शैलेंद्र हिंदी सिनेमा के पहले जनगीतकार (भाग २)


प्रथम भाग में मैंने शैलेंद्र से ज्यादा उस समय का जायजा लिया जो उनके हिंदी सिनेमा में आगमन से पहले या आगमन के शुरूआती दिनों में विद्यमान थी। रही बात शैलेंद्र की फिल्मी यात्रा की तो इस भाग में उस पर आने की कोशिश कर रहा हूं।

अजीत कुमार

पहले भाग में ही यह स्पष्ट कर देने की कोशिश की थी कि शैलेंद्र को हम बतौर एक ऐसे गीतकार के तौर पर याद करेंगे जिन्होंने सिने गीत लेखन के तमाम प्रचलित मुहावरों से हटकर अपना एक अलग रंग जमाया। जिसमें लोक का रंग, सादापन, लालित्य सबकुछ समाहित था। मेरे हिसाब से हर कलाकार के अंदर एक बागी की आत्मा निवास करती है जो उसे रूढियों और प्रचलन के विरूद्व जाने के लिए बाध्य करती है। शैलेंद्र भी सचमुच में एक बागी गीतकार थे।


थियेटर की कोख से नए नए जन्मे हिंदी सिनेमा के लिए उस समय ठेठ हिंदी में गीत लेखन के बारे में सोचना भी दुश्वार था। उर्दू और फारसी के अल्फाजों के बगैर संवादलेखन से लेकर पटकथा लेखन और गीतलेखन की कतई गुजाइश नहीं थी। लेकिन इप्टा और प्रलेस के लिए कलम चलानेवाला लेखक पारसी थियेटर के उस घिसे पिटे सामंती और उपनिवेशवादी चरित्र को कैसे आत्मसात कर सकता था। यूं तो उस समय शैलेंद्र के ज्यादातर साथी जो प्रलेस और इप्टा में उनके साथ थे देर सबेर सिनेमा की ओर रुख किया लेकिन शैलेंद्र ही अकेले हैं जिनके यहां सिने गीतलेखन के क्षेत्र में भाषा और शिल्प को लेकर नए प्रयोग मिलते हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं शैलेंद्र पहले गीतकार हुए जिन्होंने सिने गीत लेखन को आम जनों की जुबान में ढाला। यह घूंटी तो प्रलेस के सानिघ्य में उन्हें पीने को मिली थी। जिसे कर्म क्षेत्र में उतारने में भी उन्होंने कोई कोताही नहीं की।


प्रलेस के ज्यादातर साथी यथा -कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी सिने गीत लेखन के क्षेत्र में आए जरूर लेकिन भाषा के तौर पर ये सारे के सारे उसी फारसी और उर्दू की विरासत से निकले थे। हालांकि अपने गीतलेखन में इन शायरों ने हिंदी और उसकी बोलियों के रंग का बाखूबी इस्तेमाल किया लेकिन सादगी लोक और हिंदी का जो रंग शैलेंद्र जमाने में कामयाब हुए उसकी मिसाल नहीं। कैफी, साहिर और मजरूह जैसे गीतकारों ने भले ही अपनी अपनी शायरी में प्रलेस के मूल्यो को थोडा बहुत अपनाया लेकिन सिने गीत लेखन के क्षेत्र में वे पारसी थियेटर के गीत लेखन की परंपरा की कडी को ही मजबूती देते देखे गए। कहें तो देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित कराने वाले शैंलेंद्र पहले गीतकार थे। हिंदी पट्टी यानी पूरब का रंग शैलेंद्र के बाद किसी के यहां नहीं देखने को मिला।

लोगों को ताज्जुब हो सकता है कि आखिर रावलपिंडी में पला बढा एक इंसान अपने सिने गीतों में पूरब का इतना बेजोड रंग कैसे ढाल सकता है। आखिर कलाकार तो कलाकार होता है उससे यही जादुई प्रयोग की अपेक्षा भी की जाती है। लेकिन इसके पीछे असली राज तो यह है कि शैलेंद्र के दादाजी यानी केसरीलाल का संबंध बिहार से था। बचपन के कुछेक दिन भी उनके मथुरा में ही गुजरे। अपने पुरखों की धरती बिहार की खुशबू से लबरेज शैलेंद्र की रावलपिंडी, मथुरा और बंबई की यायावरी ने ही तो उनके व्यक्तित्त्व में उर्दू हिंदी यानी गंगा जमुनी तहजीब की इतनी सम्मिलित मिठास भर दी। जो उनके गीतों के माध्यम से आज भी श्रोताओं को पूरबा बयार सी शीतलता प्रदान कर रही है। लेकिन उस शीतलता में भी बसती है टीस, भेद जानने की आतुरता, चुभन, कसक, अव्यक्त का दर्द।

3 comments:

अर्शिया ने कहा…

इस महत्वपूर्ण लेख के लिए आभार।
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जिसपर हमको है नाज़, उसका जन्मदिवस है आज।
कोमा में पडी़ बलात्कार पीडिता को चाहिए मृत्यु का अधिकार।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुंदर आलेख, शैलेन्द्र के बारे में कुछ और जानने को मिला।

संदीप पाण्डेय ने कहा…

सर शैलेंद्र की फिल्मी यात्रा, राज कपूर के साथ उनके संबंध और तीसरी कसम के निर्माण की समूची पृष्ठिभूमि के बारे में यदि आप लिखें तो हमें थोड़ी जानकारी और मिले। एक बात और शैलेंद्र के गीतों पर भी कुछ बात हो मसलन दोस्त दोस्त ना रहा, चलत मुसाफिर और मुड़ मुड़ के ना देख आदि