शैलेंद्र भी थे आरके का हालमार्क (भाग -५ )


शैलेंद्र, शंकर -जयकिशन, सदा सुहागन राग भैरवी, आर के बैनर सभी अपने आप में एक कभी न खत्म होने वाली यात्रा की तरह है। फिल्म संगीत की यह यात्रा जो बरसात से शुरू हुई अनेको पडावो से गुजरने के बाद आरडी बर्मन से होते हुए एआर रहमान तक पहुंच चुकी है। गीत लेखन में शैलेंद्र की विरासत को गुलजार भी एक अलग मकाम तक पहुंचा चुके हैं। जिस समय संपूर्ण सिंह यानी गुलजार ने फिल्म बंदिनी के लिए मोरा गोरा अंग--- लिखा तब वे बिमल राय की टीम में असिस्टेंट हुआ करते थे। बकौल गुलजार शैलेंद्र उनके सबसे प्रिय गीतकार थे और उनके सानिघ्य में ही उनमें गीत लेखन का शउर आया। खैर गुलजार पर अपनी बात को मैं यहीं पर खत्म करता हूं। बाद के खंडों में मैं बिमल राय, बंदिनी, गुलजार और शैलेंद्र को लेकर अलग से लिखूंगा।


अजीत कुमार

बात फिल्म बरसात पर हो रही थी। बरसात के कुल दस गीतों में 5 राग भैरवी पर आधरित थे। ये गीत थे -बरसात में हमसे मिले तुम, मुझे किसी से प्यार हो गया,अब मेरा कौन सहारा, छोड गए बालम, मैं जिंदगी में हरदम रोता ही रहा हूं । अपनी संगीत रचनाओं में शंकर ने सही मायने में भैरवी को सदा सुहागन बनाया । ऐसा कोई रंग नहीं था जिसे शंकर जयकिशन ने भैरवी में न ढाला हो। राग को लेकर शंकर जयकिशन का यह प्रयोग अपने आप में अन्यतम था। मेरे हिसाब से पहाडी को लेकर जिस तरह का प्रयोग नौशाद के यहां देखने को मिले वैसा ही प्रयोग भैरवी को लकर शंकर जयकिशन के यहां देखने को मिलता है। फिल्म दुलारी 1949 के लिए नौशाद के संगीत निर्देशन में राग पहाडी में निबद्व रफी की गायी रचना सुहानी रात ढल चुकी न जाने तुम कब आओगे को भला कौन भूल सकता है।

शंकर कहा करते थे मेरे लिए गीत के बोल चित्र यानी पोर्टेट हैं जबकि धुन फ्रेम । अब आप समझ सकते हो कि गीत के बोलों को लेकर राजकपूर, शंकर और जयकिशन कितने संजीदा थे। अपनी पूरी संगीत यात्रा के दौरान शैलेंद्र फ्रेम के दायरे में रहकर निराकार को आकार ही देते रहे। कहें तो शंकर जयकिशन का फ्रेम पहले तैयार करने का एक ही मकसद होता था, गीतकार के निराकार, निर्गुण को आकार देना, सगुण बनाना। एक बात और फिल्म बरसात में टाइटिल यानी शीर्षक गीत बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम के अलावा सिर्फ एक और गीत पतली कमर है तिरछी नजर है की रचना शैलेंद्र ने की थी। बाकी के गीत फिल्म के अन्य गीतकारों हसरत जयपुरी, रमेश शास्त्री और जलाल मलीहाबादी ने लिखे थे।

आपके जेहन में यह सवाल उठ सकता है कि आखिर राजकपूर ने आरके बैनर की पहली फिल्म बरसात के लिए एक ही साथ इतने गीतकारों को क्यूं रखा। जबकि उस समय सामान्यतया अनुबंध् के तहत कोई एक गीतकार ही किसी एक फिल्म की सारी रचनाओं को लिखता था। लेकिन राजकपूर के लिए बरसात अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी. हालांकि इससे पहले भी वे आग के लिए निर्माता निर्देशक की भूमिका निभा चुके थे लेकिन अपनी पहली फिल्म के तमाम प्रयोगों से वे मुतमइन नहीं थे। उन्हें लग रहा था कि असल मे जो वह सिनेमा के पर्दे पर उतारना चाहते हैं उसके लिए उन्हें अभी तक मनमापिफक टीम नहीं मिली है। इसिलिए उन्होंने अपने प्रयोग को बरसात में भी जारी रखा। यहां मैं यह भी बताना चाहूंगा किशंकर जयकिशन राज की पहली फिल्म आग में संगीत निर्देशक राम गांगुली के साथ साजिंदे के तौर पर काम कर रहे थे। लेकिन फिल्म के प्रोडाक्शन कंटोलर इंदर राज आग के संगीत निर्माण की पूरी प्रक्रिया पर नजर जमाए हुए थे। शंकर जयकिशन की फिल्म संगीत की समझ को लेकर आखिर उन्होंने राजकपूर से उन दोनों को बतौर स्वतंत्रा संगीतकार मौका देने की सिफारिश की। अंततः राजकपूर ने भी फिल्म बरसात के लिए शंकर जयकिशन के नाम पर मुहर लगा ही दी।

बहुतों को यह नहीं मालूम कि बरसात के लिए भी शुरू में राम gangulee को ही बतौर संगीतकार रखा गया था। और कुछेक बातों पर हुए विवाद के बाद उनकी जगह पर शंकर जयकिशन को लिया गया। तो मैं था बरसात के लिए एक ही साथ कई गीतकारों के लेने के विषय पर। मेरे हिसाब से राजकपूर उन सबमें में अपने लिए श्रेष्ठ के चुनाव की प्रक्रिया में थे और चुनाव के लिए विकल्प होने जरूरी हैं। बरसात के गीत संगीत की कामयाबी के बाद राज साहब को अहसास हो गया कि गीत और संगीत को लेकर शंकर जयकिशन शैलेंद्र और हसरत परफेक्ट हैं और फिर शैलेंद्र के निधन 1966 तक ये सभी सभी साथ साथ रहे। राजकपूर का एक ही साथ अपनी फिल्मों के लिए दो गीतकारों और संगीतकारों को रखने के पीछे भी समन्वय का मंत्र काम कर रहा था।

संगीत को लेकर जहां शंकर में शास्त्रीय व कर्नाटक संगीत की गहरी समझ थी वहीं जयकिशन पाश्र्व यानी बैक ग्राउंड म्यूजिक और रूमानी गीतों की संगीत रचना में पारंगत थे। बरसात से पहले पृथ्वी थियेटर में जहां शंकर तबला बजाते थे वहीं जयकिशन हारमोनियम। दोनों ने हिंदी सिनेमा के पहले युगल संगीतकार हुसनलाल भगतराम के साथ भी काम किया। हुसनलाल भगतराम की संगीत प्रतिभा की बानगी उनके संगीत निर्देशन में फिल्म प्यार की जीत के रफी के गाए गीत इस दिल के टुकडे हजार हुए हैं।

गीत लेखन को लेकर जहां शैलेंद्र के यहां पूरब का रंग था वहीं हसरत जयपुरी के यहां पश्चिम का रंग। पूरब और पश्चिम के रंग को हिंदी और उर्दू से भी जोडकर देखा जा सकता है। ऐसे भी कहा जाता है कि शंकर की जहां शैलेंद्र से ज्यादा छनती थी, वहीं जयकिशन की हसरत जयपुरी से । बरसात के संगीत में प्रयोगों पर थोडा और ठहर रहा हूं। ताकि अगले के खंडों में यह समझने में आसानी हो कि प्रयोग की इस प्रक्रिया के साथ साथ एक गीतकार अपने आपको कैसे गढता है। बरसात से पहले आर्केस्ट्रेशन और पश्चिमी बीट्स का इस्तेमाल सिर्फ फीलर के तौर पर होता था मतलब साफ मुखडे और अंतरे के बीच खाली स्पेस को भरने के लिए होता था। लेकिन आर्केस्ट्रेशन का एक नए और विलक्षण अंदाज में बतौर प्रील्यूड, इंटरल्यूड, काउंटर मेलोडी और एपीलाग इस्तेमाल बरसात से ही शुरू होता है। प्रील्यूड का मतलब मुखडे की शुरुआत से पहले गीत की भाव भूमि बनाने के लिए प्रयुक्त संगीत, इंटरल्यूड मतलब मुखडे और अंतरे के बीच का संगीत और एपीलाग यानी गीतकी समाप्ति के लिए प्रयुक्त होने वाला संगीत का टुकडा। शंकर जयकिशन से पहले संगीतकार मुखडे और विभिन्न अंतरों के बीच सामान्यतया एक ही तरह के इंटरल्यूड का इस्तेमाल करते थे लेकिन इस युगल संगीतकार ने मुखडे और विभिन्न अंतरों के बीच अलग अलग तरह के इंटरल्यूड का प्रयोग किया। साथ ही जुगल गीतों के गायिकी के तरीके को भी प्रभावी बनाने के लिए नए प्रयोग किए।

बरसात से पहले नायक नायिका क्रमिक अंतराल पर गीत का अलग अलग हिस्सा गाते थे। सीधे कहें तो अगर नायक मुखडा गाता था तो नायिका अंतरा या पहला अंतरा अगर कोई एक गाता था तो दूसरा अंतरा कोई दूसरा। लेकिन बरसात के युगल गीत छोड गए बालम मुझे हाय अकेला छोड गए में मुखडे के साथ साथ साथ ही स्लो फेड इन में लता का आलाप भी चलता है। एक ही साथ दो अलग अलग टेंपोरेलिटीज यानी ओवरलैपिंग टेंपोरेलिटीज का इस्तेमाल शंकर जयकिशन की युगल संगीत रचनाओं का हालमार्क है।





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Sandeep

1 comments:

बेनामी ने कहा…

उम्दा लिखते हैं आप