने भी मुकदमे को समर्थन देने से मना कर दिया। एक ऐसा पत्र, जिस पर दस्तखत भी नहीं हुए थे और जो जाहिर तौर पर कंप्यूटर प्रिंट आउट था, न्यायिक प्रणाली के संरक्षकों के लिए इस नतीजे पर पहुंचने के लिए पर्याप्त साबित हुआ कि बिनायक सेन उस सजा के हकदार हैं, जो केवल खूंखार कातिलों को ही दी जाती है।बिनायक सेन स्कूल में मेरे सीनियर थे। वे तब भी एक विनम्र व्यक्ति थे और हमेशा बने रहे, लेकिन वे अपनी राजनीतिक धारणाओं के प्रति भी हमेशा प्रतिबद्ध रहे। मैं उनके राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं, लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए। भारत धीरे-धीरे दोहरे मापदंडों वाले एक लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है। जहां विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए हमारा कानून उदार है, वहीं वंचित तबके के लोगों के लिए यही कानून पत्थर की लकीर बन जाता है। यह विडंबनापूर्ण है कि बिनायक सेन को सुनाई गई सजा की खबर क्रिसमस की सुबह अखबारों में पहले पन्ने पर थी। हम सभी जानते हैं कि ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को नहीं हुआ था। चौथी सदी में पोप लाइबेरियस द्वारा ईसा मसीह की जन्म तिथि 25 दिसंबर घोषित की गई, क्योंकि उनके जन्म की वास्तविक तिथि स्मृतियों के दायरे से बाहर रहस्यों और चमत्कारों की धुंध में कहीं गुम गई थी। क्रिसमस एक अंतरराष्ट्रीय त्यौहार इसलिए बन गया, क्योंकि वह जीवन को अर्थवत्ता देने वाले और सामाजिक ताने-बाने को समरसतापूर्ण बनाने वाले कुछ महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मूल्य हैं शांति और सर्वकल्याण की भावना, जिसके बिना शांति का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता। सर्वकल्याण की भावना किसी धर्म-मत-संप्रदाय से बंधी हुई नहीं है। क्रिसमस की सच्ची भावना का सबसे अच्छा प्रदर्शन पहले विश्व युद्ध के दौरान कुछ ब्रिटिश और जर्मन सैनिकों ने किया था, जिन्होंने जंग के मैदान में युद्धविराम की घोषणा कर दी थी और एक साथ फुटबॉल खेलकर और शराब पीकर अपने इंसान होने का सबूत दिया था। अलबत्ता उनकी हुकूमतों ने उन्हें जंग पर लौटने का हुक्म देकर उन्हें फिर से उस बर्बरता की ओर धकेल दिया, जिसने यूरोप की सरजमीं को रक्तरंजित कर दिया था।यदि काल्पनिक सबूतों के आधार पर बिनायक सेन जैसों को दोषी ठहराया जाने लगे तो हिंदुस्तान में जेलें कम पड़ जाएंगी। ब्रिटिश राज में गांधीवादी आंदोलन के दौरान ऐसा ही एक नारा दिया गया था। यह संदर्भ सांयोगिक नहीं है, क्योंकि हमारी सरकार भी नक्सलवाद के प्रति साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक रवैया अख्तियार करने लगी है।
जूलियन असांज होने का क्या मतलब है?

चंदन के ब्लाग नई बात पर जूलियन असांज पर एक शानदार पोस्ट है, यह बात वहां फौरी प्रतिक्रिया के तौर पर लिखी थी। यहां उसे थोड़ा विस्तार देने की कोशिश है।
जूलियन पॉल असांज के बारे में बात करने का इससेबेहतर समय नहीं हो सकता। एक ऐसे समय में जबकिदेश का घोटालाकाल और देश में पत्रकारिता जगत केस्वयंभू ) नायकों का पतनकाल पूरे चरम पर है। बरसों बरस में करीने से गढ़ीगई मूर्तियों का ऐसा काला कुरूपसच सामने आ रहा है कि देखते उबकाई आती है। दुनिया बदलने का सपना लेकर पत्रकारिता की दुनिया में आईएक पूरी पीढ़ी मजबूरन या तो तर्जुमे को जीवन का आखिरी सच मान बैठी है या फिर पीआर एजेंसी से मिलने वालीकैब और उसके सस्ते महंगे तोहफों को जाहिर है। जूलियन असांज नामक का आदमी दरअसल तराशा हुआ ऐसाचकाचौंध आईना है जिसमें हममें से कई अपनी काली शक्लें देखने में डर रहे हैं। सारी दुनिया में गंध मचाने वालेअमेरिका केलिए मेरे पास कोई गाली नहीं है तो यह भी उतना ही सच है कि असांज के जज्बे के बारे में कुछ भीकहने के लिए भी मेरे पास शब्दों का अभाव है। अगर कुछ है तो सिर्फ सम्मान है। असांज के काम को महज खोजीपत्रकारिता या ऐसे ही किसी और सनसनीखेज शब्द में नहीं बांधा जा सकता। उन्होंने जो जीवन स्वेच्छा से चुना हैउसे हममें से अधिकांश मजबूरी में भी जीना नहीं चाहेंगे। शायद यही अंतर उन्हें असांज बनाता है। (
रही बात अमेरिका की तो मुझे नहीं लगता कि उस नामुराद देश के पास इतना धैर्य है कि वह असांज को सजासुनाने के लिए किसी प्रक्रिया की प्रतीक्षा करेगा। किसी भी दिन असांज को गोली लगने या किसी दुर्घटना में उनकीमौत की खबर आ सकती है और हमें इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा।लेकिन एक फर्क तो आया हैइस दरमियान। दुनिया के किसी कोने में जब भी कभी,शोषण, सच्चाई, साहस की बात होगी तो वह दरअसलजूलियन असांज की बात होगी।हमेशा की तरह एक बार फिर वही चिरपरिचित खेल चालू हो गया है झूठ के साथसच्ची लड़ाई में कथित नैतिकता को हथियार बनाकर सच को परास्त कर देने काखेल। हमें उम्मीद करनी चाहिएकि हर बार की तरह जूलियन असांज एक बार फिर विजेता होकर निकलेंगे और अगर ऐसा नहीं भी होता है तो भीसच्चाई का जो पत्थर वो फेंक चुके हैं वह समय के गर्भ में जाकर ठहरेगा और एक ऐसी पूरी पीढ़ी तैयार करेगा जोझूठ और अन्याय की आंखों में आंखें डालकर उनका प्रतिकार करेगी।
