इक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया.........


कुछ अखबारों ने प्रभाष जी को याद करनेमें भले कंजूसी दिखाई हो लेकिन नेट और ब्लॉग पर उनके चहेतों ने उन्हें टूट कर याद किया है। प्रस्तुत आलेख ज़ी बिज़नेस के एसोसिएट प्रोड्यूसर मृत्युंजय कुमार झा की ओर से। मृत्युंजय सर माखन लाल विवि के मेरे सीनियर हैं। - संदीप

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हो रहे एक दिवसीय मैच में सचिन की ऐतिहासिक पारी देखते हुए जितनी ख़ुशी हो रही थी, उससे ज्यादा ख़ुशी और गुदगुदी इस बात को लेकर हो रही थी की कल के जनसत्ता में प्रभाष जोशी क्या लिखेंगे।
सुबह उठते ही इससे पहले की मैं जनसत्ता अख़बार लपकता मेरे एक मित्र ने फ़ोन किया कि अब कागद कारे(हर रविवार को जनसत्ता में प्रभाष जी का छपने वाला लेख ) नहीं पढ़ पाओगे. मैं चौंका....... ३० सेकंड के भीतर मेरे मन में कई आशंकाएं उठने लगीं...... क्या प्रभाष जी ने जनसत्ता में लिखना छोड दिया, क्या जनसत्ता से कुछ अनबन हो गई? इससे पहले कि मैं किसी नतीजे पर पहुँचता, मित्र कि दूसरी आवाज़ आई........ प्रभाष जी नहीं रहे.............. पैर के नीचे की ज़मीन खिसक गई. प्रभाष जोशी को जाने मुझे बहुत दिन नहीं हुए थे. मैं उन्हें करीब 8 साल से जानता था . और नियमित रूप से तो पढना पिछले साल सितम्बर से ही शुरू किया और मैं अपने आपको खुशकिस्मत मानता हूँ कि रविवार को मेरा साप्ताहिक अवकाश होता है। रविवार की छुट्टी और प्रभाष जी का कागद कारे। छुट्टी का मज़ा दोगुना हो जाता था। लेकिन कागद कारे के वगैर आनेवाला रविवार कैसे बीतेगा ये सोच कर ही दिल बैठ जाता है. प्रभाष जोशी का जाना सिर्फ इस मायने में दुखद नहीं हैं कि व देश के एक वरिष्ट पत्रकार थे. बल्कि उनका जाना इस मायने में दुखद है कि हिंदी पत्रकारिता जगत के माथे से एक गार्जियन स्वरुप नायक का साया उठ गया. यूं कहें कि पत्रकारिता कि थोडी बहुत भी छवि बचाने में प्रभाष जोशी और उनका लेखन ढाल कि तरह काम करता था. जब लोगों के मुंह से मीडिया के प्रति गलियां सुनकर हारता हुआ महसूस करता, तब अचानक से प्रभाष जोशी और उनकी पत्रकारिता का नाम लेते ही बाजी ऐसे पलटती थी कि लोगों कि बोलती बंद हो जाती थी॥ लेकिन आज सचमुच पत्रकारिता कि दुनिया में आपने आपको अनाथ महसूस कर रहा हूँ.
अपनी तनख्वाह बढ़ाने का विरोध करना, होटल के नोट पैड पर किसी को नौकरी के लिए ऑफर लेटर दे देना, मालिक को सीधे अपने अधीनस्थ को फ़ोन करने से मना करना, खुद संपादक रहते हुए अपनी कॉपी एडिट करने का पूरा अधिकार जूनियर्स को देना... इतनी हिम्मत आज के दौर में कौन संपादक कर पायेगा। लेकिन बावजूद इसके कुछ कमाऊ-खाऊ पत्रकार घटिया भाषा में उनका विरोध करते हैं तो उनका क्या किया जाये? खैर बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। लेकिन आज के बाद जब भी जनसत्ता अख़बार पर नजर जायेगी, अख़बार हमेशा खाली ही नज़र आएगा।
बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई
एक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया

प्रभाष जोशी सही मायनों में पत्रकारिता के कुमार गंधर्व थे




ये लेख अजीत कुमार ने प्रभाष जी की स्मृति में लिखा है। वे माखनलाल विवि भोपाल के मेरे सीनियर हैं। हालाँकि जब मैं वहां पहुँचा इनकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। एक दो मुलाकातों में ही दिल के तार मिल गए हमारे। नालंदा जिले में जन्मे अजीत जी शुरू से अपने स्वतंत्रता सेनानी बाबा के बहुत करीब रहे। पिताजी के प्राध्यापक होने के कारन पढ़ाई के संस्कार बचपन से मिल गए...वामपंथी रुझान वाले अजीत जी ने टीवी १८ से करियर शुरू किया अजीत टाईम्स ग्रुप के बाद अब राजधानी के एक बड़े ब्रोकरेज हाउस में काम कर रहे हैं.और हाँ अब कोई कामरेड पुकारता है तो इन्हे अच्छा नही लगता -

मुझसे मेरे मित्र ने कहा कि अजीत प्रभाष जी पर कुछ लिख दो। लेकिन उसके कहने के तकरीबन 12 घंटे बीत जाने के बाद भी मैं इस उधेडबुन में हूं कि आखिर लिखूं तो क्या लिखूं। कारण प्रभाष जी को याद करते ही एक साथ उनकी अनेकों छवियां उभरने लगती है। तकरीबन पिछले 15 सालों से लगातार जनसत्ता पढ रहा हूं। चाहे पटना में रहा, भोपाल में या अभी दिल्ली में जनसत्ता का साथ कभी नहीं छूटा। पत्रकारिता के कूचे से निकलकर ब्रोकरेज फर्म में पहुंचने के बाद भी जनसत्ता और द हिन्दू को ही पढकर अपनी राजनीतिक, सामाजिक साहित्यिक और सांस्कृतिक सजगता को जिंदा रखने की कोशिश कर रहा हूं।
प्रश्न फिर वहीं है कि आखिर प्रभाष जी पर कहां से शुरू करूँ । प्रभाष जी को याद करने पर एक ही साथ गांधी, जयप्रकाश, लोहिया, सी के नायडू विजय मर्चेंट, मुश्ताक अली, कुमार गंधर्व, कबीर सब याद आने लगते हैं। कोई भी भी खास नजरिया प्रभाष जी के लिए अपर्याप्त और अपनी तंगियत का अहसास कराने लगता है। आखिर क्यूं न अपनी तंगियत का अहसास कराए। पांच दशकों की अपनी इस यात्रा में लगातार विकल्प, विरोध और संघर्ष का जो रास्ता उन्होंने अख्तियार किया। प्रभाष जी उन लोगों में नहीं थे जो मंचों पर विकल्प, विरोध और संघर्ष की बातें तो खूब करते हैं लोगों से इन सब पर अमल की अपेक्षा भी रखते हैं लेकिन निजी जिंदगी में ठीक इसके उलट करते हैं। इन मामलों में प्रभाष जी बिल्कुल गांधी और कबीर निकले, जो भी रास्ता अच्छा लगा अकेले उस पर चल पडे।
कबीरा खडा बजार में लिये लुकाठी हाथ जो घर जारै आपनो चलै हमारे साथ।
शायद ही पत्रकारिता के इस युग में ऐसा कोई नाम रहा हो जिसने एक ही साथ राजनीति, खेल, कला, साहित्य और सामाजिक मामलों में इतना हस्तक्षेप किया हो। ऐसा भी नहीं था कि प्रभाष जी का इन तमाम मुद्दों पर हस्तक्षेप सिर्फ हस्तक्षेप नाम की सत्ता को बरकरार रखने के लिए था। प्रभाष जी का हर एक हस्तक्षेप सार्थक और प्रभावकारी रहा। मुझे नहीं लगता पिछले पांच दशकों में राजनीति, क्रिकेट और कुमार गंधर्व पर प्रभाष जी जैसा असर करने वाला लेखन किसी ने किया हो। ऐसा कोई पत्रकार नजर नहीं आता जिसकी राजनीति में इतनी ज्यादा दखलंदाजी रही हो। स्वातंत्रयोत्तर भारत में हुए तमाम राजनैतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक आंदालनों में प्रभाष जी की सक्रिय भूमिका रही। खास अवसरों पर तो प्रभाष जी पत्रकार की जगह सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर नजर आए। लेकिन उनकी राजनैतिक सक्रियता का निजी स्वार्थ और अवसरवादिता से कोई लेना देना नहीं था। आखिर उनका द्ढ विश्वास था कि कि पत्रकारिता के जरिए समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना की जा सकती है। समतामूलक समाज बनाने के रास्ते पर अग्रसर हुआ जा सकता है। राजनीति को उसकी अपनी नैतिकता और धर्म का अहसास कराया जा सकता है। ऐसे समय में जब राजनैतिक धर्म, नैतिकता और शुचिता के बजाए पूरी तरह से धर्म और अवसर की राजनीति ने जगह ले लिया प्रभाष जी के बागी और विरोध के तेवर हस्तक्षेप बनकर सामने आते रहे। अपने विरोध को जताने के लिए उन्हें जो भी जिस समय ठीक लगा उन्होंने किया। विशुद्व राजनीतिक मंचों पर बगावती हुकार भरने से भी बाज नहीं आए। देश के कोने कोने में जाकर लोगों के बीच सत्ता और व्यवस्था में बदलाव का अलख भी जगाया। शब्दों के चितेरे बनकर भी अपनी बात मनवाते देखे गए। मतलब साफ जो उन्हें सही लगा उन्होंने किया। उनके देहावसान के ठीक पहले की ही बात कर लीजिए। उनका विवेक उन्हें जसवंत सिंह की जिन्ना पर लिखी पुस्तक के उर्दू तज्र्जुमें के लोकार्पण के लिए पटना तक खीच ले गया। इसके ठीक पहले आम चुनाव के दरम्यान वे दिग्विजय सिंह की बांका से उम्मीदवारी का पर्चा भराने पहुंच गए। हमारे जैसे लोगों का यह विश्वास कि पत्रकारिता साहित्य के साथ कदम से कदम मिलाकर सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों के प्रसार का बीडा उठा सकती है प्रभाष जी जैसे पत्रकारों के होने की वजह से ही जिंदा है।
प्रभाष जी के देहावसान की खबर मिलने के बाद से लगातार मित्रों से उनकी बात हो रही है। पर हर इक बात के बाद प्रभाष जी की एक के बाद एक और नई छवि आकार लेने लगती है। कभी हूबहू कबीर जैसा बनारस की गलियों में प्रतिरोध का स्वर बुलंद करतेे, कभी कुमार गंधर्व के निर्गुणों सा शून्य में तैरते, कभी तेंदुलकर के बल्ले से रनों की बौछार करते, कभी जयप्रकाश के आंदोलनों में संपूर्ण क्रांति का नारा गूंजयमान करते हुए, कभी केंद्र में वी पी सिंह के नेत्त्व में गैर कांगे्रसी सरकार के गठन की जद्दोजहद में धूल फांकते, कभी सांप्रदायिकता के खिलाफ बुलंद करती असरकारी आवाजों में और भी न जाने कई और कितने रंगों और रूपों में ................... ।
कल ही बातचीत के दौरान संदीप ने बताया कि सर जनसत्ता के रायुपर संस्करण में यह खबर छपी है कि मरने से पहले प्रभाष जी के अंतिम वाक्य थे अपन मैच हार गए, जो उन्होंने सचिन के आउट होने के ठीक बाद अपने बेटे संदीप को फोन पर कहा था। मैंने संदीप को बताया कि सगुण और निगुर्ण, चेतन और अवचेतन व जीवन और मरण दोनों अवसरों में भी जब कोई साथ नजर आए तो आप कल्पना कर सकते हो उस व्यक्ति के अटूट लगाव और रागात्मकता का। कुमार गंधर्व भी हमेशा यही कहते रहे कि निर्गंुण में ही सगुण का असल अस्तित्व है। और प्रभाष जी का व्यक्तित्व भी पांच दशकों तक पत्रकारिता के आसमान में कुमार साहब के निर्गुण पदों सा तिरता रहा।ऐसे भी कुमार गंधर्व प्रभाष जी के सबसे पसंदीदा गायक थे।
प्रभाष जी के व्यक्तित्त्व पर एनडीटीवी की इस टिप्पणी कि वे गांधी, कुमार गंधर्व और सीके नायडू तीनों को मिलाकर एक छवि थे से मै पूरी तरह से सहमत हूं। हां तो मै जिक्र कर रहा था प्रभाष जी के इश्के हकीकी को। निगुर्ण और अटूट लगाव को। क्रिकेट और सचिन के साथ उनका यही लगाव अंततः उनकी मौत का कारण भी बना। मरने से पहले भी उनके जिहवा पर सचिन का ही नाम आया। आखिर उनकी जिद और पसंद उनके लिए आत्महंती आस्था साबित हुई। सचिन को लेकर प्रभाष जी की दीवानगी किस दर्जे की थी इस बात से सामने आती है। कई बार कागद कारे या एंकर स्टोरी में सचिन पर प्रभाष जी के अतिलेखन को लेकर चिढ भी होती थी। कभी कभी उनके लेखन से इस बात का अहसास तक होता था कि वे सचिन को हमेशा की तरह सही साबित करने पर तुले हुए हैं। ऐसे भी अवसर आए जब प्रभाष जी जबरदस्ती सचिन का बचाव अपने तर्कों के सहारे करते देखे गए। लेकिन आज उनके जाने के बाद इस बात का अहसास हो रहा है कि हर इंसान कुछेक मामलों में बिल्कुल आम जनों के माफिक ही होता है। प्रभाष जी के साथ भी बिल्कुल यही बात रही। वे तमाम उम्र क्रिकेट और सचिन के अन्यतम मुरीद रहे। और किसी भी मुरीद को यह गवारा नहीं होता कि कोई उसके दीवाने का सार्वजनिक तौर पर आलोचना करे। हालांकि अपन को भी उस बुराई का अहसास होता है। और शायद प्रभाष जी को भी रहा ही होगा। प्रभाष जी की आमजनों की यह छवि उनके लेखन पर भी हावी रही। हिंदी कथा साहित्य मे भाषा को लेकर जो योगदान प्रेमंचद और निर्मल वर्मा का रहा ठीक वैसा ही काम हिंदी पत्रकारिता के लिए राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी ने किया। जटिल से जटिल मुद्दों को भी प्रभाष जी पाठकों को आम जनों की भाषा में ही समझाते रहे। लेकिन आपको लोहा मानना होगा उनकी बाजीगरी की कि उन्होंने जटिल से से जटिल मुद्दों को भी उतनी ही सरलता और प्रवाह के साथ पेश किया। लेकिन जटिल मुद्दों को सरलता के साथ पेश करने के लिए उन्हें जितनी माथापच्ची करनी पडती थी, गहराईयों में जाना पडता था कितनों से संवाद स्थापित करना पडता था यह सिर्फ उन्हीें के वश की बात थी। आखिर कितनों के पास होता है व्यापक, विस्तृत सोच, लगन और यायावरी का इतना बडा जखीरा-।



कल प्रभाष जी पर लिखी मेरी पोस्ट के बाद चेन्नई से मित्र शशिभूषण की एक लम्बी टिप्पणी आयी उसे आप सब से साझा कर रहा हूँ। शशि कहानियाँ और कवितायें लिखते हैं और इन दिनों केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं...

संदीप,
सुबह मैंने बी.बी.सी. पर जब यह खबर पढ़ी तो तुम्हें फ़ोन लगाया.तुम सो रहे होगे तो रीवा डॉ.साहब(चंद्रिका प्रसाद चंद्र)का नं.मिलाया.वो इन दिनों बीमार हैं सो उनसे भी बात न हो सकी.मेंरे भीतर खालीपन और आँसू जमा हो रहे थे.किसी से बात करके मैं हल्का होना चाहता था.एक ही बात घुल रही थी मन में कि अब जनसत्ता का संपादकीय पेज क्या सोचकर देखूँगा.चुनौती देनेवाले,अन्याय के खिलाफ़ खड़े होनेवाले हस्तक्षेप कहाँ खोजूँगा.
बहुत ईमानदार,सुलझी हुई और सहारा देनेवाली आवाज़ शांत हो गई है.इस आवाज़ का इस तरह अचानक शांत हो जाना उस निडर लौ का बुझना है जो बेहद अँधेरे और उलझे वक्त में साथ देने के लिए जलती है.इस आवाज़ के पूरी तरह नियति के द्वारा चुप कर देने को सह सकना इसकी जगह को भर पाना बहुत मुश्किल है.कल रात में राजकिशोर जी को उनके ब्लाग में पढ़ रहा था तो सोच रहा था प्रभाष जोषी और राजकिशोर जनसत्ता की ये दो आवाज़ें हमारे वक्त की उपलब्धि हैं.मैं प्रभाष जी से कभी मिला नहीं पर पढने से कभी चूका नहीं.जब भी उनका कोई इंटरव्यू टी.वी.,रेडियो या बी.बी.सी.पर सुना भूल नहीं पाया.जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद लेने से इंकार किया था तो बी.बी.सी.के संवाददाता रेहान फजल ने पूछा था इसमें कितनी राजनीति है तो उनका जवाब था राममनोहर लोहिया ने कहा था धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म. सोनिया गांधी के इस निर्णय में भी राजनीति है पर राजनीति का रास्ता अगर त्याग से होकर जाता है तो वही सच्चा रास्ता है और दूर तक जाता है.यह अपने समय की राजनीति के मूल्यांकन की उनकी दृष्टि है.
मैं इस समय में ऐसा अभागा हूँ जिसने आज तक एक भी क्रिकेट मैच पूरा नहीं देखा.पर प्रभाष जोषी का क्रिकेट पर लिखा शायद ही छोड़ा हो.वे क्रिकेट के कवि थे.मैं ख़ुद को हल्का करने के लिए आज कक्षाओं में जबरन प्रभाष जोषी पर ही बोलता रहा.एक बात जो मेंरे मुह पर बार बार आ रही थी वो ये कि प्रभाष जी को अभी दुनिया से जाना नहीं था.वो अलविदा कह गए इसमें यही तसल्ली की बात है कि क्रिकेट के इस प्रेमी को मैच देखते ही मरना था.कुछ और करते हुए वो संसार से विदा होते तो शायद उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती.लंच में घर आकर जब तुम्हारा लेख देखा तो इस बात से भर आया कि ऐसी ही बात तुम उसी वक्त में लिख रहे थे.
मैं एक बात अक्सर सोचता हूँ कि आज जब बड़े से बड़ा पत्रकार ज़्यादा तनख्वाह की पेशकश पर कोई भी अखबार छोड़ सकता है तब प्रभाष जी ने अपना सर्वोत्तम जनसत्ता के लिए दिया.पेशे में सरोकार इसी रास्ते आते हैं.बड़े जनसमूह से कोई इन्हीं शर्तों पर जुड़ता है.करियरिस्ट अवदान सफल होता है पर सार्थक उदात्त श्रम ही होता है.अपने इसी स्वाभाव के कारण प्रभाष जी अवसरवाद के प्रबल आलोचक बने होंगे.उनकी भाषा सबको समझ में आती थी तो यह व्याकरण की नहीं इमानदारी की वजह से था.मैं तो उन पर लगभग निर्भर करने लगा था कि इस विषय पर प्रभाष जी को पढकर अंतिम राय बनाउँगा.अब ऐसी कोई आश्वस्ति मेरे सामने नही होगी.
पिछले दिनों जगदीश्वर चतुर्वेदी आदि उनका जिस तरह चरित्र हनन कर रहे थे उससे मैं बहुत आहत था.सुबह इन्हीं महोदय की मोहल्ला लाइव पर श्रद्धांजली देखी तो चर्चित लेखक कांतिकुमार जैन का आचरण याद आ गया.कांतिकुमार जैन ने शिवमंगल सिंह सुमन का ऐसा ही चरित्र हनन चंद्रबरदाई का मंगल आचरण नामक संस्मरण लिख कर किया था.इसके कुछ ही दिनों बाद जब उनकी मृत्यु हुई तो हंस में ही बड़ी विह्वल श्रद्धांजली लिखी.ऐसे समर्थ लोग अपनी ही बात की लाज नहीं रख पाते.यह ज्यादा चिंताजनक है.
प्रभाष जी का मूल्यांकन करने को काफ़ी लोग हैं.हम कहाँ लगते हैं.मैं उनके अवदान को किसी पैमाने में कस सकूँ इस लायक भी नहीं.सिर्फ़ तुमसे कुछ बाँटना चाहता हूँ.क्योंकि यह दिली मजबूरी लग रही है.यहाँ तमिलनाडु में बारिश का मौसम शुरू ही हुआ है.पिछले तीन दिन से बारिश हो रही है.सुबह खबर पढ़ने के बाद जब मैं खाना खाने बैठा तो लगा शमशान से लौटा हूँ और प्रभाष जी के अंतिम संस्कार के बाद पत्तल फाड़ने की हृदय विदारक रस्म में बैठा हूँ.मैं दिन भर समझना चाहता रहा कि जिससे एक बार भी नही मिला उसके बारे में ऐसा क्यों लग रहा है जैसे अपने ही घर का कोई बुजुर्ग हमेशा के लिए छोड़कर चला गया.इसे नियति भी मान लूँ तो इससे उदासी बढ़ती है कि अब चरमपंथियों,अवसरवादियों,भ्रष्टों,सरोकारों से विमुख लोंगों को कौन ललकार कर लिखेगा?किसकी विनम्र हिदायतें श्रेष्ठ का सम्मान करना सिखाएँगी?
-शशिभूषण November 6, 2009 9:41 AM

प्रभाष जी आपने क्रीज़ क्यों छोड़ दी?


तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे। यह स्तब्ध कर देने वाली खबर आज तड़के एक मित्र से फोन पर मिली। नींद अभी टूटी नहीं थी लेकिन इस खबर से चेतना ऐसी जागी मानो हजारों हजार कांच की बारीक किरचें एक साथ दिमाग में पैबस्त हो गई हों।

प्रभाष जी बड़े पत्रकार थे उन्होंने जनसत्ता जैसा अखबार हमें दिया जिससे पढ़ने के संस्कार मिले। मैं उनकी पेशेवर खूबियों पर नहीं जाना चाहता। मुझे बस उन्हें पढ़ना अच्छा लगता था।

उनकी कलम की ईमानदारी। इस कठिन समय में सच को लेकर जिद और वो सारी बातें जो मुझे किसी और में नहीं दिखती थीं, मुझे उनकी ओर खींचती थी।
कुछ एक अंतरालों को छोड़ दिया जाए तो कमोबेश 20 वर्षों तक कागद कारे पढ़ता रहा उसी ललक के साथ की आज प्रभाष जी ने क्या लिखा होगा।

क्रिकेट और टेनिस पर लिखे उनके आलेख। खासकर सचिन के खेल पर उसी की तरह बेमिसाल कलम का ही जादू था कि सचिन की उम्दा पारियों के बाद हम ये सोचकर सोते थे कि कल प्रभाष जी क्या लिखेंगे! खबरों के मुताबिक कल रात ११.३० के आस पास उनका निधन हुआ जबकि भारत -ऑस्ट्रेलिया मैच करीब ११ बजे ख़त्म हुआ था।लगता है कहीं सचिन की कल रात की बेमिसाल पारी की खुशी और टीम की नाजुक हार का घालमेल तो उनके लिए जानलेवा नहीं बन गया। अगर ऐसा हुआ है तो तमाम रंज के बावजूद मुझे इस बात की खुशी ताउम्र रहेगी कि एक अद्भुत खेलप्रेमी अपने प्रिय खिलाड़ी को सर्वश्रेष्ठ खेलते देखकर गुजरा और एक शानदार खिलाडी ने अपने ऐसे चहेते को अनोखी भेंट दी मरने से पहले।
कुछ अरसा हुआ प्रभाष जी ने कहा थाअब उम्र हो गयी घर वाले चिंता करते हैं। कहते हैं क्रिकेट देखना छोड़ दो लेकिन अपन तो तब तक ऐसा नही कर सकते जब तक अपना सचिन क्रीज़ पर है, फ़िर चाहे जो भी हो। सचिन तो क्रीज़ पर है प्रभाष जी लेकिन आपने क्रीज़ क्यों छोड़ दी।
आगे आगे कोई मशाल सी लिए चलता था
हाय क्या नाम यह उस शख्स का पूछा भी नही

उन्होंने हमेशा वोही किया जो उन्हें सही लगा । एक नयी राह पर चलते हुए उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता के उस दौर से इस दौर तक का सफर तय किया एक मसीहा की तरह । हो सकता है कुछ ऐसे भी मोडों से वो गुजरे हों जो जो दूसरों की नजर में ग़लत रहे हों।

प्रभाष जी ने सती अथवा ब्राह्मणों को लेकर हाल के समय में जो भी बयान दिए। उन्हें संदर्भ से काट कर उनका पाठ करने वालों ने ब्लाॅग जगत में जिस भाषा में उनका विरोध किया वो बेहद शर्मनाक था। बात केवल विरोध की नहीं विरोध के स्तर की थी। प्रभाष जी का विरोध करते हुए बातचीत का भाषा एक बेहतर स्तर हो सकता था। ब्लाॅगियों ने तो उन्हें गली के छोकरे की तरह रगेद ही लिया। लेकिन वो प्रभाष जी थे जिन्होंने सबकुछ सहन कर लिया बिना कोई जवाब दिए । वैसे भी जब आपने किसी को अपराधी ठहरा ही दिया हो तो उसके जवाब देने न देने से होता ही क्या है.
क्या कभी उन्हें एहसास होगा की प्रभाष जोशी क्या थे। हिन्दी पत्रकारिता को सरोकारों से जोड़ कर मौजूदा स्वरुप देने वाले अगुआ थे वो, पेस मेकर लगा होने और दिल के मरीज होने के बाद भी जिस तेवर की पत्रकारिता उन्होंने की और लगातार कर रहे थे वो किस से छिपा है?
खैर जो भी हो मेरे लिए तो आज से जनसत्ता पढने की एक बड़ी वजह कम हो गयी। मैं उनसे कभी मिला नही, उन्हें कभी देखा नही लेकिन उनका जाना बड़ी गहरी चोट दे गया।
पुनश्च : अभी अभी भोपाल में माखनलाल पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष और है हमारे गुरु पीपी सिंह से बात हुई। उन्होंने प्रभाष जी से जूडा एक संस्मरण सुनाया । २ साल पहले ग्वालियर में किसी समारोह में वो और प्रभाष जी आजू बाजू के कमरों में रुके थे। रात के खाने पर जहाँ सअब लोग परहेज कर रहे थे वहीँ प्रभाष जी हर व्यंजन का स्वाद ले रहे थे। सर ने जब उन्हें मुस्करा के कनखियों से देखा तो प्रभाष जी ने कहा
क्या करूँ यार पेस मेकर पर चल रहा हूँ बीमार रहता हूँ, घर वाले कहते हैं यहाँ मत जाओ वहां मत जाओ ये मत करो वो मत करो। अरे जब कुछ करना ही नही होगा तो आदमी जियेगा काहे?

चंदन का ब्लॉग

मित्र- कथाकार चंदन पाण्डेय ने ब्लॉग पर लिखने की पहल कर दी है। यूँ दस्तक तो उसने काफी पहले दे दी थी लेकिन उसका कहना है की अब वह इस पर नियमित रूप से लिखेगा। हालाँकि अभी किसी तरह का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी पर फ़िर भी चंदन के ब्लॉग पर अब तक जो पोस्ट आयी हैं उनमे उसका ख़ुद का लिखा हुआ कम ही है।

व्यक्तिगत रूप से मेरे मन में ये सवाल उठ रहा है की अगर चंदन ब्लॉग पर नियमित रूप से लिखेगा तो वो क्या होगा ? कवितायें, लघु कथाएँ, कहानियां या वैचारिकी। चंदन क्या यहाँ भी अपनी कहानियों का सा जादुई संसार रचेगा, या फ़िर इस नयी विधा से जुड़ना कहीं उसकी रचना धर्मिता पर नकारात्मक प्रभाव तो नही डालेगा?

बहरहाल ये सब बातें तो मैं चंदन से पूछ ही लूंगा लेकिन आप चंदन के ब्लॉग पर यहाँ से जाइए और अपनी राय दीजिये...
चंदन का ब्लॉग

वापसी

ये तस्वीर पिछले जाडों में एक साथी ने ली थीजब मैं दिल्ली में हुआ करता था अब इंदौर मेंहूँ ...................

जद्दो जहद के बाद आज घर पर इन्टरनेट लग गया। ऑफिस में ब्लागस्पाट पर बैन है और कैफे जन आसानी से हो नही पता। इस बीच ढेरों ऐसे प्रसंग निकल गए जिनपर लिखने का मन था लेकिन मन मसोस कर रह गया। आज एक बार फ़िर जाने क्यों वैसे ही लग रहा है जैसे पहली बार ब्लॉग पर लिख रहा हूँ । अब नियमित रहूँगा ये वादाहै................

अधूरी तमन्नाओं का सफर है बाजार


दोस्तों लंबे अरसे बाद ब्लॉग की दुनिया में लौटा हूं। शहर दिल्ली से इंदौर पहुंचने के बाद ब्लॉगिंग की रफ्तार कुछ कारणों से रूक गई थी लेकिन अब फिर से वापस आ चुका हूं। इस बार पढ़िए पत्रिका- वसुधा के फिल्म विशेषांक में छपे मेरे लेख को।

शुक्रिया
संदीप

सागर सरहदी की सन 1982 में आई फिल्म ‘बाजार’ कई मायनों में अपनी समकालीन अथवा उन पूववर्ती फिल्मों से अलग है जो महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई हैं। पता नहीं वे कौन सी वजहें थीं जिनके चलते इस फिल्म को अलोचकों तक ने जानबूझकर हाशिए पर रखा, नतीजतन फिल्म के अच्छे या बुरे पहलुओं पर उस तरह से चर्चा नहीं हो पाई जिसकी यह हकदार है।



बाजार के पहले और बाद में बनी फिल्मों में महिला चरित्र एकदम स्टीरियोटाइप रहे हैं, उसपर मुस्लिम महिलाओं के चरित्र तो एकदम प्रिडेक्टिबल कहे जा सकते हैं। पुरुशों के वर्चस्व वाली फिल्मी दुनिया ने उन्हें अम्मी, आपा, खाला और बीवी या माशूका जैसे चार पांच किरदारों में कैद कर दिया। यकीनन बाजार भी कुछ मायनों में इनसे अलग नहीं रही लेकिन फिर भी बाजार के महिला किरदारों में एक अनोखी चारित्रिक मजबूती उभरकर सामने आती है।



फिल्म की कहानी भले ही हैदराबाद के पारंपरिक मुस्लिम परिवारों के इर्दगिर्द घूमती हो लेकिन वास्तव में बाजार तमाम भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समुदाय के घरों के अंदरूनी हालात का जायजा लेती हुई फिल्म है। इसने उन तल्ख हकीकतों को उजागर किया जिनका सामना इन घरों की महिलाओं को करना पड़ता है।



सिनेमा से काफी पहले साहित्य में राही मासूम रजा ने अपने चर्चित उपन्यास ‘आधा गांव’ में मुस्लिम परिवारों की दुविधा, उनकी उस मनोस्थिति को सामने लाया गया जिससे मुस्लिम समाज आजादी के दौर में गुजर रहा था।



मुख्य कहानी से इतर उपन्यास में अनेक कहानियां साथ-साथ चलती हैं जिनमें कई केंद्रीय पात्र ऊंचे खानदान से ताल्लुक रखतें हैं और उनका सारा जोर अपनी बेटियों की शादी में हड्डी की शुद्धता कायम रखने पर ही है चाहे भले ही उन घरों में परदे के पीछे नौकरों तक से संबंध कायम किए जाते हों।
स़़्त्री बाजारवाद अथवा उपभोक्तावाद के आगमन से सदियों पहले से उपभोग और बाजार में बेचे जाने वाली वस्तु की तरह व्यवहार में लाई गई है और इस बात को समझने के लिए किसी रिसर्च के अध्ययन की आवष्यकता नहीं।



बाजार के केंद्रीय चरित्रों में से एक नजमा (स्मिता पाटिल) को अपना घर छोड़कर निकलना पड़ता है क्योंकि उसकी मां नवाबी आन बान और शान को बरकरार रखने के लिए उसे जिस्मफरोशी करने को मजबूर कर रही है। उसकी मां के तर्क देखिए- ‘‘ हमारे खानदान में नौकरां रखते हैं बेटी नौकरी नहीं करते।’’



- ‘‘ मान जाओ बेटी किसी को कानों कान खबर नहीं होगी।’’
- ‘‘ इनों कोई काम भी तो नहीं करते नवाब हैं न इज्जत जाती है।’’
हालांकि उसके पास नजमा की इस बात का कोई जवाब नहीं है कि क्या ंिजस्म बेचने से इज्जत नहीं जाती़?



नजमा के शायर सलीम (नसीरुद्दीन शाह) के साथ एक तरह के प्लेटोनिक रिलेशन हैं लेकिन अपनी इज्जत का सौदा करने की बजाय वह एक अन्य शख्स अख्तर (भरत कपूर) के साथ निकल जाती है जो उससे शादी करने का अहद करता है।



फिल्म के एक दृष्य में अख्तर के कमरे में घुसते ही नजमा बिना देखे उसे अपने जिस्म का ग्राहक समझ कर चप्पल तान देती है। वह चप्पल दरअसल सिंबल है उसी प्रतिरोध और नफरत का जो किसी स्त्री के मन में अनचाहे पुरुश के प्रति हो सकती है।



यह और बात है कि तमाम दुश्वारियों का हवाला देकर वह नजमा के साथ शादी तो नहीं करता लेकिन शौहर-बीवी जैसे रिश्ते जरूर कायम करता है। एक जगह सलीम नजमा से कहता भी है- ‘‘ तुम इस बाजार में बिकने वाली शै हो। अपने जिस्म को दुकान के शो केस से बचाने के लिए तुमने अख्तर के घर की सजावट बनना पसंद किया। ’’



जिस समय बाजार रिलीज हुई यह वही समय था जब देश में एक महिला प्रधाानमंत्री का शासन था जिसे काफी पहले विपक्षी नेता तक ‘दुर्गा’ की उपाधि दे चुके थे। कमोबेश यही वह समय था जब समाचार पत्र समूह ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पत्रकार अश्विन सरीन ने ‘कमला’ नामक एक आदिवासी लड़की को खरीदकर यह बात दुनिया के सामने ला दी थी कि देश में अब भी स्त्री देह को खरीदने और बेचने का ध्ंाधा जोरों पर है।



इस एक घटना ने समूचे देश केा स्तब्ध कर दिया था। सुप्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर ने इस थीम पर कमला नामक एक चर्चित नाटक भी रचा था जिसमें उन्होंने दिखाया था कि किस तरह अपनी तरक्की को ध्यान में रखकर पत्रकार वर्ग मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रख चुका है।



कमला की देह पर चढ़कर सरीन ने भले ही तरक्की की सीढ़ियां चढ़ ली हों लेकिन कमला की सुध कितने लोगों को है? कमला को संभवतः न्यायालय के आदेष के बाद किसी नारी निकेतन भेज दिया गया और उसके बाद वह वहां से कहीं चली गई। इससे अधिक जानकारी उसके बारे में इससे अधिक जानकारी मैं भी नहीं जुटा पाया। तो यही हमारे समाज के तथाकथित स्त्री बोध और स्त्री चिंता की हकीकत है।



बााजार का कथानक भी कमसिन लड़कियों की बिक्री को ही केंद्र में रखकर बुना गया है।
फिल्म के दो अन्य केंद्रीय पात्र हैं शबनम (सुप्रिया पाठक) और सज्जो (फारुख शेख) जो कम उम्र होने के बावजूद एक दूसरे के साथ संजीदा मुहब्बत में मुब्तिला हैं।



जिस समय सज्जो और शबनम का प्यार परवान चढ़ रहा होता है उसी समय नजमा अख्तर के दबाव में आकर उसके आका ‘जाकिर’ के लिए दुल्हन तलाश करने वापस अपने घर हैदराबाद आती हैै। एक समारोह में जाकिर की नजर शबनम पर पड़ती है और वह उससे शादी कराने का दबाव नजमा के ऊपर डालता है।



जैसे ही लोगों को पता चलता है कि नजमा किसी बड़े आदमी के लिए दुल्हन की तलाश में आई है इलाके की तमाम इज्जतदार बीवियां अपनी अपनी बच्चियों के रिश्ते की बात करने उसके सामने हाजिर हो जाती हैं। नजमा के सामने एक तरह से कमसिन लड़कियों का बाजार ही सज जाता है।



गौर करने वाली बात है कि जाकिर उसी रवायत का नुमाइंदा बनकर सामने आता है जिसके लिए एक से अधिक औरतों का हरम तैयार करना स्टेटस सिंबल से अधिक कुछ नहीं है। यह वही सदियों पुरानी रस्म है जिसमें एक आदमी की अयाशी सामने वाले की त्रासदी बनकर उभरती है।



यह हकीकत है कि बुर्जुआ क्लास ने हरसंभव तरीके से महिलाओं का शोशण किया । फिल्म में जाकिर बुर्जुआ का ही प्रतिनिधि है जो औरत को हर हाल में केवल और केवल उपभोग की वस्तु समझता है और उसके सारे जतन अपनी इस पोजीशन को मजबूत बनाए रखने के लिए है। वहीं सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधि सज्जो तमाम प्रयासों के बावजूद अपनी मोहब्बत को हासिल नहीं कर पाता क्योंकि पराजय उसकी नियति है।



फिल्म के एक दृश्य में जब शबनम और सज्जो की आखिरी मुलाकात होती है तो सुप्रिया पाठक की कातर आवाज में बोला गया वह संवाद - ‘‘ हमने तुम्हें बरबाद कर डाला न सज्जो। ’’
इस पर सज्जो का जवाब - ‘‘ तुम मेरी जिंदगी को नए मानी दिए। नही ंतो क्या था इसमें’’
और फिर शबनम का ये कहना कि हम तुम अगर गरीब न होते तो हमें कोई भी जुदा नहीं कर सकता था। यह पूरा संवाद फिल्म की थीम को समझने के लिए पर्याप्त है।



पाॅपुलर हिंदी सिनेमा में जैसा कि मैंने ऊपर जिक्र किया है मुस्लिम किरदार या तो रहीम भाई, रहमान चाचा, अथवा अम्मी, आपा के रूप में दिखते हैं या फिर हाल के दिनों में वे टेररिस्ट बनकर सामने आते हैं।



अपने खुशनुमा पलों में इन किरदारों के हिस्से या तो लखनवी नफासत के साथ तहजीबी उर्दू बोलना आता है या फिर गजलों और मुजरों की महफिलें सजाना। अपने बुरे दौर में ये किरदार गोलियां दागते हैं।



हिंदी सिनेमा के मुस्लिम किरदार इन्हीं दो छोरों के दरमियान झूलते रहे हैं लेकिन बाजार ने इस परंपरा को तोड़ा। एक हद तक पारंपरिक होने के बावजूद इसके किरदारों की मजबूती देखने लायक है।
पहले आई तमाम हिंदी फिल्मों के मुस्लिम किरदार दरअसल अरेबियन नाइट्स के किरदारों का ही एक्सटेेंशन हैं हम उन्हें बड़ी आसानी से शीरीं- फरहाद, लैला मजनूं आदि से रिलेट कर सकते हैं उन फिल्मों में वास्तविक मुस्लिम कल्चर अथवा उसका सोशल कंटेक्स्ट नहीं खोजा जा सकता।



बाजार के विशुद्ध मेलोड्रामा होने के बावजूद उसमें रियलिज्म की झलक मिलती है। ठीक उसी तरह जैसे राजकपूर की प्रेेमरोग तमाम नाटकीयता के बावजूद हिंदू समाज की एक मूल समस्या विधवा विवाह की ओर लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब होती है।



बाजार की थीम में महिलांए हैं ये महिलांए गरीब और मुसलमान होने के कारण तिहरी मार झेलती हैं। गरीबी, लाचारी, बेरोजगारी, और झूठे पारिवारिक दंभ के बीच उनका औरत होना उनकी समस्याओं में कई गुना इजाफा कर देता है।



हालांकि बाजार के महिला किरदार चारित्रिक मजबूती का बेहतरीन उदाहरण पेश करते हैं अपनी नियति को समझते हुए भी नजमा का जाकिर से बोला गया संवाद- ‘‘जाकिर भाई, आपके बाजार में सबसे सस्ती अगर कोई चीज है तो वह है औरत।’’



या फिर फिल्म के अंत में शबनम का बोला गया संवाद- ‘‘ हम अगर तुम्हारे न हुए सज्जो तो...। ’’
प्रतिरोध के अंतिम प्रयास में शबनम आत्महत्या को हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है और निकाह के बावजूद जाकिर के हाथ लगने से पहले ही खुद को खत्म कर लेती है वहीं नजमा भी अख्तर को छोड़कर चली जाती है अपनी पहचान की तलाश में।



बाजार का डिप्रेसिव टोन भी फिल्म का महत्वपूर्ण पहलू है। अक्सर इसे भी फिल्म की आलोचना का विशय बनाया गया है। यह डिप्रेसिव टोन उसे रियलिस्टिक टच तो प्रदान करता ही है साथ ही उसे कुछ हद तक नकारात्मक भी बनाता है। यह टोन कई दफा दर्शकों को भी अपनी चपेट में ले लेता है।



फिल्म जहां कई बार रुलाती है वहीं ऐसा भी महसूस होता है कि जैसे अब इसे और आगे नहीं देखा जा सकता। यह माध्यम की सफलता तो है लेकिन कई अवसरों पर यह फिल्म की सीमा भी बन जाता है।
नसीरुद्दीन षाह और स्मिता पाटिल जैसे आला अदाकारों की मौजूदगी में बाजार दरअसल फारुख षेख और सुप्रिया पाठक की फिल्म है। बाजार मंे फारुक षेख की अदाकारी के लिए एक ही षब्द है मेरे पास ‘अद्भुत’। उन्हें पहली बार मैंने देखा था दूरदर्षन के धारावाहिक आखिरी दांव में, जिसमें वह और दीप्ति नवल मुख्य भूमिका में थे।



बाजार मंे फारुख ने गरीब, बेरोजगार मुस्लिम युवा की भूमिका में जो जान फूंकी है वह आज की सिनेमाई युवा की छवि से कोसांे दूर होकर भी कितनी अजीज है। याद कीजिए षबनम के मां बाप से सज्जो का संवाद या फिर षबनम के साथ फिल्म के आखिरी दृष्यांे में से एक।



षबनम की भूमिका मंे सुप्रिया पाठक ने एक कम उम्र घरेलू लड़की की भूमिका निभाते हुए भी परिपक्वता की बुलंदियों को छुआ है। बाजार के सभी कलाकारों को उनकी पूर्णता के लिए सलाम।
बाजार के बाद सागर सरहदी की निर्देशित एक और फिल्म हाल ही में आई है ‘चैसर’ । मैं हमेशा सोचता हूं कि बाजार जैसी सशक्त फिल्म बनाने वाले और कभी-कभी, सिलसिला, कहो न प्यार है जैसी फिल्मों की पटकथा लिखने वाले सागर सरहदी ने इतने लंबे अरसे तक कोई फिल्म क्यों नहीं बनाई। शायद उनकी संवेदना को छूती हुई कोई पटकथा नहीं मिली होगी।



चैसर की कहानी साहित्यिक पत्रिका कथा देश के नवलेखन अंक में कुछ वर्श पहले प्रकाशित रामजनम पाठक की कहानी ’बंदूक’ पर आधारित है। सरहदी ने यह कहानी पढ़ी और उन्हें लगा कि शायद उन्हें ऐसी ही किसी कहानी की तलाश थी।



फिल्म की पटकथा लिखने के लिए उन्होंने हिंदी कवि निलय उपाध्याय को चुना जो उस समय कदाचित कारणों से बेरोजगारी के दौर से गुजर रहे थे। सरहदी चाहते तो फिल्म की पटकथा किसी भी स्थापित नाम से लिखवा सकते थे लेकिन उन्होंने इसके लिए निलय को चुना क्यों़? क्योंकि एक कलाकार दूसरे कलाकार के संकट को उसकी भावनाओं को समझता है उन्हें साझा करता है। सरहदी की यही संवेदना बाजार को इतनी संवेदनषील फिल्म बनाती है कि आप उसे देखते हुए भी नहीं देख पाने के भाव से गुजरते हैं। भूूमिकाओ से यह समानुभूति ही फिल्म की जान है।



फिल्म का संगीत उसके सबसे मजबूत पक्षों में से है। मीर तकी मीर और मोहिनुद्दीन मखदूम की शानदाार गजलें ‘दिखायी दिए यूं ...’और ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की...’आज भी सुनने पर गजल और संगीत की उस जादुई दुनिया की सैर पर ले जाती हैं जहां तसव्वुर सीमाविहीन होकर उड़ान भरता है।



मीर के बारे में तो खैर कहना ही क्या। ये वही मीर हैं जिनके बारे में कभी गालिब ने कहा था- ‘‘रेखते का तू ही उस्ताद नहीं है गालिब कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था।’’



सदियों का फासला हो जाने के बावजूद उनकी गजलें आज भी षीर्श हिंदी सिनेमा का हिस्सा हैं। गुलों में रंग भरे वादे नौबहार चले चले भी आओ की गुलषन का कारोबार चले। उनकी यह गजल मेरी जानकारी में अब तक कम से कम चार अलग अलग फिल्मों में आ चुकी है।



मखदूम मोहिउद्दीन को उनकी विद्रोही तेवर की नजमों के लिए जाना जाता है। तरक्की पसंद षायरी के अगुया षायरों की जमात के मखदूम की गजल फिर छिड़ी बात रात फूलों की रोमांटिक गजलों को नई ऊंचाई पर ले जाने वाली रचना है।



बाजार के संगीत की खूबी है उसके गीतों में लोक संगीत और बेहतरीन गजलों का खूबसूरत मिश्रण। आपको याद होगा आंचलिकता के रंग में रंगा गीत चले आओ सैंया रंगीले मैं हारी रे।
या फिर भूपिंदर की गायी गजल करोगे याद तो हर बात याद आएगी क्या हर किसी को अतीत की हांट करती यादों में नहीं ले जाती।



जगजीत कौर की आवाज में फिल्म का आखिरी गीत जो सुप्रिया पाठक पर फिल्माया गया है - देख लो आज हमको जी भर के। क्या इस धरती के हर प्यार करने वाले की आत्मा की अंतिम पुकार नहीं लगती।